धर्म विशेष

गुरु गोविंद सिंह के ३५० वें प्रकाश पर्व पर---! हुतात्माओं के प्रेरणा श्रोत गुरु अर्जुनदेव ----!

जो जाती अपना इतिहास भूल जाती है उसका भविष्य संकट पूर्ण हो जाता है यानी समाप्त हो जाती है -------!
           गुरु अर्जन देव जी को मुग़ल शासक जहाँगीर ने गर्म तवे पर बैठा दिया था और गरम तेल में पका कर हत्या कर दी थी, लेकिन आज के कुछ सिख बंधु ये सब भूल गए हैं और उन्ही क्रूर इस्लाम मतावलंबियों के बहकावे मे आ अपने मूल के बिरोध यानी आतंकी वन उनके साथ खड़े दिख रहे है, आज भी गुरु अर्जन देव की आत्मा की शांति के लिए हम ठंडा शर्बत पिलाते हैं, लेकिन कुछ सिखों को ये सच नहीं मालूम।
        गुरु अर्जन देव सिक्खों के पाँचवें गुरु थे, ये 1581 ई. में गद्दी पर बैठे गुरु अर्जन देव का कई दृष्टियों से सिक्ख गुरुओं में विशिष्ट स्थान है, 'गुरु ग्रंथ साहब' आज जिस रूप में उपलब्ध है, उसका संपादन इन्होंने ही किया था, गुरु अर्जन देव सिक्खों के परम पूज्य चौथे गुरु रामदास के पुत्र थे, गुरु नानक से लेकर गुरु रामदास तक के चार गुरुओं की वाणी के साथ-साथ उस समय के अन्य संत महात्माओं (कबीर, गोरखनाथ, संत रविदास जैसे ) की वाणी को भी इन्होंने 'गुरु ग्रंथ साहब' में स्थान दिया, श्री गुरु अर्जुन देव जी को हुतात्माओं का सरताज कहा जाता है, सिख धर्म के वे प्रथम बलिदानी थे, भारतीय दशगुरु परम्परा के पंचम गुरु श्री गुरु अर्जुनदेव का जन्म 15 अप्रैल, 1563 ई. को हुआ, एक सितम्बर, 1781 को अठारह वर्ष की आयु में वे गुरु गद्दी पर विराजित हुए, 30 मई, 1606 को उन्होंने हिन्दू धर्म व सत्य की रक्षा के लिए 43 वर्ष की आयु में अपने प्राणों की आहुति दे दी।
        श्री गुरु अर्जुनदेव जी बलिदान के समय दिल्ली में मध्य एशिया के मुगल ( मंगोल) वंश का शासक जहाँगीर था उन्हें उसके कोप का ही शिकार होना पड़ा, अकबर की संवत 1662 में हुई मौत के बाद उसका पुत्र जहांगीर गद्दी पर बैठा जो बहुत ही कट्टर इस्लामिक विचारों वाला था, अपनी आत्मकथा ‘तुजुके जहांगीरी’ में उसने स्पष्ट लिखा है कि वह गुरु अर्जुन देव जी के बढ़ रहे प्रभाव से बहुत दुखी था, इसी दौरान जहांगीर का पुत्र खुसरो बगावत करके आगरा से पंजाब की ओर आ गया, जहांगीर को यह सूचना मिली थी कि गुरु अर्जुन देव जी ने खुसरो की मदद की है इसलिए उसने गुरु जी को गिरफ्तार करने के आदेश जारी कर दिए, बाबर ने तो श्री गुरु नानक देव जी को भी कारागार में रखा था, लेकिन श्री गुरु नानकदेव जी तो पूरे देश में घूम- घूम कर हताशा से भरे हुए हिन्दू समाज में नयी चेतना जगाने का प्रयास किया, जहांगीर के अनुसार उनका परिवार मुरतजाखान के हवाले कर, घर-बार लूट लिया गया इसके बाद गुरु जी ने स्वयं का बलिदान किया, अनेक कष्ट झेलते हुए गुरु जी शांत रहे, उनका मन एक बार भी कष्टों से नहीं घबराया।
        जहांगीर ने श्री गुरु अर्जुनदेव जी को मरवाने से पहले उन्हें अमानवीय यातानाएं दी, उन्हें चार दिन तक भूखा रखा गया, ज्येष्ठ मास की तपती दोपहरियां में उन्हें तपते रेत पर बिठाया गया, उसके बाद खौलते पानी में रखा गया, परन्तु श्री गुरु अर्जुनदेव जी ने एक बार भी उफ तक नहीं की और इसे परमात्मा का विधान मानकर स्वीकार किया, गुरु अर्जुन देव जी को लाहौर में 30 मई 1606 ई. को भीषण गर्मी के दौरान ‘यासा’ के तहत लोहे के गर्म तवे पर बिठाकर उनकी हत्या कर दिया, "यासा " का अर्थ इस्लाम मे किसी व्यक्ति का रक्त धरती पर गिराए बिना उसे यातनाएं देकर शहीद कर दिया जाता है, गुरु जी के शीश पर गर्म-गर्म रेत डाली गई, जब गुरु जी का शरीर अग्नि के कारण बुरी तरह से जल गया तो आप जी को ठंडे पानी वाले रावी दरिया में नहाने के लिए भेजा गया जहां गुरुजी का पावन शरीर रावी में लुप्त हो गया, गुरु अर्जुनदेव जी ने लोगों को विनम्र रहने का संदेश दिया, आप विनम्रता के पुंज थे कभी भी आपने किसी को दुर्वचन नहीं बोले गुरुवाणी में आप फर्माते हैं :
             ‘तेरा कीता जातो नाही मैनो जोग कीतोई।
              मै निरगुणि आरे को गुण नाही आपे तरस पयोई॥
              तरस पइया मिहरामत होई सतगुर साजण मिलया।
               नानक नाम मिलै ता जीवां तनु मनु थीवै हरिया॥’
 तपता तवा उनके शीतल स्वभाव के सामने सुखदाई बन गया, तपती रेत ने भी उनकी ज्ञान निष्ठा भंग न कर पायी, गुरु जी ने प्रत्येक कष्ट हंसते-हंसते झेलकर यही अरदास की-----
              तेरा कीआ मीठा लागे॥
              हरिनामु पदारथ नानक मांगे॥
 जहांगीर द्वारा श्री गुरु अर्जुनदेव जी को दिए गए अमानवीय अत्याचार और अन्त में उनकी मृत्यु जहांगीर की इसी योजना का हिस्सा था, श्री गुरु अर्जुनदेव जी जहांगीर की असली योजना के अनुसार ‘इस्लाम को वे क्या स्वीकारते ---! इसलिए उन्होंने वीरोचित सर्वोच्च बलिदान के मार्ग का चयन किया, गुरु जी को सबसे पहले आगरे के किले मे बंद किया हजारों हिंदुओं ने अपना उस दीवार पर मस्तक पटप-पटक फोड़ डाला तब मुगल को लगा की गुरु को अधिक दिन जिंदा रखा तो बड़ा बिदरोह होगा और फिर उनका इस प्रकार बलिदान हुआ ।
         इधर जहांगीर की आगे की तीसरी पीढ़ी या फिर मुगल वंश के बाबर की छठी पीढ़ी औरंगजेब तक पहुंची, उधर श्री गुरुनानकदेव जी की दसवीं पीढ़ी थी श्री गुरु गोविन्द सिंह तक पहुंची, यहां तक पहुंचते-पहुंचते ही श्री नानकदेव की दसवीं पीढ़ी ने मुगलवंश की नींव में मट्ठा डाल दिया और उसके वंश नाश का इतिहास लिख दिया, संसार जानता है कि मुट्ठी भर सिंह रूपी खालसा ने 700 वर्ष पुराने विदेशी वंशजों को मुगल राज सहित सदा के लिए ठंडा कर दिया, 100 वर्ष बाद 'महाराजा रणजीत सिंह' के नेतृत्व में भारत ने पुनः स्वतंत्राता की सांस ली। ''हरीसिंह नलवा''' जैसे सेनापति खड़ा कर अफगानिस्तान तक फतह की आज भी अफगानिस्तान मे महिलाएं कहतीं है ''बेटा सो नहीं तो नलवा आ जाएगा'' महाराजा रंजीत सिंह के नेतृत्व मे पूरा कश्मीर, अफगानिस्तान तक देश की सीमा हुई, देश के सारे तीर्थों का पुनर्निमान कराया, नलवा ने जैसे को तैसा जबाब दिया जहां-जहां जज़िया कर लगाए गए थे, नलवा ने मुसलमानों से भी कर लिया मंदिरों के गिराने का भी बदला लिया मस्जिदें भी गिरा कर लिया शेष तो कल का इतिहास है, लेकिन इस पूरे संघर्ष काल में पंचम गुरु श्री गुरु अर्जुनदेव जी की बलिदान सदा सर्वदा सूर्य के तेज की तरह प्रखर रहेगी।
          सिक्खों की बलिदानी परंपरा भाई मतिदास को आरे से चिरवा कर बलिदान किया, भाई सतीदास को खौलते पानी मे उबाल कर मारा, वीर बंदा वैरागी को गरम शलाखों से दाग-दाग कर शरीर को नुचवाकर मारा, गुरु पुत्रों का बलिदान कौन भूल सकता है--? लेकिन उन्होने सिक्ख परंपरा के सम्मान की रक्षा की वे डिगे नहीं अंतिम समय तक गुरु नानक का ध्यान कर धर्म की रक्षा की, वे सभी जैसे उनके चेहरे पर भगवान सूर्य स्वयं ही विराजमान हो गए हों ऐसा उनके चेहरा दीप्तमान लग रहा था, आखिर वे सब गुरु के वंदे थे कैसे झुकते उन्होने विधर्मियों को झुका ही दिया उन्हे (मुगुलों को ) भारत मे समाप्त होना ही पड़ा, दसवें गुरु गोविंद सिंह ने ऐसे खड़े किए शिष्य---------!
             "चिड़ियाँ से मैं बाज लड़ाऊँ , गीदड़ों को मैं शेर बनाऊँ । 
               सवा लाख से एक लड़ाऊँ, तबै गोविंद सिंह नाम कहाऊँ ।"    

         देश आज़ादी के पश्चात ऐसे देश बिरोधियों की सत्ता आयी जिंहोने इन बलिदानियों को भुला दिया उन्हे ईश्वर कभी माफ नहीं करेगा--! हृदय में अत्यंत ही क्षोभ है कि ऐसे देवपुरुषो का इतिहास ना तो हमें कभी पढाया गया और ना ही कभी बताया गया पाठ्यक्रम कहीं भी नहीं मिलता जिससे हम व हमारे बच्चे प्रेरणा ले सकें .! लेकिन अब समय आ गया है कि हम मैकाले के षडयंत्र पूर्वक रचे गए झूठे और भ्रामक शिक्षा कुचक्र से बाहर निकले और अपनी स्वयं की, धर्माधारित शिक्षा व्यवस्था की स्थापना करें। जिसमें अपने धर्म का अपने पूर्वजों का एवं अपने इष्ट का सम्मान हो, उनकी शौर्य गाथा को भारत का बच्चा - बच्चा जाने और उनके आदर्शों को अपनायें।
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