धर्म विशेष

ढ़ाई दिन का झोपड़ा या पराजय का स्मारक -----!

पराजय का स्मारक -----!
"चार बाँस चौबीस गज अँगुल अष्ट प्रमाण ता दूरी सुल्तान है मत चुकौ चौहान"!
         तराइयन युद्ध मे पराजय होने के वावजूद चौहान के मित्र कबी चंद्रवरदाई के बुद्धि विबेक से चौहान ने शब्द वेधी बाण द्वारा आततायी मुहम्मद गोरी का वध कर दिया, अंतिम विजय पृथ्वीराज चौहान की होने के बावजूद आखिर ऐसा क्या हुआ कि जहाँ गुरुकुल वेद विद्यापीठ था आज वह कहाँ गया ? जो पृथ्वीराज चौहान का जो किला था वह कहाँ गया ? ये अजयमेरू कहाँ चला गया ? फिर राजा दाहिर की यादें और महान पराक्रमी बाप्पा रावल का पराक्रम कहाँ गया ? इन अग्नि वँशी क्षत्रियों की बिरोचित परंपराओं का क्या हुआ ? जहाँ से कभी सरस्वती प्रवाह मान होती थी उस ब्रम्हा जी की प्रकट स्थली वेदों के प्रकट उपदेशों की ऋचाओं का क्या ?
          सिर्फ ढाई दिन में मंदिरों को तोड़कर बनवाई गई मस्जिद---!
          ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह सूफी संतों माने जाने वाले ख्वाजा साहब 1161 ई. में भारत आए थे और अजमेर आकर बस गए थे वह मुहम्मद घोरी का खूफिया था उसे भारत के राजाओँ की आन्तरिक जानकारी क़े लिए भेजा था उसी ने पृथ्वीराज चौहान के पतन के बाद वेद विद्यापीठ को तोडकर अथवा उसी का इस्लामिक स्वरूप दे करके मस्जिद का स्वरूप देने का प्रयास किया था तत्पश्चात एक वीर सैनिक ने इस मक्कार हिंदू द्रोही आक्रमण कारी को अपनी तलवार के एक ही वार से ज़न्नत भेजा दिया, वह आज भी वहीं दफन है जिसने उसे मारा दंडित किया उसकी समाधि पर कोई नहीं जाता, लेकिन इस देशद्रोही की मजार पर लाखों नादान हिन्दू जाता है शायद इन हिंदुओ को यह नहीं पता कि भारत में सर्वाधिक बलात धर्मांतरण सूफ़ियों के द्वारा किया गया है इतना ही नहीं इस दुष्ट ने तो पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ प्रत्यक्ष युद्ध में भाग लिया था वास्तविकता यह है की इस मस्जिद मे कभी नमाज नहीं हुई इसमे तोड़ी गयी मूर्तियों के स्मारक या हिन्दुओ को अपमानित करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है ।
        दरगाह से एक फर्लांग आगे त्रिपोली दरवाजे के पार पृथ्वीराज चौहान के एक पूर्वज द्वारा बनवाए गए तीन मंदिरों के परिसर तक पहुंचा जा सकता है, परिसर में एक संस्कृत पाठशाला भी थी जिसकी स्थापना पृथ्वीराज चौहान के पूर्वज विग्रहराज तृतीय ने लगभग 1158 ई. में की थी, वह साहित्य प्रेमी था और स्वयं नाटक लिखता था, उनमें से एक हरकेली नाटक काले पत्थरों पर उत्कीर्ण किया गया जो अजमेर स्थित अकबर किला के राजपूताना संग्रहालय में आज भी प्रदर्शित है, इसी संग्रहालय में उक्त परिसर से लाई गई लगभग सौ सुंदर मूर्तियां एक पंक्ति में रखी हुई हैं, ऐसा ही एक नाटक और मिला जो राजकवि सोमदेव द्वारा रचित था, बलुआ पत्थर की मूर्तियां लगभग 900 वर्षों से सुरक्षित हैं लेकिन सभी मूर्तियों के चेहरे व्यवस्थित रूप से तोड़ दिए गए हैं, मंदिर परिसर के अहाते में भी विशाल भंडारगृह है, जिसमें और भी अनेक सुंदर मूर्तियां हैं, अपेक्षाकृत कम महत्व के अवशेष अहाते में इस प्रकार पड़े हैं कि जो चाहे उन्हें ले जाए।
         पिछले 800 वर्षों से यह परिसर अढ़ाई दिन का झोपड़ा नाम से विख्यात है, यह नाम इसलिए रखा गया है, क्योंकि पहले परिसर के तीन मंदिरों को ढाई दिन के भीतर मस्जिद के रूप में बदल दिया गया था, तराई के दूसरे युद्ध (1192ई.) के बाद मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को हरा वंदी बना गजनी भेजा, विजेता के रूप में अजमेर से गुजरा था, वह यहां मंदिर से इतना भयभीत हुआ कि उसने उसे तुरंत नष्ट करके उसके स्थान पर मस्जिद बनाने की इच्छा प्रकट की, उसने अपने गुलाम सेनापति को सारा काम 60 घंटे में पूरा करने का आदेश दिया ताकि लौटते समय वह नई मस्जिद में नमाज अदा कर सके।
        मुसलमानों द्वारा ध्वंस किए गए मंदिरों की श्रृंखला में यह झोंपड़ा ही पहला मंदिर है, इससे पहले महमूद गजनवी द्वारा ऐसे ही अत्याचार किए गए थे, लेकिन आक्रमण करने के बाद उसने रुककर शासन नहीं किया, तीनों मंदिर इतने आकर्षक थे कि उनका ध्वंस करने वालों ने लगभग सभी स्तंभों को बना रहने दिया, ऐसे 70 स्तंभ-तीन छतों के नीचे इस प्रकार बने हैं कि तीनों छतें मिलकर एक छत के रूप में दिखाई देती हैं, छतदार भवन के आगे अन्य स्तम्भ भी हैं जो बढ़िया पत्थर के मंडप से दिखाई देते हैं।
         वास्तव मे मुहम्मद घोरी को पृथ्वीराज चौहान की असली ताकत का अंदाजा नहीं था जब वह गजनी पहुचा जीत की खुशी बहुत ज्यादा समय नहीं चल पाया बदला लेने के उद्देश्य से पृथ्वीराज के मित्र कबी चंद्रवरदाई मुहम्मद गोरी से मिलकर बताया कि हमारे महराज ऐसी विद्या जानते हैं कि उनके न रहने पर वह विद्या समाप्त हो जायेगा हमारे महराज शब्द वेधी बाण चलाते हैं गोरी यह विद्या देखना चाहता था महराज तो कबि के इशारे पर काम कर रहे थे उन्होंने अपने मित्र से मिलते ही कहा "जब किसी देश का नागरिक स्वार्थी हो जाता है तो उस देश का पतन हो जाता है" चौहान ने कबी की योजना के अनुसार शब्द वेधी बाण द्वारा मुहम्मद गोरी का वध कर दिया और दोनों महान वीर एक दूसरे को मारकर स्वर्ग को प्राप्त किया जिंदा रहते किसी मलेक्ष का हाथ लगने नहीं दिया।
      स्तंभों की ऊंचाई लगभग 25 फीट है और उनमें लगभग 20 फीट की ऊंचाई तक अति सुंदर नक्काशी का काम है, जिसमें अत्यंत सुंदर नमूने बने हुए हैं जिनके ऊपर चित्ताकर्षक आकृतियां भी हैं, यह एक अस्वाभाविक बात है कि उनमें कोई भी ऐसी आकृति नहीं है जिसका सर न काटा गया हो, यूरोप में कहीं भी कलाकृतियों को इस प्रकार नष्ट करने का उदाहरण दिखाई नहीं देता, इसका अपवाद ई.पू. 455 में रोम विजय के बाद वैंडलो द्वारा किया गया अपने प्रकार का ध्वंस कार्य था, उसी के बाद से वैंडल शब्द को अपवित्रीकरण और ध्वंस के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जाने लगा, राजपूताना संग्रहालय में प्रदर्शित की गईं और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा निकाल कर झोपड़े के अहाते में बंद ताले में विधिवत रखी गईं सभी आकृतियों के चेहरे व्यवस्थित रूप से तोड़े गए हैं, पत्थर के बने हजारों मुंडों में वस्तुत: एक भी ऐसा नहीं है जिसकी कोई नाक या आंख सलामत हो।
         यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उस परिसर में खुदाई करके अवशेष निकालने का कोई भी काम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने नहीं किया है, राष्ट्रीय स्मारक संरक्षण अधिनियम 1957 पारित होने के बाद से पुरातत्व से सम्बंधित सभी क्रियाकलाप रोक दिए गए हैं, जो कुछ भी खुदाई हुई है वह 20वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में हुई थी जिसका श्रेय जनरल एलेक्सजेंडर कनिंघम और डा. बी.आर. भंडारकार को प्राप्त है, इसका विवरण 1966 में प्रकाशित "राजस्थान डिस्ट्रिक्ट गजेटियर अजमेर' (पृ. 703/707) में दिया गया है।
       संभवत: मोहम्मद गोरी ढाई दिन की अवधि के बाद वहां नमाज अदा करना चाहता था, ढाई दिन के झोंपड़े को बाद में पूरा किया गया और उसमें सुंदर नक्काशीदार दरवाजा लगाया गया, इसका श्रेष्ठ वर्णन फ्यूहरर द्वारा पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की 1893 की वार्षिक रपट में इन शब्दों में किया गया है-"समूचे बहिर्मार्ग में इतनी महीन और कोमल नक्काशी की जाली तराशी गई है कि उसकी तुलना महीन जालीदार कपड़े से की जा सकती है।' कनिंघम ने झोंपड़े के बहिर्मार्ग का वर्णन और भी विशिष्ट तरीके से किया है "अलंकार के इतने ज्यादा भड़कीलेपन, नक्काशी की इतनी सुंदर प्रचुरता, सजावट के इतने नुकीलेपन, कारीगरी की इतनी श्रमसाध्य शुद्धता, सजावट की असीम विविधता जो कि पूर्णत: हिन्दू कारीगरों ने पैदा की थी, इन सभी की दृष्टि से इस भवन की तुलना वि·श्व के सुंदरतम भवन से की जा सकती है।'
            इस हिन्दू मूर्तिकला का वर्णन इन शब्दों मे"अजमेर के संग्रहालय में की गई इस नक्काशी में आपस में रहस्यमय रूप से जुड़ी हुई आकृतियां हैं, जो प्रकटत: सजावट के लिए बनाई गई हैं, लेकिन इस वर्णन में विकृतीकरण और अपवित्रीकरण की मनोवेदना का कोई उल्लेख नहीं है", वास्तव में इस भवन में कुछ भी संतुलित नहीं है, मूल आकृतियां, स्तम्भ और तीन छतें अलग खड़ी दिखाई देती हैं, उसके परवर्तियों द्वारा बनाया गया बहिमार्ग बिल्कुल भिन्न है, अन्य स्तम्भों से कई फीट दूर है, इसमें कुरान की आयतों की नक्काशी एक ऐसे पीले पत्थर पर की गई है जो पीछे बने हिन्दू भवन में लगे पत्थर की तुलना में निश्चित रूप से कमजोर है यह बाद में लिखने का प्रयत्न के अतिरिक्त कुछ नहीं है, सुल्तान द्वारा शुरू किए गए ध्वंस का यह एक स्वरूप था, अजमेर स्थित 'ढाई दिन का झोपड़ा' दोनों ही विजेता द्वारा हारे हुए लोगों के प्रति किए गए ऐसे अपमान का नमूना है !
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