राष्ट्रीय एकात्मता के प्रतीक है हमारे द्वादश ज्योतिर्लिंग और ५१ शाक्तिपीठ --------

 हमारे द्वादश ज्योतिर्लिंग---!
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भारत श्रद्धा भक्ति और मानवता का देश है इस तंत्र को मजबूत करने और बिकसित करने हेतु हमारे महापुरुषों ने धार्मिक आध्यात्मिकता का विकाश देश की एकता को ध्यान में रख कर किया, भारतीय चिंतन विश्व बन्धुत्व का चिंतन है 'जिसने सर्वे भवन्तु सुखिनः 'का सन्देश विश्व को दिया आचार शंकर यह जानते थे की जब-तक भारत कज्बुत नहीं होगा तब-तक हम विश्व को जो देना चाहते है नहीं दे सकते, इसी को ध्यान में रखकर भारत के सभी समुदाय और भौगोलिक रचना को ध्यान में रखकर भगवन शंकर जो भारत के कण-कण में समाये हुए है जन-जन में श्रद्धा भक्ति है उसे भारत भक्ति में बदलने का प्रयत्न किया जहा सुदूर उत्तर हिमालय में केदारनाथ की स्थापना हुई है तो बताते है की उस लिंग का मुख भाग नेपाल में पशुपतिनाथ के रूप में दिखाई देता है तो पृष्ठ भाग केदारनाथ में है, सुदूर दक्षिण रामेश्वरम में भगवन श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंग सम्पूर्ण भारत वर्ष का हिन्दू उससे श्रद्धा भक्ति रखता ही नहीं तो सभी को आकर्षित करता है, जहा पश्चिम में शोमनाथ समुद्र के किनारे प्रहरी के रूप में खड़ा है वही पूर्व में बैधनाथ धाम देवघर-बिहार में हमारे श्रद्धा के केंद्र बने हुए है.

हिमालय से दक्षिण तक ------!
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हिमालय से लेकर दक्षिण सागर तक शिवशक्ति का अविश्करण स्वयंभू ज्योतिर्लिंग द्वारा हुआ है, हिमालय में केदारनाथ, कशी में विश्वेश्वर, नर्मदा किनारे ओंकारेश्वर, उज्जैन्निकत महाकालेश्वर, गुजरात में सोमनाथ तथा नागेश्वर, झारखण्ड में वैधनाथ, महाराष्ट्र त्र्यंबकेश्वर, घ्रिश्नेश्वर, भीमाशंकर, आँध्रप्रदेश में मल्लिकार्जुन और तमिलनाडु में रामेश्वर यह स्थान भगवन शंकर के बारह द्वादश ज्योतिर्लिंग है .

 सांस्कृतिक एकता का प्रतिक--!
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इसी प्रकार भारत की सांस्कृतिक एकता की प्रतीक और अखंड भारत का प्रमाण के तौर पर शक्तिपीठ आज भी बिराजमान है,  कहा जाता है की भगवन शंकर ने भगवती को लेकर तांडव नृत्य किया जहा-जहा शक्ति भगवती के अंग गिरे वह शक्ति पीठ बन गया जो भारत की एकता हेतु संजीवनी का काम करती है, हमारा भारत कहा तक कितना बड़ा था यह हमें दिखाई देता है लंका में एक शक्तिपीठ, बंगलादेश में एक, ब्रह्मदेश में एक शक्तिपीठ, तिब्बत में एक शक्तिपीठ, पाकिस्तान में दो शक्तिपीठ,नेपाल में दो शक्तिपीठ, अफगानिस्तान में एक और शेष शक्तिपीठ भारत में बिभिन्न नामो से जाना जाता है, यह शक्ति पीठ धीरे-धीरे शक्ति केन्द्रों के रूप में परिवर्तित होकर भारतीयों के लिए श्रद्धा केंद्र बन गए और भारतीय राष्ट्रबाद कहे या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहे यही अखंड भारत और बचे हुए भारत की शक्ति और ताकत है जो हमें भारत दर्शन की प्रेरणा हमेसा देती रहती है.
               यही हमारी राष्ट्रीय एकात्मता की धरोहर है.   

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