धर्म विशेष

मुक्तिनाथ -- भारत और नेपाल का धार्मिक भाव एक-- केवल राजनैतिक बिभाजन.


        मुक्तिनाथ नेपाल के सुदूर उत्तर दिशा में तिब्बत सीमा के निकट जोमसोम जिला में स्थित है यह पवित्र तीर्थ विश्व के हिन्दू धर्म मानने वालो के लिए बहुत ही महत्व पूर्ण है बताते है की चारो धाम करने के पश्चात् मुक्तिनाथ यात्रा दर्शन आवश्यक हो जाता है यह 11000 फिट से भी अधिक उचाई पर सुन्दर छटा लिए हुए रास्ते का सौंदर्य देखते ही बनता है स्थान -स्थान पर वहा घर ही गेष्ट होउस बने हुए है, लगभग ६ महीने बर्फ जमी रहती है यहाँ जाने के लिए पोखरा नेपाल के मध्य से जाते है यहाँ से ४५ की.मी. उत्तर दिसा में दो रास्तो से जाना होता है एक तो हवाई मार्ग दूसरा बस द्वारा, मुक्ति नाथ जाने के लिए अप्रैल से अक्टूबर तक का समय अनुकूल रहता है जोमसोम रेतो के पहाड़ पर है बर्फीली व रेतीली हवावो का भारी दबाव भी रहता है प्रातः १० बजे तक जहाजे उडान भारती है, वहा के बातावरण में भारतीयों से भेद-भाव किया जाता है उन्हें केवल धन उगाही की दृष्टि से केवल ग्राहक है न कि तीर्थ यात्री, चाहे वह बस की यात्रा हो या हवाई जहाज जो सुबिधा नेपालियों को मिलती है वह भारतीयों को नहीं, जब कि भारत में जो सुबिधा भारतीयों को मिलती है वे सभी सुबिधाये प्रत्येक नेपालियों को उपलब्ध रहती है कोई भेद-भाव नहीं किया जाता, देखने में भी आता है की सारा का सारा यात्री भारतीय है उसी से वहा की रोजी- रोटी चलती है लेकिन  भारतीयों के प्रति अच्छा भाव नहीं रहता है इसके पीछे क्या कारन है यह तो शोध का विषय है ? ज्ञातब्य हो कि जोमसोम जिले में एक प्रतिशत भी हिन्दू नहीं है केवल सेना और सरकारी कर्मचारी ही हिन्दू है यहाँ तक मुक्तिनाथ मंदिर में पुजारी भी हन्दू नहीं, हिन्दू धर्म शास्त्र के बिरुद्ध बौद्ध महिला पुजारी है जो जूता पहन कर मंदिर में रहती है जो भी चढ़ावा आता है वह बौद्ध गुम्बा बनाने के काम में आता है हिन्दू पुजारी को प्रवेश नहीं है ये दुर्भाग्य का विषय है हिन्दू देश में धर्म की दुर्दशा .
       मुक्तिनाथ का महत्व और भी बढ़ जाता है क्यों कि स्वामीनारायण ने छः महीने तक तपस्या की थी यही उनको सिद्धि प्राप्त हुआ था, इस नाते गुजरातियों का आना तो स्वाभाविक है ही दक्षिण भारत के सर्बाधिक तीर्थ यात्री आते है, हमें लगता ही की दक्षिण के तीर्थ यात्री ही जोमसोम की जीवन रेखा है इतनी हवाई यात्रा भी इसी नाते है, यह काली गण्डकी नदी का उद्गम स्थान भी है यहाँ पवित्र सालिग्राम पाए जाते है जिन्हें हिन्दू समाज भगवान विष्णु मानकर पूजा करता है, यही वह गण्डकी है जिसे 'सदानीरा' भी कहते है काली गण्डकी को आगे नारायणी नदी भी कहते है क्यों  कि [ देवघाट] नारायण घाट  से 40 कि.मी नीचे- तरफ त्रिवेणी में गज-ग्राह का युद्ध शुरू हुआ था ऐसी पुराणों मान्यता है जो बिहार राज्य के सोनपुर में गंगाजी मिलन स्थान पर भगवान प्रकट हुए थे यही गज-ग्राह को  मुक्ति मिली थी  इसी  स्थान को, 'हरिहर क्षेत्र' कहते है जो भारत के धार्मिक छः क्षेत्रो में से एक है.
        भारत और नेपाल की धार्मिक दृष्टि से एक है इस मान्यता को लेकर एक हमारे साधू-संत हरिहर क्षेत्र से मुक्ति क्षेत्र के लिए धार्मिक यात्रा निकालते थे यह यात्रा सदानीरा के किनारे-किनारे जाती थी धार्मिक प्रवचन भी होता था किन्ही कारणों से राजा महेंद्र ने इस यात्रा को बंद करा दिया, यह यात्रा पुनः शुरू हो यह प्रयत्न हो रहा है, धर्मजागरण के प्रान्त परियोजना प्रमुख श्री अमिय भूषण जी के नेतृत्व में एक दल जिसमे अमरेन्द्र जी सामिल थे मुक्तिनाथ यात्रा पर गया था याह यात्रा पुनः वर्ष प्रतिपदा पर हरिहार क्षेत्र से शुरू होगी, यात्रा गंडक किनारे -किनारे यात्रा  चलेगी और कथा, प्रवचन होगे बड़ी-बड़ी धर्म सभा करने की योजना है.  
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               आशा है की ईस यात्रा से भारत, नेपाल के संबंधो को भी बल मिलेगा सामाजिक समरसता को बढ़ावा मिलेगा नेपाल को पर्यटन की दृष्टि से भी लाभ होगा हमें उम्मीद है की नेपाल सरकार भेद-भाव को ख़त्म करेगी भगवान का मंदिर में पुजारी हिन्दू रखा जायेगा जिससे हिन्दुओ के मन को ठेस न लगे ,यात्रा धर्मजागरण समन्वय बिभाग द्वारा की जाएगी .    

4 टिप्‍पणियां

बेनामी ने कहा…

hinduon me hi dharm ke drohi adhik paaye jaate hain...

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सुंदर पावन स्थल की जानकारी आभार ......

Himwant ने कहा…

इस मन्दीर मे अधिकांश तीर्थ यात्री हिन्दु आते है, चढावा भी उनसे हीं आता है. लेकिन पारम्परिक रुप से बौद्ध युवती यहां की पुजारिन होती है तथा मन्दीर के अन्दर का चढावा उसे हीं प्राप्त होता है. यह परम्परा है मुक्तिनाथ मन्दीर की. इस परम्परा को आप हिन्दु और बौद्धो की समाजिक समरसता के रुप में भी देख सकते हैं, और झगडा करवाने के तर्क के रुप मे भी प्रस्तुत कर सकते हैं। यह हम पर निर्भर करता है की हम चीजो को सकरात्मक रुप से ग्रहण करते है या नकरात्मक.... हवाई जहाज मे भारतीय तीर्थ यात्रीयों से ज्यादा किराया असुलने का विषय को मै चेक करुंगा. वैसे नेपाल मे आम तौर पर नेपाली एवम भारतीयो के लिए प्लेनो मे समान भाडा लगता है. अन्य मुलुक के यात्रीयो को डलर में कई गुणा ज्यादा भाडा देना पडता है..... मुक्तिनाथ के मार्ग मे भारतीय यात्रियों से ज्यादा बस किराया एवम होटल चार्ज लेने का विषय मेरी जानकारी में भी आया है। इस विशय को या तो हम नजरअन्दाज कर सकते हैं, या फिर नेपाल स्थित भारतीय दुतावास इस विशय को उठा सकता है..... आप चीजो को सकरात्मक ढंग से रखें तो आपकी बातों मे दम होता है.

दीर्घतमा ने कहा…

apka sujhaw bahut acchha hai lagta hai ki nepal ke adhikans sthano jo dharmik hai aap nahi gaye hai is nate jankari ka abhaw hai, mai to abhi-abhi muktinath hokar aaya hu ye byastha nepal sarkar ki use apne paryatan ko badhawa dene ke liye samantaa ka byawhar karna chahiye.