धर्म विशेष

परसुराम-----! वंचित बंधुओं को आर्य (श्रेष्ठ ) बनाया---और वे भगवान हो गए-------!

       आर्य संस्कृति का उषा काल ही था जब भृगुवंशी महर्षि जमदग्नि पत्नी रेणुका के गर्भ से अक्षय तृतीया के दिन परसुराम का जन्म हुआ यह वह काल था जब सरस्वती और हषद्वती नदियों के बीच फैले आर्यावर्त में यदु और आर्यावर्त में पुरू, भारत और तस्तु, तर्वस् और अनु, दृहृ और जन्हु, तथा भृगु जैसी आर्य जातियां निवसित थीं, जहाँ विश्वामित्र, जमदग्नि, अंगिरा, गौतम और कण्व ऋषि आदि महापुरुषों के आश्रमों से वेदों के गुंजरित ऋचाएं आर्य धर्म का संस्कार संस्थापन कर रही थीं लेकिन दूसरी ओर सम्पूर्ण आर्यावर्त नर्मदा से मथुरा तक शासन कर रहे हैहयराज सहस्त्रार्जुन के लोमहर्षक अत्याचारों से त्रस्त था ऐसे में युवा अवस्था प्रवेश कर रहे परसुराम ने आर्य-संस्कृति को ध्वस्त करने वाले हैहयराज की प्रचंडता को चुनौती दी और अपनी तेजस्विता, संगठन क्षमता, साहस और अपरिमित शौर्य के बल विजयी हुए यह समय प्रथम राष्ट्र निर्माण का दौर था। 
         भगवान परसुराम के बारे मे तथाकथित जो प्रचार है लगता वह कुछ अधिक ही है वे मानवतावादी थे समग्र समाज को आर्य बनाना चाहते थे उन्होने कृतिवीर्य अर्जुन से यदुवंसियों यानी यदु गोत्र रक्षा की उन्हे 'महिष्मती' नर्मदा तट से सरस्वती तट तक लाने का अद्भुत कार्य कर यदुवंश की रक्षाकी, वे वनवासियों अन्त्यज और दस्यु जातियों को आर्य (श्रेष्ठ) बनाने का कार्य किया यानी मार्ग प्रसस्त किया, आर्यावर्त के गुरुकुल जो अधिकांश भृगुवंशी थे इन गुरुकुलों में सभी को स्किक्षा-दीक्षा की अनुमति थी ये विश्वामित्र के कृति थे इसी कारण वशिष्ठ ऋषि ने महर्षि अगस्त से नेता तोड़कर अलग होकर रह गए थे वे गोत्र शुद्धि के पक्ष में थे विश्वामित्र राष्ट्र व मानव शुद्धि के पक्षधर थे जब हम विचार करते है तो ध्यान में आता है की परसुराम विश्वामित्र धारा के अनुयायी हैं न की वशिष्ठ धारा के, सहस्त्रावहु ने ऋषि जमदग्नि उनकी पत्नी सहित को मारकर सभी गुरुकुलों को नष्टप्राय कर दिया जिससे आर्यावर्त की शिक्षा- दीक्षा समाप्त सी हो गयी थी (परसुराम ऋषि जमदग्नि के पुत्र हैं) इस हेतु कीर्तवीर्य अर्जुन को समाप्त किया, एक प्रकार से कहा जाय तो वे ऋषि विश्वामित्र की प्रति-क्षाया थे अद्भुत पराक्रम, अन्यायियों से संघर्ष, कृतिवीर्य अर्जुन (सहस्त्रवाहु) को 21 बार परास्त किया बार-बार क्षमा करने पर जब वह अपने अत्याचार से बाज नहीं आया यह युद्ध २१ बार हुआ एक तरफ सहस्त्रबाहु दूसरी तरफ अयोध्या नरेश के नेतृत्व में समस्त आर्यावर्त की सेना, 21वें बार उन्होने उसका बध कर दिया और वह भी नर्मदा के किनारे नहीं बल्कि सरस्वती नदी के किनारे जहाँ आर्यों का शासन था वह यहाँ तक अत्याचार के कारण युद्ध करते आया था और वनबासी समाज निर्माण यानी आर्य बनाने की प्रक्रिया ने उन्हे भगवान बना दिया ।
           उस समय आर्यावर्त को संगठित, सुसंकृत, ब्यवस्था, गावों की संरचना व राजनैतिक स्वरूप इन सभी की ज़िम्मेदारी गुरुकुलों की थी जो अधिकांश भृगुओं के पास थे, उस समय सम्पूर्ण पृथ्वी पर आर्यावर्त सर्वाधिक सुसंसकृत था तो यह भृगुओं की तपस्या का परिणाम था, कपोल-कल्पित कथा कि उन्होंने २१ वार क्षत्रियों का संहार किया वास्तविकता कुछ और ही है लोमहर्षिणी और आर्य संस्कृति रक्षार्थ को लेकर सहस्त्रबाहु अर्जुन ने आर्यावर्त के गुरुकुलों को नष्ट करना, भृगु आश्रम को नष्ट ही नहीं तो जमदग्नि सहित आश्रम वासियो को मारडाला ऋषि विश्वामित्र भी अधमरे जैसे ही हो गए था, उस समय परसुराम अपने ननिहाल यानी अयोध्या में थे ज्ञात हो कि परसुराम की माँ 'रेणुका' अयोध्या राजवंश की थी यह दशा देख सारा आर्यावर्त एक होकर महिस्मती नरेश से युद्ध किया जिसका नेतृत्व परसुराम ने किया वे विस्वामित्र की प्रेरणा से सम्पूर्ण जगत को आर्य बनाना ''कृण्वन्तो विश्वमार्यम्'' का उद्घोष कर भगवान कहलाये, महर्षि परसुराम सप्त चिरंजीवियों में से एक हैं अक्षय तृतीया उनके जन्मदिन की पूर्व संध्या पर वे हमारे प्रेरणा के श्रोत बने रहेंगे ।    

2 टिप्‍पणियां

Ramesh Pandey ने कहा…

आदरणीय सूबेदार जी, बहुत ही अच्छी जानकारी आपने लेख के माध्यम से दी है। आपको धन्यवाद। अच्छे लेख के लिए बधाई।

सूबेदार जी पटना ने कहा…

परसुराम ऐसे महापुरुष हैं जिन्होंने आर्य संस्कृति की नीव रखी.
धन्यवाद