धर्म विशेष

अकेले 282 सीट जीतने वाली बीजेपी बिहार में हीन भावना से ग्रसित क्यों---?

          
           ऐसा लगता है की किसी एक ब्यक्ति की महत्वाकांक्षा के लिए पार्टी के बड़े- बड़े नेताओं को अलग- थलग कर पार्टी पर कब्ज़ा जैसा करना जैसे ये बीजेपी न होकर उनकी जेबी पार्टी जैसे लालू या नितीश की पार्टी हो गयी हो आज बिहार में बीजेपी को ३९% वोट मिला है लालू को २८%,नितीश को १५% वोट फिर भी बीजेपी अकेले क्यों नहीं साहस कर पा रही है-? वास्तव में पार्टी और कार्यकर्ता दोनों में आत्म विस्वास है लेकिन जनाधार विहीन नेता जो पार्टी पर कुंडली मारकर बैठे हैं कुछ केंद्रीय नेताओं को विस्वास में लेकर एक- एक कर जनाधार वाले नेताओ को या तो बाहर का रास्ता दिखा दिया गया अथवा उन्हें साइड कर घर बैठाने का प्रयास किया गया, NDA के सरकार में एक मात्र ईमानदार नेता चन्द्रमोहन राय को घर बैठने को मजबूर कर दिया आरा के बिधायक बिहार मे सर्बाधिक प्रतिष्ठित व लोकप्रिय अमरेंद्र कु. सिंह के साथ भी यही ब्यवहार, पार्टी को जनता के बीच ले जाने वाले कार्यकर्ताओं में सर्बाधिक लोकप्रिय पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गोपाल नारायण सिंह को भी बगल का रास्ता दिखाया गया, सी.पी ठाकुर को चुप करा दिया गया, दूसरी तरफ एक नेता जो एक लकड़ी की गोमती में दुकान करते थे वे आज हज़ार करोड़ की पार्टी है, दूसरे नेता जो दो हज़ार करोड़ की पार्टी है जिन्होंने नगरों के अंदर कर बढ़ाया जमीन रजिस्ट्री स्टाम्प ड्यूटी इतनी बढ़ायी अपनी जमीन बेच गरीब की लड़की शादी करना मुस्किल हो गया, आय बढाने के नाम पर बित्तमंत्री ने गाव-गाव में शराब की दुकान खुलवा दिया वे यहीं नहीं रुके पशुपालन मंत्री ने अररिया में अत्याधुनिक पशु बधशाला की नीव डाली यहाँ के बीजेपी के मालिक ने बीजेपी की बैठक में कहा की जैसे हिन्दू मछली, तरकारी खाते हैं उसी प्रकार गाय भी मुसलमानों की तरकारी है एक बड़े नेता जो मज़ार पर चादर चढ़ाने मे नहीं चूकते लेकिन दो-तीन दिन देवघर रुकने कार्यकर्ताओ के आग्रह करने पर भी दर्शन के लिए समय नहीं मिला, यही बीजेपी के नेता हैं उन्ही के बल हिन्दू समाज बीजेपी को वोट करेगा-! लेकिन उन नेताओं को यह नहीं पता जो हिंदुओं की महतारी को तरकारी मानता हो उससे हिंदुओं का संबंध कैसे अच्छा हो सकता है! बिहार बीजेपी को ध्यान रखना पड़ेगा की ये केंद्र का चुनाव नहीं है ये प्रदेश का चुनाव जहां नरेंद्र मोदी फैक्टर काम नहीं करेगा प्रदेश के मुद्दे होगे । 
           ये नेता अपनी महत्वाकांक्षा के चलते किसी भी जनाधार वाले नेता को आगे बढ़ने नहीं देना चाहते यही कारन है की बिहार बीजेपी नेता नितीश को PM मैटीरियल बता रहे थे नरेंद्र मोदी का नाम तक नहीं सुनना चाहते थे, इसलिए पार्टी नहीं वैशाखी चाहिए किसी न किसी से समझौता, जिस पार्टी को लोकसभा में २२ सीट हो गठबंधन सहित ३१ सीट उसे नेता निर्यात करना पड़ता है क्यों की बीजेपी नेता- नेता नहीं हो सकते मैनेजर हो सकते हैं वे जातीय गणित लगाते हैं तो आखिर बीजेपी का नेतृत्व जिस जाती से है उस जाती के कितना वोट है वह तो एक भी प्रतिशत नहीं फिर बिहार में वे किस हैसियत से नेता बन सकते हैं, इतनी बड़ी पार्टी, संघ परिवार के पास इतना बड़ा कैडर लेकिन उसे ४० सीट लड़ने के लिए बाहर से उम्मीदवार लाना पड़ता है ३३% सीट पर बाहरी प्रत्यासी थे जहाँ बीजेपी के कार्यकर्ता आसानी से जीत सकते थे, अभी २४० की बिधानसभा में बीजेपी के पास आयातित उम्मीदवार आने शुरू हो गए है वे कैसे हैं--! जो किसी भी पार्टी में चुनाव नहीं जीत सकते वे आकर बीजेपी में चुनाव जीत कर बिधायक, सांसद हो जाते है लेकिन अब जनता भी जबाब देना शुरू कर दी है जैसे मुजफ्फरपुर स्नातक क्षेत्र से रामकुमार सिंह को सुशील जी ने उम्मीदवार बनाया वे बुरी तरह पराजित हो गए, लोक सभा चुनाव के साथ पाँच बिधानसभा का चुनाव था उसमे क्या हुआ बीजेपी को केवल एक सीट मिली क्यों-? क्या इस पर विचार होगा-! क्या बीजेपी को अपने ऊपर विस्वास नहीं है-? यदि जातीय गणित ही करनी है तो कुछ नेताओ को राजनीती छोड़ मैनेजरी करनी चाहिए नहीं तो पार्टी के हित में जनाधार वाले नेताओं को आगे कर चुनाव जीतना।
          एक बीजेपी के नेता जिन्हे छपास का रोग है बार-बार बयान देते की जदयू के 40-50 विधायक मेरे संपर्क मे हैं कहाँ गए वे नितीश ने कहा की अबतों गेद उनके पाले मे है तोड़ लें विधायको को जनता, कार्यकर्ता और बिरोधियों मे स्वयं हंसी के पात्र बने हुए है और पार्टी को भी हंसी का पात्र बनाते हैं, यदि बीजेपी के नेता बैठकर विचार करें तो भारत में सबसे ख़राब प्रदर्शन बिहार में ही रहा, यदि कार्यकर्ताओं को टिकट दिया गया होता तो बिना किसी समझौते के बीजेपी को तीस सीट मिलती लेकिन नहीं यदि संगठन के कार्यकर्ता जीत कर जाते तो किसी ब्यक्ति के नहीं वे बीजेपी के होते लेकिन इस समय तो अपना आदमी चाहिए जो संगठन की नहीं विशेष ब्यक्ति की बात सुने, इतना ही नहीं केवल मै ही बयान जारी करुगा और कोई नहीं क्योंकी मै ही विचार दे सकता हु यदि कोई बयान जारी भी किया तो उसे वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है इसलिए कोई भी नेता नहीं चाहिए क्यों की अब तो दो-दो मुख्यमंत्री के दावेदार हमारे पास आ गए हैं बीजेपी को तो आत्म विस्वास ही नहीं है अब कार्यकर्ताओ के दुःख-दर्द की बात कौन सुनेगा ----!
       

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