धर्म विशेष

बीजेपी कहाँ हारी है, हारे तो उसके नेता हैं ------!

चुनाव और बीजेपी -------!
         चुनाव समाप्त हो गया अब समीक्षा की घडी है
सभी अपने -अपने प्रकार से समालोचना कर रहे हैं लेकिन आलोचना स्वस्थ होनी चाहिए नीतीश कुमार तो जुलाई से ही चुनाव लड़ रहे हैं विद्यालयों में ड्रेस, सायकिल, व अन्य सामानों की नकद भुगतान किया गया, जब सुखा पड़ा तो नीतीश ने सभी बैंकों द्वारा सभी पीड़ित किसानोंको नकद भुगतान कराया उन्होंने महिलाओं को ३३% आरक्षण की घोषणा की वे बड़ी मीठी जुबान से सबको सम्मोहित करते रहे कभी भी जुबान को ख़राब नहीं किया। 
        उलटे बीजेपी ने क्या किया उसके भी कार्य की समीक्षा करनी होगी ! बीजेपी के १८ महीने की सरकार की समीक्षा से ध्यान में आता है की ठीक चुनाव के समय रेलवे ने प्लेट फार्म टिकट की कीमत २० रु. कर दी देश में गरीब को २० रु भारी पड़ता है, हम पहले से कहते आ रहे हैं की ब्यूरोकेट केंद्र सरकार को पचा नहीं पा रहे हैं, ठीक चुनाव के समय सोनपुर, हाजीपुर व समस्तीपुर में स्टेसनों के मंदिरों को तोडा जाना परंपरा से होती हुई दुर्गा पूजा को बंद कराना, क्या केंद्र सरकार चुनाव ऐसे ही जितना चाहती थी 'बीएसएनएल' से काल होना कितना कठिन है सभी को पता है मंत्री क्या करते हैं कुछ पता नहीं चलता, प्रसार भारती में जब बीजेपी की सत्ता आई तो कोई बीजेपी व संघ वाला नहीं मिला तो स्थान-स्थान पर उन्ही वामपंथियों को ही स्थान दिया गया मुजफ्फरपुर व पटना संघ कार्यालय को पता ही नहीं है की जिनकी नियुक्ति हुई है वे कौन लोग हैं ? कहाँ से आए हैं ! क्या इसी प्रकार केंद्र सरकार के मंत्री चुनाव जीतना चाहते थे ! महगाई चरम पर हैं प्याज, दाल की कीमत घटाई नहीं जा सकती थी १९७७ में मोरारजी देसाई ने कैसे महगाई पर लगाम लगायी थी,  डिजटल इंडिया, मेकिंग इंडिया, बुलेट ट्रैन, स्मार्ट सिटी कौन जानता है बिहार में, बिहार में तो रोजगार चाहिए, रोटी चाहिए, बाढ़, सुखाका हर्जाना चाहिए लेकिन केंद्र के मंत्रियों को कोई होस है ! उनके विभाग में क्या हो रहा है उन्हें खुद पता नहीं !
         जिस अरुण जेटली ने चुनाव हारने, केंद्र में मंत्री बनने के पश्चात दिल्ली  को हराने का श्रेय उन्ही को जाता है असल में वही बिहार के वरिष्ठ सलाहकार हैं उनके सिपहसालारों ने बिहार को ढहा दिया यह बात बीजेपी को समझ में नहीं आती, आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है कोई कहता है की आरएसएस के सरसंघचालक जी के बयान से बीजेपी हार गयी उनका बयान कब आया किसी को मालूम है ! उनका बयान दूसरे चरण के चुनाव के पश्चात आया तो प्रथम चरण में भागलपुर, समस्तीपुर, बेगुसराय, दूसरे चरण में औरंगाबाद, रोहतास इत्यादि जिले आते हैं क्या बीजेपी इन क्षेत्रों में जीती है! समस्तीपुर और बेगुसराय में तो खाता ही नहीं खुला क्या इस पर बीजेपी विचार करेगी इसलिए यह कहना की संघ के सरसंघचालक के बयान का चुनाव पर असर पड़ा बिलकुल गलत है, समीक्षा तो होनी चाहिए की रीढ़ विहीन नेताओं की जिसने आधार वाले नेताओं को पार्टी से दरकिनार कर दिया कौन जनता है ! बिहार बीजेपी नेतृत्व को क्या ये नीतीश और लालू का मुकाबला करेंगे! प्रान्त नेतृत्व के कारन चुनाव बीजेपी हारी इसकी समीक्षा होनी चाहिए और तत्काल इन्हे स्थिपा दे देना चाहिए इसीमें इनका और पार्टी का भला है लेकिन दुर्भाग्य कैसा कोई स्थिपा देने को तैयार नहीं--!
          जहाँ तक वोट का प्रशन है तो बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ा है और लालू, नीतीश, कांग्रेस के वोट का प्रतिशत घटा है २०१० में बीजेपी का प्रतिशत १८ था इसबार २५ है, २०१४ के लोक सभा के चुनाव में बीजेपी गठबंधन को ३९% वोट मिला था अभी गठबंधन को ३४% मत मिला है, ४० से अधिक सीटें ऐसी हैं जहाँ बीजेपी को ६७००० से अधिक वोट मिला है २५ सीटें ऐसी हैं जहाँ एक हज़ार से काम वोटों से बीजेपी हारी है, यह कहना की पिछड़े और दलितों ने बीजेपी को मत नहीं दिया यह गलत है ब्यापारी सवर्ण सब मिलकर लगभग १६% होता है तो यह मत कहाँ से आया वास्तव में बीजेपी को सभी जातियों का मत मिलता है, बीजेपी हिंदुत्व का धार देने में असफल रही बार -बार कहने पर भी 'गोरक्षपीठाधीस्वर योगी आदित्यनाथ' को चुनाव में नहीं बुलाना यह पार्टी पर भारी पड़ा पार्टी सेकुलर बनने के चक्कर में पराजित हो गयी, पार्टी ने बहुत ब्यापक प्रबंध किया लेकिन प्रान्त के प्रबंधन ने पार्टी को पराजित कर दिया कभी भी कोई कार्यक्रम को ठीक से नहीं होने दिया सूचना यहाँ तक है की जो नेता मुख्यमंत्री के दावेदार हो सकते थे उन सभी को हराने हेतु एक वरिष्ठ नेता ने लम्बी फंडिंग की यानी बीजेपी ने बीजेपी को हराने का काम किया, संघ के प्रबंधकों के बार-बार कहने पर भी बीजेपी नेता अनाप -सनाप बोलते रहे, हार की समीक्षा होनी चाहिए लेकिन स्वस्थ होनी चाहिए!                   

3 टिप्‍पणियां

Himwant ने कहा…

नम्बर एक, हर हार में एक सीख छिपी होती है और अगली जीत का एक तोहफा भी। भाजपा के समर्थक संघ के कार्यकर्ता नही होते है। उनका चिंतन स्वतन्त्र होता है। किसी भी राजनितिक समूह के पास वैचारिक थिंक टैंक होना चाहिए, चुनाव बेहद वैज्ञानिक और उच्च तकनीकी वाला विषय बनता जा रहा है। ऐसे में संघ पार्टी को अधिकाधिक कायकारी स्वायतता प्रदान करे यह आवश्यक होता जा रहा है।।

सूबेदार जी पटना ने कहा…

IIsangh kabhi bhi bjp ke karyo me hastaakshep nahi karta, nirnay ke liye wah swatantra h.

omprakash ने कहा…

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