महर्षि जमदग्नि
भारत ऋषियों महर्षियों का देश है महर्षि -- सप्त ऋषियों में से एक हैं जमदग्नि और विश्वामित्र दो शरीर एक आत्मा थे। भृगुवंशी महर्षि ऋचिक के पुत्र थे, ये परसुराम जी के पिता भी थे। जमदग्नि अपनी इंद्र की कठोर तपस्या के लिए जाने जाते हैं जिससे उन्होंने कामधेनु गाय प्राप्त किया था, उससे उनकी जरूरतें पूरी होती थीं । वे बड़े मेधावी थे सोलह वर्ष की आयु में वेदों और शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उनका आश्रम सरस्वती नदी के किनारे पर स्थित था। इनके पांच पुत्र थे रुक्मवान, सुखेड़, वसु, विश्वानस और वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया के दिन इनका पांचवा पुत्र जिन्हे परसुराम के नाम से जाना जाता है, इनको भगवान विष्णु का छठा अवतरण भी माना जाता है।
जमदग्नि का आश्रम
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान परसुराम के पिता महर्षि जमदग्नि की तपोस्थली और आश्रम वर्तमान के उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के बारकोट तहसील ब्रह्मपुरी गांव में यमुना जी के तट पर माना जाता है। इसके अतिरिक्त कुछ मान्यताओं के अनुसार उनका सम्वन्ध उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले जमानिया और हरियाणा के कैंथल से भी माना जाता है। हम यह समझ सकते हैं कि महर्षि जमदग्नि ऋषि थे उनका कार्य समाज को दिशा देना, संस्कार सहित शिक्षा देना था इसलिए उनके कई आश्रम रहे होंगे, कई स्थानों पर तपस्या किया होगा लेकिन उनका मुख्य आश्रम आर्यावर्त सरस्वती नदी के किनारे रहा होगा। वे सप्तऋषियों में से एक थे उनके नाम से जमदग्नि गोत्र भी है। हैहयवंशी कृतवीर्य अर्जुन जिसका शासन व राजधानी नर्मदा जी के किनारे था, कृतवीर्य अर्जुन बहुत अत्याचारी राजा था। उसने कामधेनु गाय की प्रसिद्धि सुनकर वह एक बार महर्षि जमदग्नि के आश्रम में जाता है और वहाँ उसनें कामधेनु गाय को देखा। कामधेनु गाय के गोरस भंडार से ऋषि अतिथियों का स्वागत सम्मान किया करते थे, कृतवीर्य अर्जुन यह सब देखकर उस कामधेनु को अपने साथ ले जाने के लिये तत्पर दिखाई देता है। लेकिन महर्षि जमदग्नि कामधेनु देने से मना कर देते हैं, वह निराश हो वापस चला जाता है । फिर वह कामधेनु के लिए महर्षि जमदग्नि के आश्रम पर हमला कर देता है आश्रम वासियों को बड़ा कष्ट होता है और महर्षि जमदग्नि सहित लगभग सभी ब्रम्हचारियों की हत्या कर कामधेनु को लेकर चला जाता है।
महर्षि जमदग्नि का योगदान
भृगुपुत्र महर्षि जमदग्नि गो वंश रक्षा पर ऋग्वेद में सोलह मन्त्रों के मंत्रदृष्टा हुए, इन ऋचाओं में जो दर्शन किया यानी शोध किया उसमें गोवंश के पालन पोषण गाय माता का समाज हेतु योगदान गो माँ के शरीर में देवताओं का वास इन सब के बारे में विस्तृत शोध किया है और वैदिक काल से आज तक गाय माता का केवल महत्व ही नहीं पूजनीय भी बन गई हैं बिना गाय के दूध के कोई भी भगवान के पूजा का प्रसाद नहीं होता विना गाय के मनुष्य को मोक्ष नहीं मिलता ऐसी आज भी मान्यता है। जैसा कि हम सभी की मान्यता है कि वेद अपौंरुसेय है इसलिए कोई भी ऋषि महर्षि वेद मन्त्रों के रचनाकार नहीं हो सकते सभी ऋषि जिनका नाम ऋचाओं से जुड़ा हुआ हैं वे सभी मंत्रदृष्टा हैं न कि मन्त्रों के रचयिता! इसलिए चाहे जो भी ऋषि हैं वे सभी मंत्रदृष्टा हैं उन्होंने मन्त्रों को देखा और अपने वैदिक अनुसार शोध किया इसलिए उन्हें मंत्रदृष्टा कहा गया है न कि रचयिता। मान्यता है कि महर्षि जमदग्नि को अपनी धर्म पत्नी रेणुका के चरित्र के बारे में कुछ शंका हो गई हालाकि परसुराम की माँ रेणुका पतिब्रता थीं। कुछ और भी कारण हो सकते हैं, महर्षि ने अपने पुत्रों से अपनी पत्नी की हत्या करने के लिए आज्ञा दी कोई भी पुत्र ने माँ की हत्या के लिए तैयार नहीं हुआ तब पिता के आज्ञाकारी पुत्र परशुराम ने अपने पिता की आज्ञा मानकर अपनी माँ की हत्या कर देते हैं। महर्षि जमदग्नि जब परशुराम से कोई वर मागने के लिये कहते हैं तो फिर परशुराम अपनी माँ का जीवन मांग लेते हैं। महर्षि तो त्रिकाल दर्शी हैं वे जानते थे कि रेणुका निर्दोष है लेकिन अपने पुत्रों की परीक्षा हेतु रेणुका की हत्या का आदेश दिया था। जब परशुराम ने अपनी माँ को क्षमा करने का और माँ को जीवन प्रदान करने को मांगा तो महर्षि बहुत प्रसन्न हुए और आयुर्वेद औषधि द्वारा रेणुका को जीवित कर दिया और परसुराम कोई बहुत सारा आशीर्वाद दिया।
ब्रम्हर्षि विश्वामित्र और महर्षि जमदग्नि
जब भी जमदग्नि की बात होगी तो बिना ब्रम्हर्षि विश्वामित्र के अधूरी ही रहेगी इसलिए इन दोनों के सम्वधो की चर्चा आवश्यक है। महर्षि जमदग्नि और ऋषि विश्वामित्र दोनों मामा भांजे थे दोनों दो शरीर एक आत्मा जैसे थे, एक को चोट लगती दर्द दूसरे को होता था। जब वे महर्षि अगस्त और लोपामुद्रा के गुरुकुल में पढ़ते थे तो ऋषिका लोपामुद्रा ने विश्वामित्र का चुम्बन कर आलिंगन कर लिया फिर क्या था? जमदग्नि बहुत नाराज हो गया लोपामुद्रा को जमदग्नि का भी चुम्बनकर आलिंगन करना पड़ा। शिक्षा पूरी होने के पश्चात् दोनों एक साथ ही अधिकांश समय बिताते थे। राजा हरिश्चंद्र को वरुण देव के श्राप से जलोधर रोग हो गया था वरुण देव मनुष्य ही नहीं तो उनके पुत्र रोहिताश की बलि चाहते थे, बड़ा ही असमंजस की स्थित हो गई थी एक ही पुत्र था महाराजा को फिर एक अजीगर्त नाम के ब्राह्मण से उनके पुत्र सुनः शेप को खरीदकर यज्ञ बलि देना तय हुआ। महर्षि वशिष्ठ नरवलि के बहुत विरोध में थे, लेकिन विश्वामित्र यह जानते थे कि यदि कोई और ऋषि यज्ञ में गया तो नरबलि करा सकता है! इसलिए महर्षि विश्वामित्र और महर्षि जमदग्नि दोनों यज्ञ कराने के लिए गये। उधर सुनाःशेप विश्वामित्र से बहुत प्रभावित था वह उन्हें देखना और सुनना चाहता था उसे लगा की क्यों न मेरी बलि हो लेकिन ऋषि के दर्शन तो हो जाएंगे। समय आ गया सुनाःशेप को एक खम्भे में बांधा गया अब यज्ञ शुरू हो गया ज्यों -ज्यों विश्वामित्र और जमदग्नि मंत्र बोलते वो मंत्र सुनाःशेप उसे आत्मसात कर लेता और धीरे -धीरे वो मंत्र दृष्टा हो गया राजा का उदर पचने लगा साथ ही सुनाःशेप बंधन से मुक्त होने लगा और विश्वामित्र की गोंद में आ गिरा सारे जगत में उत्साह का वातावरण बन गया। अब सुनाःशेप विश्वामित्र का मानस पुत्र बन चुका था अब वह उनका आध्यात्मिक उत्तराधिकारी हो गया।
जब पुत्र ने पिता की हत्या का बदला लिया
जब महर्षि के आश्रम पर कृतवीर्य अर्जुन ने हमला किया था उस समय परशुराम अपने ननिहाल अयोध्या जी गये हुए थे समाचार मिलते ही वे द्रुत गति से सरस्वती नदी के किनारे अपने आश्रम पहुँचे। उन्होंने सब कुछ देखा और हैरान हो गये एक रथ पर विश्वामित्र घायल अवस्था में दिखाई पड़े परशुराम ने विश्वामित्र से पूछा कि बाबा ये सब कैसे हुआ आप तो अकेले ही सबको मार सकते थे विश्वामित्र बोले पुत्र मैं सन्यास धर्म का पालन कर रहा था इस कारण हथियार नहीं उठाया। कृतवीर्य अर्जुन इक्कीस भाई था जब परशुराम ने अपने ननिहाल व सम्पूर्ण आर्यावर्त की सेना के सहयोग से कृतवीर्य पर हमला किया उसनें अपने अठरहो भाई को बारी -बारी सेनापति बनाकर युद्ध किया लेकिन सभी मारे गये। अब समाज में एक ऐसी किब्दन्ति फैली कि भगवान परशुराम ने इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार किया लेकिन वास्तविकता यह है कि उनके साथ सम्पूर्ण आर्यावर्त की सेना थी और कृतवीर्य अर्जुन सहित सभी भाई बारी -बारी अपनी सेना सहित मारे गए। इसी को इक्कीस बार क्षत्रियों का बध बताया गया है जबकि वास्तविकता यह है क़ि कृतवीर्य अर्जुन सहित सभी इक्कीस भाई मारे गए थे।
एक निरेटिव यह भी
वास्तविकता यह है कि पहले बौद्ध मतावलम्बियों ने हिंदू समाज को नीचा दिखाने आपस में कटुता पैदा करने के लिए निरेटिव सेट किया कि इक्कीस बार क्षत्रियों का धरती विहीन कर दिया था परशुराम ने इसी निरेटिव को बामपंथियो ने आगे बढ़ाया पिछले सत्तर सालों में अनपढ़ कांग्रेसियों ने इसी निरेटिव को आगे किया हम हिंदू समाज को यह समझना चाहिए कि भगवान परशुराम ऐसा कर ही नहीं सकते उनके साथ युद्ध में कौन लड़ा ऊपर मैंने दर्शाया है। आशा है पाठकों को अपने बुद्धि व विवेक से काम लेने की आवस्यकता है।


1 टिप्पणियाँ
आपने महर्षि जमदग्नि के बारे में काफी विस्तार से और दिलचस्प तरीके से लिखा है। मैं पढ़ते हुए कई नई बातें जान पाया, खासकर उनके जीवन और परशुराम से जुड़े प्रसंग। आपने पौराणिक कथाओं को अच्छे से जोड़ा है, जिससे पढ़ना बोझिल नहीं लगता।
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