सत्य सनातन वैदिक हिंदू धर्म...!

मानव जीवन का विकास 

भारतीय बांगमय में मानव जीवन की उत्पत्ति एक अरब छानबे करोड़ आठ लाख वर्ष से पहले का माना जाता है। जब मनुष्य का प्रदुर्भाव धरती पर हुआ तो स्वाभाविक है कि वह असभ्य रहा होगा, भोजन करने की विधा, पानी पीने की विधा उसे नहीं पता रहा होगा जैसे -तैसे वह जीवन व्यतीत करता रहा होगा। यह सब संभव है आज जैसे कीड़े मकोड़े रहते हैं हो सकता है कि मनुष्य भी उसी प्रकार रहता रहा हो इसका कोई पुख्ता प्रमाण हमारे पास नहीं है।

पहले मनुष्य जंगलों में रहता था धीरे -धीरे वह नदियों के किनारे रहने लगा इसलिए हमारा जीवन पहले वनीय फिर नदीय हो गया। इसका प्रत्यक्ष प्रणाम यह है कि आज भी हिन्दू समाज में जंगलों का वड़ा महत्व है जमीन, जंगल की सुरक्षा स्वाभाविक है सनातन धर्म ने प्रत्येक पेड़ पौधों में आत्मा देखता है, उसमें जड़ी बूटी की खोज करता है इतना ही नहीं आज भी एक पुत्र के बदले पांच पेड़ लगाना ये सनातन की मान्यता है। पीपल के पेड़ को काटना तो दूर रास्ते में पड़ने वाले पीपल पेड़ उसके बाये से भी कोई नहीं जा सकता वह दाहिने से जायेगा, पीपल हमें चौबीस घंटे एक्सीजन देता है उसकी जड़ से लेकर पत्ते तक औषधि है। ऐसे तुलसी जी का पौधा है उसे प्रत्येक हिंदू अपने घर के अंदर आँगन में लगता है ठंढी के समय पाला न लगे वह सूखने न पाये इसलिये उसके नीचे दिया जलाया जाता है ऐसे ही प्रत्येक पड़ पौधों की समाज सुरक्षा करता है। भारतीय समाज में नदियों का भी जंगलों से कही अधिक महत्व दिया जाता है जल ही जीवन है इतना ही नहीं प्रत्येक नदी को गंगाजी के समान ही महत्व दिया जाता है प्रत्येक नदी पर त्योहारों पर स्नान की परंपरा है इतना ही नहीं जब हम किसी नदी को पार करते है तो अपनी जेब टटोलते हैं और एक रूपये दो रुपये का सिक्का नदी में बड़ी श्रद्धा से डाल देते हैं। और उसकी पूजा करते हैं हां कुछ प्रगतशील अथवा वामपंथी इसका मज़ाक बना सकते हैं और यह हमारी श्रद्धा लाखों करोड़ों वर्षो से चली आ रही है यह हमारे जीवन जीने की कला अथवा जीवन का विकास कह सकते हैं। जिस नदी में बहुत सारे जीव -जंतु रहते हैं हम पूजा के बहाने उनके लिए भोजन की व्यवस्था करते हैं जिसे हम मानवता कह सकते हैं।

वेद अपौरूशेय जो पहली बार सरस्वती नदी के किनारे 

धीरे -धीरे मानव जीवन का विकास हुआ, ईश्वर ने हमें वेद नामक ग्रन्थ दिया वह ग्रन्थ लिपिवद्ध नहीं था, ईश्वर ने सर्व प्रथम आदित्य, अग्नि, वायु और अंगिरा इन चार ऋषियों के कंठ में वेद दिया इन चारों ऋषियों ने ब्रह्मा जी को यह ज्ञान दिया। हिंदू समाज अपने घरों में ब्रह्म जी के चीत्र लगाता है जिसमें ब्रह्म जी के चार मुख दिखाया गया है लेकिन क्या किसी के चार मुख हो सकता है तो नहीं! ये चार मुख नहीं चुकि ब्रम्हा जी पहले ऋषि थे जिन्हें चारों वेदों का ज्ञान था इसलिये उनके चार मुख दर्शाया गया है। सनातन धर्म में देवताओं में सर्वाधिक महत्व ब्रम्हाजी का ही क्यों है? यह भी समझने की आवस्यकता है जैसा कि हमने ऊपर बताया है कि हमारा जीवन नदीय जीवन है और उन नदियों में सर्वाधिक महत्व सरस्वती नदी का है। सरस्वती को वाग्देवी यानी विद्या की देवी कहा जाता है क्योंकि ब्रम्हाजी ने सरस्वती नदी के किनारे प्रथम गुरुकुल खोलकर वेदों की शिक्षा सम्पूर्ण मानव समाज को देने की प्रक्रिया शुरू किया। धीरे -धीरे अपने मानस पुत्रों द्वारा, अगस्त, वशिष्ठ, विश्वामित्र, जमदागनी जैसे ऋषियों ने वेदों के इस ज्ञान को सम्पूर्ण मानव समाज को देने का काम किया।

भारतीय बौद्धिक परिवेश में ज्ञान का सृजन व्यापक सामाजिक -सांस्कृतिक सन्दर्भॉ में होता है। यहाँ ज्ञान और जीवन, लौकिक और पारलौकिक के मध्य एक समग्रता है। किसी भी विद्या को उसके नैतिक और आध्यात्मिक आयाम से पृथक करना असंभव था, चिकित्सा (आयुर्वेद ), स्थापत्य (वास्तु ) या खगोल (ज्योतिष ) सभी का प्रस्तुतीकरण एक समग्र वैश्विक दृष्टि के साथ होता था। यहाँ संस्कृति केवल रीति रिवाजों का पुंज नहीं, अपुती मानवीय अनुभओ का यह एक विक्षेप है जो पीढ़ी दर पीढ़ी जीवन को सुदृढ़ करता है । भारतीय संस्कृति में ज्ञान एक जीवन- शैली के रूप में प्रतिष्ठित रही है, जहाँ संस्कार, अनुष्ठान और नैतिक अनुशासन ज्ञान के अभ्यास के अभिन्न अंग थे। ज्ञान की प्रमाणिकता प्रयोगशाला की अपेक्षा जीवन के प्रत्यक्ष और व्यावहारिक अनुभव से सिद्ध होती थी।

हमारे ऋषियों ने वैदिक आधार पर मनुष्य के संस्कारो को विकसित करने का काम किया वैदिक मंत्रदृष्टा "ऋषिका सूर्या सावित्री" ने विवाह वंधन करते समय सात संकल्प सात फैरों के रूप में लिया जाता है उस वेद मंत्र की दृष्टा हैं। जब फेरे शुरू होते हैं तो प्रथम फेरे के साथ दूल्हे को और दुल्हन को संकल्प लेने होते हैं जो क्रमशः लिये जाते हैं, वे वेद मंत्र हैं जो इस प्रकार हैं। विवाह संस्कार में पाणिग्रह, अग्नि -परिणय (फेरे ) और सप्तपदी के दौरान पवित्र वैदिक मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है जो वर वधू के अटूट सम्वन्ध, प्रेम और कर्तव्यों से बांधते हैं। ये वेदमंत्र ऋग्वेद और यजुर्वेद से लिये गये हैं, जो दाम्पत्य जीवन में सुख समृद्धि की कामना करते हैं।

प्रमुख वैदिक मंत्र और अवसर : 

पाणिग्रह संस्कार (हाथ थामना ) :- "ऊँ गृभणामि ते सौभगत्वाय हस्तँ मया पत्या जरदष्टिर्य थास:। भगो अर्यमा सविता पूरन्धिर्महा त्वादुर्गारहपत्याय देवा:।। " (मैं सौभाग्य के लिए तुम्हारा हाथ थामता हूँ ताकि हम वृद्धा अवस्था तक साथ रहें)।

अग्नि परिणय :- वधू अग्नि के चारों ओर घूमती है और वर मंत्रो के माध्यम से भोजन, शक्ति, धन सुख, पशुधन, ऋतुओ के अनुसार प्रसन्ता और मित्रता (सप्तपदी ) की प्रतिज्ञा करते हैं।

सप्तपदी (7वचन ) --- पहले वचन में भोजन, दूसरे में बल, तीसरे में धन, चौथे में पशुधन, छठे में ऋतु -सुख और सातवे में मित्रता (सहचरी ) के लिये मंत्र पढ़े जाते हैं। 

विवाह के लिए अन्य मंत्र :- सिंदूरदान /आशीर्वाद "ओइम मंगलम भगवान विष्णु मंगलम गरुड़ध्वज। मंगलम पुण्डरीकाक्ष:, मंगलम तनो हरि :।।"

सनातन धर्म में सोलह संस्कारों का वर्णन पाया जाता है जो जन्म से लेकर मृत्यु संस्कार तक ब्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए निर्धारित 16 महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है। ये संस्कार गर्भधान से लेकर मृत्यु संस्कार तक जाते हैं, जो जीवन की सुद्धि, अनुशासित lऔर ईश्वर के समीप ले जाने की कामना करते हैं।

सोलह संस्कार 

1.गर्भधान --उत्तम संतान हेतु गर्भधारण 

2. पुंसवन - सत्य एवं मेधावी संतान के लिए जो दूसरे - तीसरे माह में किया जाता है।

3. सिमनतोन्नयन - गर्भवती स्त्री की मानसिक प्रसन्नता और रक्षा के लिए जिसे तीसरे और चौथे महीने में।

4. जातकर्म - जन्म के पश्चात् बालक की बुद्धि और आयु बृद्धि हेतु।

5. नामकरण संस्कार -  बालक अथवा बालिका का मंगमय नामकरण करना।

6. निष्क्रमण संस्कार - सूर्य या चंद्र के दर्शन हेतु पहली बार बाहर रखना।

7. अन्नप्रासन संस्कार - छः महीने पूरा होने पर अन्न ग्रहण कराना।

8. चूड़ाकर्म संस्कार - मुंडन करवाना यानी प्रथम बार सिर का बाल छिलवाना,( बाल हटाना )।

9. कर्णवैध संस्कार - स्वस्थ लाभ हेतु कराना (कर्ण छेदन )।

10. विद्यारम्भ संस्कार - गुरुकुल में बच्चे का प्रवेश कराना।

11. उपनायन संस्कार - गुरुकुल में प्रवेश हेतु उपनयन संस्कार कराना यानी जनेऊ संस्कार।

12. वेदारम्भ संस्कार - वेदों का अध्ययन शुरू कराना।

13. केशान्त संस्कार - गुरुकुल में पहली बार दाढ़ी मूछ बनवाना।

14. समावर्तन संस्कार -शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् घर वापस जाना।

15. विवाह संस्कार - विवाह करके गृहस्थ जीवन में प्रवेश करना।

16. अन्तेष्टि संस्कार - मृत्यु के पश्चात् अंतिम संस्कार को अन्तेष्टि संस्कार कहते हैं।

मानव जीवन का विकास क्रम 

धीरे -धीरे हमारे ऋषियों-मुनियों ने महापुरुषों ने मानव जीवन के विकास क्रम में योगदान दीया जिससे वे आज पूज्य हो गये, क्या खाना क्या नहीं खाना! क्या पहनना क्या नहीं पहनना धीरे -धीरे सबका विकास क्रम शुरु हो गया कहा घर बनाना कैसे घर बनाना पहले घास खर -पतवार का घर फिर धीरे -धीरे मानव जीवन एक साथ रहने की कल्पना में गांव विकसित हुए ये गांव अधिकांश नदियों के किनारे बसने लगे चुकि यातायात नदीय मार्गो से होकर जाने लगा। फिर बहुत सारे तीर्थो का निर्माण नदियों के किनारे धीरे धीरे इन महापुरुषों में हमने ईश्वर का दर्शन किया फिर मंदिरो का निर्माण भी नदियों के किनारे होने लगा। फिर हमारे ऋषियों ने चिंतन शुरू किया कि मनुष्य का जीवन कैसे जियेगा? सुबह का जागरण अति प्रातः काल जागना नित्यष्क्रिया से निबृत होना यानी क्या -? शौच के पश्चात् हस्त प्रच्चछालन फिर स्नान ध्यान यानी अपने इष्टदेव की पूजा अर्चना, अपने कपड़ो को स्वच्छ रखना यह सब प्रक्रिया करते हैं उसका विकास क्रम आज भी जारी है। आज आप विश्व में किसी देश में जाएंगे तो शौचालय में हाथ धोने की व्यवस्था, पानी पीने की ब्यवस्था, कपड़े धोने की ब्यवस्था, स्नान की व्यवस्था इत्यादि नहीं पायी जाती। इस्लामिक जगत में तो बधना का उपयोग किया जाता है जिसे शौच जाने के पश्चात् साफ नहीं किया जाता इतना ही नहीं तो हाथ को भी ठीक से धोते नहीं।

ज्ञान के विभिन्न श्रोत 

ज्ञान के श्रोतों को बहुमखी स्वीकारिता है, पाश्चात्य ज्ञान -पद्धतियों में प्रायः ज्ञान के श्रोत सीमित होते हैं मुख्यतः तर्क या प्रत्यक्ष प्रयोग जबकि भारतीय परंपरा में "वेद" अपौंरूशेय  और "स्मृति" परंपरा और रक्षित ज्ञान "अनुभव और तर्क" ये सभी ज्ञान के प्रमाण हैं। इन श्रोतों का समन्वित और परस्पर पूरक स्वरुप ही ज्ञान को सजीव बनाता है। श्रुति परंपरा ज्ञान की वह आध्यात्मिक आधार शिला है जिसे मनुष्यों ने नहीं निर्मित किया अपितु ऋषि परंपरा में अनुभूति किया यानी वेदों के आधार पर। स्मृति परंपरा मानव -संस्कृति में उस ज्ञान के रूपांतरण और परिक्षण की प्रक्रिया है, जो तर्क विचारों का शोधन करता है और अनुभव उन्हें व्यावहारिक अधिष्ठान प्रदान करता है।

हिंदू जीवन दर्शन आज विश्व का सर्वश्रेष्ठ जीवन दर्शन है जिसमें पर्यावरण का सरक्षण, जियो और जीने दो की परिकल्पना, हिंदू धर्म में चींटी को चारा देना ऐसे तमाम पशु -पक्षियों को किसी न किसी त्योहारों पर नियमित भोजन कराना यानी सभी जीव -जंतुओं का संरक्षण करने की परिकल्पना यह सभी हिंदू समाज की विशेषता है इसलिए अहिंसा परमो धर्मं: शाकाहार को सर्वश्रेष्ठ आहार मानना यह हमारी विशेषता रही है वास्तव में यही है सनातन धर्म, यही है हिंदू जीवन पद्धति जिससे मानवता सुरक्षित रखने की गारंटी देता है यही है सनातन हिन्दू धर्म यह सब हिंदू समाज की विशेषता है। जिसे धीरे -धीरे सारा विश्व केवल आकर्षित ही नहीं हो रहा बल्कि किसी न किसी माध्यम से सनातन धर्म को अपना भी रहा है। चाहे आर्य समाज हो, इस्कान हो, आर्ट ऑफ़ लिविंग हो, गायत्री परिवार हो अथवा योगदा सोसायटी इत्यादि आध्यात्मिक संगठनों द्वारा सनातन धर्म सारे विश्व में केवल आकर्षक का केंद्र ही नहीं तो वढ़ता जा रहा है।

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