ऋषि भारद्वाज
भारद्वाज ऋषि वैदिक कालीन ऋषि थे, वे वेदों में मंत्रदृष्टा भी थे ऋग्वेद के छठे मण्डल के कई ऋचाओं के मंत्रदृष्टा थे। इससे यह सिद्ध होता है कि वे वैदिक कालीन ऋषि थे, लेकिन उनका वर्णन रामायण में भी आता है और भगवान श्री राम उनके यहाँ वनवास जाते समय और लौटते समय मिलने गये थे इसका अर्थ यह भी निकलता है कि वे त्रेता युग में भी थे। तो क्या किसी मनुष्य की आयु इतनी लम्बी हो सकती है, यह माना जा सकता है कि भारद्वाज ऋषि एक पीठ का नाम हो क्योंकि दोनों युगों में लम्बे समय का अंतर है। जब सृष्टि का निर्माण हुआ उसी समय वेदों का भी प्रदुर्भाव हुआ था जिसे हम कह सकते हैं कि एक अरब छानबे करोड़ आठ लाख वर्ष पहले वैदिक काल शुरू हुआ था। त्रेता युग वैदिक युग नहीं था त्रेता युग.12 लाख 96 हजार वर्ष का, द्वापर आठ लाख चौषठ वर्ष और कलियुग बीते 5100 वर्ष हुए कुल मिलाकर लगभग 22 लाख वर्ष पहले त्रेता युग शुरू हुआ था। वैदिक काल इसके पहले था भगवान श्री राम त्रेता के अंतिम में आये थे तो किसी भी मनुष्य की आयु इतनी लम्बी कैसे हो सकती है ? इसका मतलब भारद्वाज एक पीठ से सम्बंधित है जो ऋषि उस गद्दी पर बैठता उसे भारद्वाज ऋषि ही कहते थे।
ग्रंथों में ऋषि भरद्वाज
पौराणिक कथाओं के अनुसार महर्षि भारद्वाज का जन्म देवगुरु बृहस्पति और ममता के पुत्र के रूप में हुआ था। एक अन्य कथानुसार मारुद गणों को गंगा नदी के किनारे एक नवजात शिशु मिला जिसे भरत ने गोंद लिया और भारद्वाज नाम रखा, वे सप्तऋषियों में से एक थे और ऋग्वेद के मंत्र दृष्टा थे। महाभारत के अनुसार भारद्वाज का अर्थ है भरण पोषण करने वाला अथवा जिसका पोषण किया गया हो। एक कथानुसार मारुद गणों ने जब इस शिशु को पाया तो उन लोगों ने राजा भरत और शकुंतला को सौंप दिया। वे आयुर्वेद के प्रथम ऋषि हैं, उनका आश्रम प्रयागराज में गंगा नदी के किनारे स्थित था। जहाँ रामायण काल में भगवान श्रीराम और सीताजी ने विश्राम किया था, वे भारद्वाज गोत्र के प्रवर्तक माने जाते हैं और द्रोणाचार्य के पिता भी माने जाते हैं।
चरक संहिता के अनुसार भारद्वाज ऋषि ने इंद्र के द्वारा आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था।रिक्तन्त्र के अनुसार ब्रम्हा, बृहस्पति और इंद्र के पश्चात् वे चौथे व्याकरण के प्रवक्ता थे। उन्होंने व्याकरण का भी ज्ञान इंद्र से प्राप्त किया था, महर्षि भृगु ने उन्हें धर्मशास्त्र का उपदेश दिया था। तमसा तट पर "क्रोचबध" के समय भारद्वाज ऋषि बाल्मीकि ऋषि के साथ थे, बाल्मीकि रामायण के अनुसार भारद्वाज ऋषि बाल्मीकि ऋषि के शिष्य थे। महर्षि भारद्वाज व्याकरण, आयुर्वेद सहित धनुर्वेद, राजनीति शास्त्र, यंत्रसर्वस्व, अर्थशास्त्र शिक्षा आदि पर अनेक ग्रंथों के रचनाकार भी हैं। वायु पुराण के अनुसार उन्होंने आयुर्वेद संहिता भी लिखी जिसके आठ भाग करके अपने शिष्यों को पढ़ाने का कार्य किया करते थे। चरक संहिता के अनुसार उन्होंने अत्रेय पुनर्वसु को काय चिकित्सा का ज्ञान प्रदान किया था।
प्रयागराज के संस्थापक
ऋषि भारद्वाज को प्रयागराज का प्रथम निवासी कहा जाता है, अर्थात ऋषि भारद्वाज ने ही प्रयागराज को बसाया था। प्रयागराज में ही विश्व का सबसे वड़ा गुरुकुल की स्थापना किया था और हज़ारों वर्षो तक विद्या अध्ययन चलता रहा। वे शिक्षा शास्त्री, राजतन्त्र के मर्मज्ञ, अर्थशास्त्री, शस्त्रविद्या विशारद, आयुर्वेद विशारद, विधि वेत्ता, अभियांत्रिकी विशेषज्ञ, विज्ञानवेत्ता, और मंत्रदृष्टा थे ऋग्वेद के छठे मण्डल के मंत्र दृष्टा ऋषि भारद्वाज ऋषि ही हैं। इस मण्डल में 765 मंत्र हैं, अथर्वेद में भी ऋषि भारद्वाज के 23 मंत्र हैं। वैदिक ऋषियों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है, इनके पिता बृहस्पति और माँ ममता थीं।
ऋषि भारद्वाज को आयुर्वेद और सावित्रय अग्नि विद्या का ज्ञान इंद्र और कालांतर में ब्रम्हा जी द्वारा प्राप्त हुआ था। अग्नि के सामर्थ्य को आत्मसात कर ऋषि भारद्वाज ने अमृत तत्व प्राप्त किया था और स्वर्ग लोक जाकर आदित्य से सायुज्य प्राप्त किया था।
(तै. ब्राह्मण 3/10/11)
संभवतः इसी कारण ऋषि भारद्वाज सर्वाधिक आयु प्राप्त करने वाले ऋषियों में से एक थे, चरक ऋषि ने उन्हें अपरिमित आयु वाला बताया है।
(सूत्र -स्थान 1/26)
ऋषि भारद्वाज ने प्रयागराज के अधिष्ठाता भगवान श्री माधव जो साक्षात् श्री हरि हैं की पावन परिक्रमा की स्थापना भगवान श्री शिवजी के आशीर्वाद से की थी। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री द्वादश माधव परिक्रमा शांसार की पहली परिक्रमा है। ऋषि भारद्वाज सप्त ऋषियों में से एक हैं दीर्घायु वाले ऋषि हैं, हमारे ऋषि केवल साधू नहीं थे सभी शोधकर्ता ऋषि थे, समाज को दिशा देना गांव, नगर जीवन मनुष्य कैसे निरोग रहेगा, मनुष्य जो नदीय और वनीय संस्कृति वाला था कैसे गांववासी बने कैसे नगरीय जीवन हो इन सारे विषयों के शोधकर्ता थे ऋषि। कैसे कृषि की जाय गाय को माता धरती को माता इन सभी का जीवंत दर्शन ऋषियों ने दिया उसमें से सप्त ऋषियों में भारद्वाज ऋषि।

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