धर्म विशेष

महर्षि मनु और मनुस्मृति----------!


भारत का प्रथम विधान
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आज आये दिन मनु भगवान के बारे में बिना किसी अध्ययन और जानकारी के उल-जलूल बातें करना फैशन सा बन गया है आखिर ये महर्षि मनु कौन थे-! भारतीय वांग्मय पर शायद ही इतना प्रभाव किसी महापुरुष का हो, सुदूर गाव के बच्चे से लेकर शहरी विद्वानों तक मनु को ही आदर्श मानना तथा- कथित वामपंथी, समाजवादी और प्रगतिशील आलोचना के रूप में ही सही बिना महर्षि मनू के अपनी लेखनी चला नहीं पा रहे हैं तो ये कौन थे-? हिन्दू विचार (विज्ञान) के अनुसार प्रत्येक चतुर्युगी के पश्चात पृथ्बी का प्रलय होता है फिर भगवान मनु सृष्टि की रचना करते हैं मनु इस धरती के प्रथम राज़ा और संविधान निर्माता थे, उन्होने ही मानव जाती को जीवन जीने की कला, गाव, समाज निर्माण, वैदिक शिक्षा, परिवार ब्यवस्था, क्या खाद्य, क्या अखाद्य-! रहन-सहन सिखाया वे अपनी सभी संतानों से समान प्रेम करते थे, महर्षि मनु की ही देन है कि शूद्र कुलीन ऋषि कलश यलुष, दीर्घतमा मामतेय जैसे वीसों वैदिक ऋषि हुए जो मन्त्र द्रष्टा हुए जिन्होंने वेदों की ऋचाओं का दर्शन किया और ऐतरेय ब्राह्मण ग्रन्थ लिखने वाले ऋषि महिदास एतरेय भी शूद्र कुल के होते हुए भी इतना महान वैदिक ग्रन्थ की रचना--! यह महान मनु की ही देन कह सकते हैं । 

वैज्ञानिक कालगणना
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भारतीय चतुर्युगी और मन्वन्तर काल गणना पद्धति के अनुसार आज जो हमारा सृष्टि सम्बत है एक अरब, छियानबे करोड़, आठ लाख, तिरपन हज़ार, नवासी वर्ष बीत चुके है और यह छियासीवाँ सृष्टि चल रहा है इकहत्तर चतुर्युगी का एक मन्वन्तर होता है स्वायम्भुव, स्वारोचिष, औत्तमी, तामस, रैवत, चाक्षुस ये छः मन्वन्तर बीत चुके हैं सातवां वैवस्वत मन्वन्तर चल रहा है और इसका कलयुग इस समय चल रहा है इस सृष्टि उत्पत्ति के समय को सुनकर पाश्चात्य और आधुनिक लोग अत्यधिक आश्चर्य करते हैं और विस्वास भी नहीं करते, उन्हें यह जिज्ञासा होती हैं की कालगणना का इतना लम्बा हिसाब कैसे रखा उन्हें यह नहीं पता की इस गणना को भारतियों ने तो पल और पहर तक का हिसाब रखा हुआ है, एक प्रश्न के उत्तर में स्वामी दयानंद ने कुछ पादरियों को उत्तर देते हुए बताया की हमारे यहाँ कोई भी शुभ कार्य होने पर एक संकल्प कराने की परंपरा है उसमे '' वैवस्वत मन्वन्तरे कलियुगे कलि प्रथम चरणे जम्मू द्वीपे आर्यवर्ते भारत खंडे आदि-आदि'' बोलकर संकल्प कराया जाता है, इस प्रकार परंपराबद्ध रूप से यह कालगणना व समय का हिसाब सुरक्षित रहता है और सत्य पर आधारित है। 
कौन हैं महर्षि मनु---?
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मनु कौन था भारतीय समाज का विस्वास है की महर्षि ब्रह्मा को मानव जाती के कल्याण हेतु ईश्वर ने वेदों का ज्ञान दिया इसी कारण ब्रह्मा के चार मुख (चार वेद ) का वर्णन---! ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, अंगिरा और अदित्य ऋषियों को श्रुति का ज्ञान दिया उन्होंने अन्य ऋषियों के माध्यम से मानव समाज को शिक्षित करने का काम किया ऋग्वैदिक काल में कोई राजा नहीं था सभी अपना -अपना कार्य व्यवस्थित रूप से करते थे --
 "न राजयम न राजशीत न दंडों न दंडिका" । 
ऋषि -महर्षि और मानव समाज ने ब्रह्मा के पास जाकर निवेदन किया समाज व्यवस्था, राज्य सञ्चालन हेतु किसी को तो चाहिए तब ब्रम्हा जी ने विवस्वान मनु को समाज व्यस्वस्था के लिए भेजा, मनु ने मानव समाज के लिए कुछ नियम बनाए जो वेदानुकूल थे जैसा की हमारे हिन्दू समाज की मान्यता है की हम सभी मनु की संतान हैं इस कारण हम मनुष्य कहलाए, इसी कारण हमारे धर्म ग्रन्थों मे कहीं भी हिन्दू का नाम न होकर मानव का ही वर्णन है उस समय समाज मे वर्ण व्यवस्था का निर्माण स्वाभाविक रूप से हो रहा था कर्म के अनुसार वर्ण मे अपने-आप हो जाता था भगवान मनु ने मानव जीवन हेतु उत्कृष्ट ग्रंथ तैयार किए जिसमे किसी के प्रति कोई भेद-भाव नहीं सबके साथ न्याय सभी को सभी वर्ण मे जाने का अधिकार था जिन शुद्रों के विषय को लेकर मनु की आलोचना की जाती है वे मनुस्मृति मे क्या लिखते हैं----?
मनु की शूद्रों के बारे मे अवधारणा
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शूद्रो ब्राम्हणतामेति ब्राह्मनैश्च चेति शूद्रताम।
क्षत्रियाज्ज़ातमेवंतु   विद्याद्वैश्यात्तथैव च ।।
मनु महाराज कहते हैं वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण शूद्र वर्ग में हो जाता है और शूद्र ब्राह्मण वन जाता है, इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण से गिरकर दूसरे वर्ण में जा सकते हैं, इसका स्पष्ट अभिप्राय यह है कि वर्ण व्यवस्था मे कर्म ही मुख्य कारक है, आज हिन्दू समाज मे यह व्यवस्था नहीं देखि जाती ऐसा प्रतीत होता है कि किसी प्रकार यह जन्म से वर्ण व्यवस्था चली तो ! परतंत्रता के कारण यह हटाई नहीं जा सकी, देश के स्वतंत्र होने से जन्म-जात वर्ण-व्यवस्था हटती जाती है ।
सूद्र के विषय मे मनु कहते हैं------
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1 -जो ब्यक्ति पढ़-लिख नहीं पाता और ऊपर के किसी वर्ण के योग्य नहीं वही सूद्र कहलाता है इसी कारक अध्याय 2 श्लोक 226 मे अज्ञानता के प्रतीक के रूप मे सूद्र की उपमा दी है ।
2- मनु ने सुद्रों को विद्वानो की सेवा करना बताया है, इसी से यह स्पष्ट हो जाता है की मनु ने सूद्र को स्पृस्य नहीं माना ।
 3- सुद्रों को धर्म पालन का पूर्ण अधिकार है (अध्याय-2 श्लोक 213 )।
 4- वेदों मे कहीं भी सुद्रों के प्रति असम्मान, घृणा, आक्रोश के वर्णन नहीं हैं यदि हैं तो वे मनु के लिखे नहीं वल्कि क्षेपक है वेदों मे सुद्रों को भी यज्ञ करने का आदेश है।
5- सूद्र पवित्र है और उत्तम वर्ण प्राप्त कर सकता है (2-112), उस समय सूद्र धनिक व सम्मानित हुआ करते थे।
क्षेपकों के द्वारा ग्रंथ विकृति
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 करोणों अरबों वर्ष पुराना ग्रंथ होने के कारण कुछ स्वार्थी तत्वों ने समय-समय पर मनुस्मृति मे अनेक श्लोक डाल दिया जो सत्य-परक नहीं है स्वामी दयानन्द कहते है जो विज्ञान युक्त नहीं है वह वैदिक धर्म नहीं हो सकता, स्वामी जी के अनुसार वैसे तो मनुस्मृति मे चार हज़ार श्लोक का वर्णन बताते है लेकिन वर्तमान मनुस्मृति मे कुल 12 अध्याय, 2685 श्लोक है लेकिन उसमे समय-समय पर कुछ लोगो ने अपने तरफ से जो श्लोक डाले हैं उनकी संख्या 1471 है जो ऋषि प्रामाणिक स्मृति है उसका श्लोक 1214 है, मनुस्मृति मे जो कुछ सुद्रों के बारे मे गलत ब्याख्या की गयी है वह मनु की नहीं है हम सभी मनु की संतान है क्या कोई पिता अपनी ही संतानों मे भेद-भाव करेगा-? यह विचारणीय विषय है आठ सौ वर्ष इस्लामिक 200 वर्ष अंग्रेजों के शासन मे हमारे ग्रंथो मे हमारे स्वार्थी तत्वों द्वारा बहुत से ग्रंथो को बर्बाद किया गया है जो मैक्समूलर भारत आया ही नहीं जिसे संस्कृति भाषा आती ही नहीं थी वह हमे -हमारे ग्रन्थों के बारे मे क्या प्रमाण देगा-? ईसाई, मोहमदी, बौद्ध मतावलंबियों ने हमारे धर्म ग्रंथो को नष्ट-भ्रष्ट करने का प्रयत्न किया है हमे सचेत रहने की अवस्यकता है, विश्व के बड़े-बड़े विद्वानो का मत है की अरबों वर्ष पहले इस प्रकार का बिधान बना समाज संचालन की ब्यावस्था इससे अच्छी हो ही नहीं सकती थी। 
प्रलय पुनः शृष्टि रचना
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एक पौराणिक कथा भी जुड़ती है एक दिन राज़ा मनु एक नदी के किनारे पानी पीने के लिए गए उनकी अंजुली मे एक छोटी सी मछली आ गयी ये फेकना ही चाहते थे की उसने आवाज दी की भगवन मुझे फेकों नहीं अपने साथ ले चलो मनु ने उसे अपनी कमंडल मे रख लिया घर पहुचते-पहुचते वह बड़ी हो गयी उन्होने उस मछली को एक टब मे रखवा दिया देखते-देखते वह टब से भी बड़ी हो गयी महर्षि ने उसे नजदीक के तालाब डाल दिया कुछ दिन बाद देखा की वह तालाब से भी बड़ी हो गयी मनु ने उसे नदी फिर समुद्र डाल दिया अब वह बहुत विशाल हो चुकी थी, ब्रम्हा का एक दिन बिता, एक चतुर्युगी समाप्त होने पर प्रलय होता है, सारी की सारी धरती जल मग्न हो जाती है पशु-पक्षी, जीव-जन्तु, सभी वनस्पतियाँ मानव जाती समाप्त प्राय हो जाता है भगवान मनु एक लकड़ी की बहुत बड़ी नावका तैयार कराई धरती तो थी नहीं नाव कैसे चले उस समय वह मछली मनु की सहायता हेतु आयी भगवान यह नाव मुझसे बाध दीजिये मनु ने वैसा ही किया उस नाव पर जीव- जन्तु, पशु- पक्षी, सभी वनस्पतियाँ सहित मानव समुदाय को रख लिया नाव कहाँ ले जाना लेकिन पृथ्बी का एक हिस्सा जो डूबता नहीं जिसे त्रिवस्तप (तिब्बत) कहते हैं भगवान नाव को वही लेजाकर सृष्टि का निर्माण करते हैं वहीं से मनुष्य नीचे उतरता है इसी कारण उस रास्ते को हरिद्वार भी कहते हैं आज भी भगवान मनु का मंदिर हिमांचल मे इसके सबूत के नाते खड़ा है ।
           अमेरिकन वैदिक विद्वान ''डेविड फ्रली'' (वामदेव शास्त्री) कहते है की वेदों, मनुस्मृति व भारतीय ग्रंथों को समझने के लिए भारतीय मन की अवस्यकता है।  
संदर्भ ग्रंथ-------1- मनुस्मृति , डॉ सुरेन्द्र कुमार 
                        2- शुद्ध मनुस्मृति, डॉ सुरेन्द्र कुमार 
                        3- धर्म तथा समाजवाद, गुरुदत्त 
                        4- ऋग्वेद, भाष्य- ऋषि दयानन्द सरस्वती  
                         5- ऋग्वेद भाष्य भूमिका, ऋषि दयानन्द सरस्वती  

2 टिप्‍पणियां

बेनामी ने कहा…

विश्व का पहला मानव जीवन जीने का संबिधान है जिसका हिन्दू समाज पर आज भी सरबधिक प्रभाव है कुछ लोग ईसाई मिशनरियों के इशारे पर अथवा हज़ार वर्ष की गुलामी के कारण अपने पर विस्वास की कमी के कारण मनु स्मृति के बारे मे बिना अध्ययन के आलोचना करते हैं जबकि दूसरी तरफ कुरान तो ब्याभिचार की ही पुस्तक है उस पर कोई टीका टिपपड़ी नहीं करता क्योंकि कुरान के अनुयाई आतंकवादी हैं, आज समय है हम महर्षि मनु और मनुस्मृति को समझे और सार्थक उपयोग करें।

सूबेदार जी पटना ने कहा…

जो लोग मनुस्मृति का विरोध करते हैं कोइ भी इस ग्रंथ को पढने को तो छोड़िये देखा भी नहीं है, यह मानव जिवंन जीने का प्रथम विधान है. इसमे कुछ यदि ठीक नहीं है तो वह वैदिक काल का नहीं बृटिश व इस्लामिक काल मे क्षेपक डाला गया! इस करण जो आलोचक हैं उंहे निष्पक्षता पुर्बक पढना चाहिये...!