धर्म विशेष

मेरी सारगाछी यात्रा ----------!

स्वामी अखंडानन्द के लिए चित्र परिणाम         आज दिनांक २६ जनवरी 15 को कुछ साथियों के साथ हावड़ा से रोड द्वारा सारगाछी आश्रम हेतु रवाना हो गए रास्ते का अनुभव बड़ा ही बिचित्र था शायद आम भारतीय इसका अनुभव नहीं कर पाते होंगे कुछ तो दृष्टिकोड का भी असर रहता है इस कारन मैंने सोचा की इस पर कुछ लिखा जाय क्योंकि प बंगाल की ममता सरकार आँख पर जान-बुझकर पट्टी बांध बैठी हुई है, यहाँ हाइवे ३४ पर सारगाछी में स्वामी अखंडानंद ने यह आश्रम स्थापित किया था वे भगवन श्री रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे हिमालय में तपश्चर्या हेतु जा रहे थे अचानक क्या हुआ और क्यों अचानक वे यहाँ बैठ गए-?
        सारगाछी मे एक छोटी सी नदी है गाँव के लोग पानी- पीने के लिए उस नदी से लाया करते थे स्वामी जी उसी रास्ते से हिमालय की तरफ जा रहे थे शायद उस समय भी उत्तर हिमालय जाने का रास्ता यही था जैसे आज हाइवे जहां पर है स्वामी जी ने देखा कि एक महिला रो रही है स्वामी जी ने पूछा माता क्यों रो रही हो-! बड़ी ही मुसकिल से उसने बताया कि यह मेरा घड़ा टूट गया है अब मै कैसे घर जाऊ स्वामीजी को समझने मे देर नहीं लगी पूरे गाँव को गरीबी ने जकड़ा हुआ था उन्होने आस्वासन दे उस महिला के साथ गाँव मे चले गए और उन गरीब वनबासियों की सेवा मे अपना सारा जीवन लगा दिया इस आश्रम की नीव उसी समय स्वामी अखंडानन्द जी ने रखी जहां आज शिशु से लेकर इंटर कालेज तक का विद्यालय और क्षात्रावास बना हुआ है रामकृष्ण मिशन के दीक्षित सन्यासी आश्रम का संचालन करते हैं।
          वहाँ स्वामी गोपाल जी मिले मेरी जिज्ञासा को शांत करते हुए बताया कि संघ के श्री गुरु जी यहीं स्वामी अखंडानन्द जी से दीक्षा ली थी उस कमरे को भी हमने देखा जहां पूज्य श्रीगुरु जी रहते थे बड़ा ही रोमांचित दृश्य हो गया, आगे उन्होने बताया कि इस मुरसीदाबाद जिले मे 80% आबादी मुसलमानों कि है आए दिन आश्रम मे बाधा पाहुचाते रहते हैं जिले के हिंदुओं की गुलामी आज भी खत्म नहीं हुई हैं ध्यान मे आया की जब हम लोग हावड़ा से मुर्सिदावाद से चले तो देखा कि जगह-जगह चर्च बने हुए हैं मखतब-मदरसों की तो भरमार है लग रहा था कि हम लोग भारत मे न होकर पाकिस्तान मे हों, सन्यासियों के चेहरों पर कोई कांति नहीं वे हमेसा भय-भीत रहते हैं, जो  धरती महर्षि अरविंद, नेताजी सुभाषचंद बोस, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, रामकृष्ण परमहंश और विवेकानंद जैसों की कर्मभूमि रही हो आखिर ऐसा क्या हो गया की यहाँ राष्ट्रवाद का गला घुट-घुट कर दब रहा है बांग्लादेसियों की घुसपैठ आम बात है बात-बात मे हिन्दू देवि-देवताओं का अपमान हिन्दू समाज की मन-बहन और बेटियाँ सुरक्षित नहीं लेकिन वहाँ कोई बिवाद नहीं क्यों की हिंदुओं का साहस ही नहीं वे इतने कम हैं की यह सब उन्होने अपनी नियति ही मान लिया है उन्हे कोई सिकायत नहीं क्योंकि कोई सुनने वाला नहीं जो कुछ है वह सब मुसलमानों के लिए, उन्हे बीजेपी से कुछ उम्मीद थी लेकिन वह भी कहते हैं की उसमे भी मुसलमान ही घुसपैठ कर रहे हैं।
      उस सन्यासी ने कहा कौन बचाएगा हिन्दू धर्म, संस्कृति और भारत को ---?         

कोई टिप्पणी नहीं