राजस्थान की भूमि वीरों की भूमि रही है जिसमें बाप्पा रावल, राणा कुम्भा, राणा हम्मीर सिंह, राणा सांगा और महाराणा प्रताप जैसे स्वाभिमानी शूर -वीर योद्धा पैदा हुए, उसी में एक नाम जुड़ता है अमरसिंह राठौर का। अमरसिंह राठौड़ 17वीं शताब्दी के एक प्रसिद्ध राजपूत योद्धा थे, जिनकी बहादुरी, स्वाभिमान और वीरता आज भी राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पंजाब के लोकगीतों व लोककथाओं और नाटकों में अमर है। वे मारवाड़ (जोधपुर) के राठौड़ वंश से संबंधित थे और मुगल सम्राट शाहजहाँ के दरबार में उच्च पद पर आसीन रहे, लेकिन कभी भी अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया । आगरा किले का एक द्वार आज भी उनके नाम पर "अमर सिंह गेट" के नाम से जाना जाता है। जहाँ आज भी यह गेट पर्यटकों के आकर्षक का केंद्र बना हुआ है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
अमरसिंह राठौड़ का जन्म पौष शुक्ल एकादशी वि. सं. 1670 तदनुसार 12 दिसंबर 1613 (कुछ स्रोतों में 30 दिसंबर या 11 दिसंबर भी उल्लेखित) जोधपुर रियासत मारवाड़ में हुआ था । राजकुमार अमरसिंह राठौर बचपन से अत्यंत साहसी, स्वाभिमानी एवं शूर -वीर थे। वे महाराजा "गजसिंह" के ज्येष्ठ पुत्र थे, इसलिए प्रारंभ में मारवाड़ के उत्तराधिकारी माने जाते थे। बचपन से ही वे साहसी, स्वाभिमानी और शूरवीर थे। उनकी वीरता इतनी प्रसिद्ध थी कि राजपूताना के आठ राजा महाराजाओं ने अपनी पुत्रियों का विवाह उनसे किया। उनके पिता "गजसिंह" ने बाद में अपने छोटे पुत्र "जसवंत सिंह" को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया (कुछ स्रोतों के अनुसार सौतेली माँ या पारिवारिक दबाव का उल्लेख है)। इससे अमरसिंह को अपमान महसूस हुआ और वे मारवाड़ से निर्वासित/ निष्कासित हो गए।
मुगल खेमे में प्रवेश और उदय
निर्वासन के बाद अमरसिंह राठौड़ मुगल "शाहजहाँ" की सेवा में चले गए। उनकी असाधारण बहादुरी और युद्ध कौशल ने उन्हें जल्दी ही मुगल दरबार में पहचान दिलाई! उन्हें मंसबदारी (सैन्य पद और जागीर) प्रदान किया गया, जो बाद में बढ़ता गया कुछ स्रोतों के अनुसार 1300-3000 घुड़सवारों की मंसबदारी बताई जाती है। उन्होंने मुगलों के कई अभियानों में भाग लिया और ईरान (पर्शिया) के खिलाफ युद्धों में भी वीरता दिखाई। उनकी वीरता से प्रभावित होकर शाहजहाँ ने उन्हें "नागौर" का "सूबेदार यानी गवर्नर और राव का खिताब प्रदान की गई । नागौर मुगलों द्वारा सीधे शासित महत्वपूर्ण क्षेत्र था, लेकिन अमरसिंह को वहाँ स्वतंत्र रूप से शासन करने का अवसर मिला। नागौर में उन्होंने कुशल प्रशासन दिया और स्थानीय लोगों का सम्मान अर्जित किया। एक प्रसिद्ध कथा है कि "मटिरे री राड़" (तरबूज की लड़ाई), जिसमें उन्होंने पड़ोसी राज्य बीकानेर से पानी/तरबूज के विवाद में अपनी वीरता दिखाई।
प्रसिद्ध घटना: सलाबत खान का वध
महाराजा गजसिंह मुग़ल शासक शाहजहाँ के अधीन मारवाड़ के शासक थे उनके पुत्र अमरसिंह राठौर एक महान योद्धा और प्रखर देशभक्त थे, लेकिन उनके पिता ने उन्हें राज्य निर्वासन दिया था बाद में वै शाहजहाँ की दिल्ली सल्तनत में शामिल हो गए। जहाँ उन्होंने अपनी वीरता से शाहजहाँ को प्रभावित किया जिसने उन्हें नागौर का जागीरदार बनाया हलाकि शाहजहाँ के भाई सालाबत खान राज्य में अमरसिंह कै उत्थान से जलते थे और अमरसिंह राठौर को बदनाम करने के लिए अवसर खोजा करते थे। उन्हें जल्द ही मौका मिल गया जब अमरसिंह राठौर की अनधिकृत अनुपस्थित के बारे में पता चला तो सालावत खां ने इस मुद्दे को वढ़ा -चढ़ा कर बादशाह के सामने पेस किया। शाहजहाँ ने सलाबत खां को अमरसिंह राठौर को दण्डित करने का आदेश दिया इसका फायदा उठाते हुए सलावत ने अमरसिंह राठौर को धमकाकर उसी वक्त दंड भुगतान करने को कहा। 1644 में अमरसिंह की अनाधिकृत अनुपस्थिति (बीमारी के कारण दरबार में हाजिरी न लगने) पर शाहजहाँ ने जुर्माना लगाने का आदेश दिया था । इस काम के लिए "सलाबत खान" जो मुगल दरबार में उच्च अधिकारी, कुछ स्रोतों के अनुसार वह शाहजहाँ का साला अथवा कोई और सम्बन्धी था, को भेजा गया। सलाबत खान ने अमरसिंह राठौर को दिवाने खास यानी भरे दरबार में अपमानित किया (कुछ कथानकों के अनुसार "गंवार" या "जााहिल" कहा) और जुर्माना वसूल करने पर जोर दिया। स्वाभिमानी अमरसिंह ने क्रोध में आकर तलवार से सलाबत खान का सिर धड़ से अलग कर दिया ¡ यह घटना सम्राट शाहजहाँ की मौजूदगी में हुई। इसके बाद कोर्ट में हड़कंप मच गया। अमरसिंह ने कई मुगल सैनिकों को मारते हुए सम्राट की ओर बढ़ना चाहा, लेकिन शाहजहाँ जनानखाने में छिप गया । अमरसिंह अपने वफादार घोड़े जिसका नाम "बहादुर" था पर सवार होकर आगरा किले से छलांग लगाकर भाग निकले (कुछ लोककथाओं में घोड़ा किले की ऊँचाई से कूदकर मर गया)।
मृत्यु और धोखा
शाहजहां ने एक चाल चली और घोषणा किया कि जो भी अमरसिंह राठौर को जिन्दा अथवा मुर्दा लाएगा उसे जागीर दी जायेगी हलाकि कोई भी अमरसिंह राठौर के साथ दुश्मनी लेने को तैयार नहीं था। क्योंकि सभी ने एक दिन पहले अमरसिंह राठौर का क्रोध देख लिया था। अमरसिंह राठौर के साले अर्जुन सिंह ने लालच में इस चुनौती को स्वीकार कर लिया। शाहजहाँ ने अमरसिंह राठौर को पकड़ने के लिए साजिश कामयाब हो गई । अमरसिंह राठौर के साले "अर्जुन सिंह गौड़" ने सुलह का बहाना बनाकर उन्हें धोखा दिया। आगरा किले के एक छोटे द्वार (जिसमें झुककर प्रवेश करना पड़ता था) पर अर्जुन और उसके साथियों ने अमरसिंह पर हमला कर दिया। घायल अवस्था में भी अमरसिंह ने कई सैनिकों को मारा और अर्जुन का कान काट दिया, लेकिन अंततः वे वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी उम्र मात्र 30-31 वर्ष थी (25 जुलाई 1644)। शाहजहाँ ने उनके शव को टावर पर लटकाकर राजपूतों को चुनौती दी। यह कथा आज भी गांव -गांव में प्रचलित है और गांव -गांव में नाटक के रूप में दिखाई जाती है। साहजहां के पास एक फकीर मिलने आया था उसनें शाहजहाँ से पूछा कि इतने बड़े -बड़े राजपूत योद्धाओ को कैसे कंट्रोल करते हैं शाहजहाँ ने कहा अभी दिखाता हूँ तभी अर्जुन सिंह अमरसिंह राठौर का कटा हुआ सिर लेकर आ गया शाहजहाँ ने फकीर को इशारा किया कि देखो ऐसे राजपूत योद्धाओ से निपटा जाता है।
बदला और अमर गाथा
अमरसिंह की पत्नी ने उनके मित्र "बल्लू चंपावत राठौड़" से बदला लेने की अपील की। बल्लू और उनके साथियों ने वीरतापूर्वक आगरा किले में घुसकर अमरसिंह राठौर का शव वापस लिया और अमरसिंह की पत्नी सती हो गईं। यह घटना राजपूत स्वाभिमान की प्रतीक बन गई। अमरसिंह को "अनबाउंड हीरो" (झुकने से इनकार करने वाला योद्धा) कहा जाता है।अमरसिंह राठौर के दो पुत्र: रायसिंह और ईश्वरी सिंह थे (अमरसिंह के बाद रायसिंह को मुगलों से मंसब और राजा का खिताब मिला) उनकी कई पत्नियां थीं जिसमें प्रमुख रूप से "गोहिल राजकुमारी" (डूंगरपुर-बांसवाड़ा से) आदि।
"लोकप्रियता" ऐसी थी कि राजस्थान के लोकगीतों (जैसे "अमर सिंह राठौड़ की राड़") में उन्हें अमर किया गया है। इतना ही नहीं देश के तमाम प्रदेशों में उनके ऊपर नाटक प्रसिद्ध है। जिससे इतिहास के पन्नों में कम लेकिन लोककथाओ, गीतों और नाटकों ने उन्हें अमर कर दिया। स्मारक के रूप में आगरा के किले का "अमर सिंह गेट" आज भी पर्यटकों को आकर्षित करता है। वे भारतीय इतिहास में मुगल सत्ता के सामने झुकने से इनकार करने वाले प्रतीक थे — स्वाभिमान, वीरता और स्वतंत्रता के प्रतीक बनकर उभरे । अमरसिंह राठौड़ की कहानी सिखाती है कि सच्चा सम्मान तलवार की धार पर नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान पर टिका होता है। उनकी गाथा आज भी युवाओं को प्रेरित करती है। भारतीय इतिहास ऐसे महान वीरों से भरा पड़ा है जिन्होंने अपने और हिंदू स्वाभिमान की रक्षा कर भारत की निर्भीकता को प्रकट किया लेकिन दुर्भाग्य है बामपंथी और कांगी इतिहासकारों को ये वीर महापुरुष दिखाई नहीं देते, उन्होंने भारतीय इतिहास को भारतीय स्वाभिमान को विकृत करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं किया।

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