अमोंढा ---- राजा जालिम सिंह

 


अमोढ़ा राजा जालिम सिंह का गौरवशाली इतिहास 

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अमोढ़ा राजा जालिम सिंह फिरंगियों के लिए जालिम थे, दुश्मनों को मजबूर कर देती थी इनकी गुरिल्ला युद्ध का तरीका, ऐसे थे अमोढ़ा के राजा जालिम सिंह । उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले मुख्यालय से बत्तीस किमी तथा अयोध्या से पच्चिस किमी की दुरी पर स्थित है अमोढ़ा राज्य का गवाही देता किले का खंडहर जो 1732 से 1857 तक मुगलों व अंग्रेजो से स्वतंत्रता संग्राम का युद्ध लड़ते लड़ते यह अभेद दुर्ग अंग्रेजो की तोपों की भेंट चढ़ गया यह किला । अमोढ़ा के राजा जालिम सिंह सूर्यवंशी राजपूत थे उनका विवाह नगर राज्य के राजा गौतम सिंह की बहन से हुआ था। 13अगस्त 1857 के स्वतंत्रता युद्ध मे अंग्रेजो क़ो कड़े प्रतिकार का सामना करना पड़ा जिसका अंग्रेजो क़ो कल्पना भी नहीं थी, ब्रिटिश शासको को लगा कि अमोढ़ा राज्य को जीतना बड़ा कठिन है। इससे ब्रिटिश अधिकारी कर्नल राबर्ट क्राफ्ट को दो मार्च 1858 को इस क्षेत्र से पीछे हटने को मजबूर होना पड़ा इससे अमोढ़ा की अंतिम रानी और राजा जालिम सिंह अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते -लड़ते अपनी मातृभूमि के लिए बलिदान हो गये। राजा जालिम सिंह एक वीर स्वतंत्रता सेनानी थे उन्होंने अपने राज्य मे सभी आक्रमड़ों को विफल कर दिया था उन्होंने लम्बे समय तक मुगलों -अंग्रेजो के खिलाफ वीरता पूर्वक युद्ध लड़ा और अपने राज्य मे अंग्रेजो के पैर जीवित रहते टिकने नहीं दिया। एक दिन अचानक ब्रिटिश सेना से घिर गये वे एक गुप्त सुरंग मार्ग से निकाल जाने मे सफल हो गये और गुरिल्ला युद्ध जारी रखा।

धोखेबाज आसिफुद्दोंला 

मेजर क्राऊफ़ोर्ड ने आसिफ़ुद्दौला के कहने पर एक बड़ा सैनिक रेजिमेंट राजा जालिम सिंह को ज़िंदा पकड़ने के लिए अमोढ़ा की तरफ भेज दिया,मगर राजा साहब छापामार युद्ध प्रणाली तथा भेष बदलने में इतने माहिर थे कि उनको पकड़ना तो दूर पहचान पाना बहुत मुश्किल था। मगर कहावत है कि कभी कभी मनुष्य के सदगुण भी घातक हो जाते हैं ऐसा ही एक अदभुत क्षत्रियोचित रजोगुण राजा साहब के अंदर था, वह कभी भी किसी भी परिस्थिति में सिर नहीं झुकाते थे। आसिफ़ुद्दौला ने राजा जालिम सिंह के इसी गुण की वजह से उनको पहचान कर पकड़ने का जाल बिछवाया। इधर राजा जालिम सिंह को आभास हो चला था कि इस बार लड़ाई आर या पार की होने वाली है अतः उन्होंने अपने बड़े पुत्र पृथापति सिंह को अमोढ़ा का युवराज घोषित कर दिया। और स्वयं केशरिया बाना धारण करके पूरी ताक़त के साथ अंग्रेजों और नवाब आसिफ़ुद्दौला के खिलाफ रणभेरी बजा दिया। वीर और स्वाभिमानी क्षत्रिय कभी धोखेबाज़ या षड्यन्त्रकारी नहीं होता वह बाहर से कठोर मगर अंदर से निश्छल एवं कोमल होता है। आसिफ़ुद्दौला का एक संदेशवाहक पड़ोसी धर्म का उदाहरण देकर राजा साहब को यह समझाने में कामयाब रहा कि नवाब सारे गिले शिकवे भुलाकर फिर से एक अच्छे पड़ोसी की भाँति एकजुट होकर रहना चाहता है। निर्मल हृदय राजा ने बदले में यह संदेश भेजा कि यदि  अंग्रेजो को देश से बाहर निकालने के लिए नवाब आसिफ़ुद्दौला हमारा साथ दें और एक गठबंधन बनाएँ तो हम सभी हिंदू राजा उनके ध्वज तले एकजुट होकर अंग्रेजों से लड़ने को तैयार हैं।

राजा जालिम सिंह का लड़ते हुए बलिदान 

परस्पर वार्ता और मुद्दों की सहमती के लिए गुलाबवाड़ी में मिलना तय हुआ, राजासाहब के स्वागतार्थ गुलाबवाड़ी दुल्हन की तरह सजी थी, मुख्यद्वार को पार करके जब सभागार में पहुँचे तो उन्होंने देखा कि प्रवेशद्वार पर बंदनवार बहुत नीचे तक लटक रही थी,इतनी कम ऊँचाई से ७फ़ुटा जवान बिना सिर झुकाए प्रवेश नहीं कर सकता था। किसी के सामने कभी सर ना झुकाने वाले राजा साहब ने अपनी तलवार से उस बंदनवार को काट दिया। इससे पहले कि वह सभागार की तरफ बढ़ते वहाँ स्वागत और सुरक्षा हेतु खड़े करिंदो के हाथों में तलवार, भाले खुखरी, फरसे और बंदूक़ें चमकने लगी थीं। धोखे का अहसास होते ही उस स्वतंत्रता प्रेमी महावीर के शरीर में जैसी बिजली कौंधी हो, बड़े वेग के साथ धोखेबाज़ों के सैन्य दल को गाजर-मूली की भाति काटते हुए, राजा जालिम सिंह अपने ११ विस्वस्त सैनिकों के साथ बाहर की तरफ बढ़े। उन रनबाँकुरों के अदम्य शौर्य के सामने नवाब की 500 सैनिकों की टुकड़ी बहुत छोटी लग रही थी।  राजा जालिम सिंह विश्वासघाती दुश्मनों का मजबूत घेरा तोड़ने में कामयाब रहे, मगर इस खूनी संघर्ष में उनके ११ विस्वस्त साथी वीरगति को प्राप्त हो चुके थे, और वह स्वयं बुरी तरह से घायल थे। सरयू तट पर पहुँच कर उन्होंने देखा कि अंग्रेजो की एक बड़ी सैन्य टुकड़ी पूरब दिशा में उनको पकड़ने के लिए घेरा डाले तैयार थी। एक पल रुककर राजा साहब ने कुछ सोचा, फिर बड़े बेग से अपने घोड़े को नदी को घेरकर खड़े अंग्रेज़ी सैन्य टुकड़ी के बीच की तरफ दौड़ा दिया, अंग्रेजों ने इस तरह के दुस्साहस की कल्पना भी नहीं की थी। इससे पहले की अंग्रेज़ी सेना संभल पाती वह नदी के पास तक पहुँच गए। मगर तब तक पहले से ज़ख़्मी शरीर में अंग्रेजों की कई गोलियाँ घुस चुकी थीं, इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और बड़ी मज़बूती से घोड़े के पीठ पर बैठकर अपनी तलवार से दुश्मनों का सिर उनके धड़ से अलग करते हुए वह उफनती नदी में कूद पड़े।

और राजा जंगबहादुर सिंह 

वह मनहूस दिन सन १७८६ के श्रावण मास की नागपंचमी का था, उनको पकड़ने के लिए सैनिकों की एक टुकड़ी सरयू नदी के उफनते पानी में उतारी गयी, मगर कोई भी सैनिक उस “सरयू पुत्र” स्वतंत्रता के दीवाने महाराजा जालिम सिंह को पकड़ना तो दूर उनका पता भी नहीं लगा सकी, कि वह किस तरफ गए। हताश अंग्रेज उन्हें दोबारा पकड़ने की कभी ना पूरी होनेवाली ख्वाहिश लिए लौट गए। अमोढ़ा राज्य की चमक फीकी पड़ चुकी थी, मगर सूर्य पताका अभी भी लहरा रही थी, राजा पृथा सिंह महाराज जालिम सिंह के वापस आने की सुखद आश लिए अमोढ़ा को फिर से संवारने का प्रयास कर रहे थे, उन्हें लॉर्ड कॉर्नवालिस से (१७८६ से १७९८) भारतीय रियासतों को अहस्तक्षेप नीति के तहत सिर्फ कर देकर शासन करने की आज़ादी मिली थी। पृथा सिंह के बाद उनके बड़े पुत्र राजा अभय सिंह तथा उनके बाद उनके पुत्र राजा जंगबहादुर सिंह ने अमोढ़ा का शासन सम्भाला उनका विवाह अंगोरी राज्य (राजाबाजार, ढ़कवा) के दुर्गवंशी राजकुल की राजकुमारी तलाश कुँवरी के साथ हुआ था। उन्हें भी राजकुमारों की तरह शस्त्र चलाने की शिक्षा दी गई थी। भाला, तलवारबाजी, घुड़सवारी, तीरंदाज़ी आदि शस्त्र कला में रानी बचपन से ही प्रवीण थीं।

और रानी तलाश कुंवरि 

सब कुछ ठीक चल रहा था तभी सन 1853 में राजा जंगबहादुर सिंह का निःसंतान निधन हो गया, तब परिस्थिति वश रानी तलाशकुवंरि ने अमोढ़ा की राजगद्दी संभाली। सत्ता सम्भाले हुए ४ वर्ष भी पूरे नहीं हुए थे, तभी १८५७ का स्वतंत्रता आंदोलन शुरू हो गया। रानी तलाशकुँवरि भी झांसी की रानी की तरह निसंतान थीं, तथा गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की कुख्यात ‘डाक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ पॉलिसी यानी की(निःसंतान राजपरिवारों का राज्य ईस्ट इंडिया कम्पनी में मिला लेना) के सीधे निशाने पर थीं। 1857 में अवध के बाकी हिस्सों में बगावत के शोले भड़ककर बुझ गए तो भी रानी तलाशकुंवरी ने अंग्रेजों की अधीनता या पराजय स्वीकार करना गवारा नहीं किया।अंग्रेजों ने उनके शासन के दौरान कई तरह की दिक्कतें खड़ी करने की कोशिश की,पर स्वाभिमानी रानी ने हर मोरचे का मुकाबला किया। रानी ने अपने प्रमुख रणनीतिकारों के साथ बैठके की और फैसला किया कि अंग्रेजों को भारत से खदेडऩे में स्थानीय क्षत्रियों,किसानों तथा पठानो इत्यादि लड़ाकों की मदद से एक बड़ी सेना का संगठन किया जाय।और अंग्रेजो का जी जान से मुक़ाबला किया जाय। इस प्रकार क्षेत्रीय जनों की एक बड़ी सेना बनाकर रानी ने उन्हें युद्ध नीति का प्रशिक्षण स्वयं दिया और युद्ध का बिगुल फूंक दिया गया। रानी की सेना ने बस्ती-फैजाबाद के सड़क और जल परिवहन को ठप्प करा दिया था। संचार के सारे तार टूट जाने से अंग्रेज बुरी तरह बौखला गए। रानी अंग्रेजों के आंखों की किरकिरी पहले से ही बन गयीं थी।उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई की तरह मर्दाना वेश में लड़कर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए और सैन्य व्यूह रचना में अपनी सिद्धहस्तता भी प्रमाणित किया। विपरीत परिस्थिति और सीमित संसाधन के बावजूद उन्होंने अपने साहस, शौर्य और रणकौशल की बदौलत  अंग्रेजों से १० महीने तक युद्ध किया। और उनकी सेना ने कई अंग्रेज अधिकारियों और सैनिकों को मौत के घाट उतारा। पखेरवा के पास हुए मुकाबले में उनका प्यारा घोड़ा घायल होकर मर गया।पराजय सामने खड़ी देखकर भी रानी का मनोबल कम नहीं हुआ। किंचित भी घबराए बिना उन्होंने अपने सैनिकों से कहा, अंग्रेज मुझे हर हाल में जिंदा या मुर्दा पकड़ना चाहते हैं। मैंने भी तय कर लिया है कि अगर इसकी नौबत आई तो मैं अपनी ही कटार से अपनी जीवनलीला समाप्त कर लूंगी। आप लोग मेरे मरने के बाद भी जंग जारी रखना तथा मेरी लाश फिरंगियों के हाथ न पड़ने देना।

रानी तलाश कुंवरि की अंतिम बिदाई 

2 मार्च, 1858 को बुरी तरह घिर जाने पर रानी ने जो कहा था, कर दिखाया। अपनी ही कटार खुद को मार ली। उनके वफादार सैनिकों ने जान पर खेलकर उनकी लाश अंग्रेजों के हाथ न पड़ने देने का वादा निभाया। रानी की मौत बाद उनके शव को सहयोगियों ने छिपा लिया। बाद में शव को अमोढा राज्य की कुल देवी समय माता भवानी का चौरा के पास दफना दिए। और वहां पर मिट्टी का एक टीला बना दिया। यह जगह रानी चौरा के नाम से ही मशहूर है। पखेरवा में जहां रानी का घोड़ा मर गया था,उसे भी स्थानीय ग्रामीणों ने वहीं दफना दिया। इस जगह पर एक पीपल का पेड़ आज भी मौजूद है। यहाँ के लोगों के लिए यह जगह श्रद्धा का केन्द्र है। मगर पूर्वाग्रही और खिसियाए अंग्रेजों ने तोप लगाकर अमोढ़ा क़िले को,सुंदर राजभवन से खंडहर में तब्दील कर दिया उनका महल और किले के खंडहर आज भी उनके साहस,शौर्य,वीरता और शहादत की कहानी बयां करते हैं। अंग्रेजो ने इस इलाके में भयानक नरसंहार किया अमोढ़ा का विध्वंस करने के पश्चात रानी अमोढ़ा, राजा नगर और राजा सत्तासी (गोरखपुर) की सारी संपत्ति बस्ती और बांसी राजा को अंग्रेजों के प्रति उनके वफ़ादारी के इनाम स्वरूप दे दी। अमोढ़ा राजा जालिम सिंह एवं रानी तलाशकुँवरी के गौरवशाली इतिहास का लेखन एवं संकलन का स्रोत तमाम इतिहास कारों द्वारा लिखित पुस्तकों, जनश्रुतियों के आधार पर अपनी कल्पना से किया गया है।


मेरे मिडिल स्कूल के प्रधानाचार्य, राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कार प्राप्त शिक्षक स्व.श्री हाकिम सिंह जी (गुण्डाकुँवर) थे वचपन मे इनके मुखार विन्दु से अमोढ़ा राज्य के बारे में अनेक कथाएँ इस किले के बारे में सुनी थीं, हम कच्छा छ से आठवीं तक कई बार किले पर सेवा कार्य के लिये ले जाये जाते थे। वह आज भी हमारे मन मस्तिष्क में ज्यों का त्यों विराजमान है जिनसे मैंने इस गढ़ के बारे में लिखने का साहस किया, हमें लगता है कि ये इतिहास वामपंथियों के मुँह पर एक तमाचा है जिन्होंने राष्ट्रवादी इतिहास को नष्ट करने का काम किया है।


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