ऋषि याज्ञवल्क्य का जन्म
भारतीय ऋषि परंपरा में महर्षि याज्ञवल्क्य वैदिक ज्ञान, दार्शनिक विचार और आध्यात्मिक साधना के महान गुरु थे। उनकी शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं महर्षि की जयंती फाल्गुन मास शुक्ल पंचमी को मनाई जाती है, जी इस वर्ष 22 फरवरी पड़ रही है, यह दिन उनके जीवन और ज्ञान को स्मरण करने का अवसर है। महर्षि याज्ञवल्क्य शुक्ल यजुर्वेद के प्रवर्तक माने जाते हैं, कहा जाता है क़ि उन्होंने सूर्यदेव की उपासना करके ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने सतपथ ब्राह्मण लिखा, जिसमे यज्ञ- कर्मकांड का विस्तृत वर्णन मिलता है। उन्होंने बृहदारण्यक उपनिषद में अपने गहरे विचार लिखा। उनका प्रसिद्ध वैदिक मंत्र नेति -नेति के सिद्धांत को अपनाया जिसका अर्थ है यह नहीं यह भी नहीं। ब्रम्हा की अनंत और निराकार सत्ता को समझने का ढंग है यही सिद्धांत अद्वैत वेदांत की नीव बन गया।
ज्ञान मार्ग
महर्षि याज्ञवल्क्य बड़े विद्वान और विधि के जानकर भी थे, उनकी रचना याज्ञवल्क्य' स्मृति' धर्म और कानून के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इसी पर आधारित 'मिताक्षरा' टीका ने हिन्दू कानून और न्याय व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला। उनका जीवन ज्ञान की तरह प्रेरक था, वे देवरात के पुत्र थे और मिथिला के राजा जनक के दरबार में राजऋषि थे। राजा जनक के दरबार में वे विद्वानों से शास्त्रर्थ किया करते थे, और लोगों को सदज्ञान की रहा दिखाते थे। उनकी धर्म पत्नी मैत्रेई भी विदुषी थी, उनके साथ हुए संवाद आज भी प्रसिद्ध है। एक बार जब याज्ञवल्क्य ने गृहत्याग का निश्चय किया तो मैत्रेयी ने उनसे अमृतत्व का मार्ग पूछा, इस बातचीत में याज्ञवल्क्य ने ब्रम्हा और आत्मा के रहस्यों को सरल शब्दों में समझाया। महर्षि याज्ञवल्क्य ने कर्म और ज्ञान के बीच संतुलन बताया उन्होंने कहा कि यज्ञ और अनुष्ठान से अधिक आवश्यक आत्मज्ञान और ब्रम्हा साक्षात्कार है। उनके विचारों में आत्मशुद्धि, सत्य की खोज और आत्मचिंतन पर विशेष जोर है इस कारण उन्हें ब्राम्हनिष्ठ ऋषि कहा जाता है, वे भक्ति मार्गी न होकर ज्ञान मार्गी हैं। वे उपनिषदों के प्रेरक भी हैं, महर्षि याज्ञवल्क्य जयंती पर विद्वान उनके ग्रंथों का पाठ और ब्याख्यान करते हैं, जिससे नयी पीढ़ी वैदिक ज्ञान से जुड़ सके।
वैदिक सिद्धांत यानी नेति -नेति
आज के समय में जब जीवन में बहुत व्यस्तता और तनाव वढ़ गया है, विशेषकर युवाओं के लिए महर्षि याज्ञवल्क्य की शिक्षाएं बहुत आवश्यक हो गई है। उनका नेति -नेति सिद्धांत हमें सीमित सोच से ऊपर उठाकर सत्य की खोज करने की प्रेरणा देती है. महर्षि याज्ञवल्क्य के सिद्धांत को लाखों लोग पालन करते हैं। और उनके ग्रन्थ का अध्ययन -मनन कर तथा यज्ञ व धार्मिक अनुष्ठानों में भागलेकर समाज और आत्मा की शुद्धि का प्रयास करते हैं। यह परंपरा न केवल ब्यक्तिगत जीवन को संतुलित बनाती है, बल्कि समाज में नैतिकता, सयम और भाईचारा को भी बढ़ावा देती है। आज की युवा पीढ़ी जो तकनीकी और भौतिक उन्नति में बहुत आगे वढ़ चुकी है, वह महर्षि याज्ञवल्क्य की शिक्षाओं से सीख सकती है कि सच्चा विकास केवल बाहरी उन्नति में नहीं बल्कि आत्मा की उन्नति में भी है। महर्षि याज्ञवल्क्य का जीवन हमें यह याद दिलाता है कि ज्ञान, नैतिकता और आध्यात्मिकता के मार्ग में चलकर ही मनुष्य पूर्ण और संतुलित जीवन जी सकता है। महर्षि याज्ञवल्क्य जयंती हमें आध्यात्मिक चेतना ज्ञान और विवेक का महत्व बताती है, उनके विचार और आदर्श आज भी समाज को सही दिशा दिखाते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन का श्रोत बने रहेंगे।

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