अद्वैत आंदोलन का दूसरा नाम आदि जगद्गुरु शंकराचार्य

 

अद्वैत आंदोलन का दूसरा नाम आदि जगद्गुरु शंकराचार्य 

आज कुछ आध्यात्मिक आंदोलन की चर्चा हम करना चाहते हैं, उनको ठीक से समझ लेना जरुरी है। ऐसे प्रत्येक आंदोलन की पृष्ठभूमि में सदैव कोई ऐसी पृष्ठभूमि में सदैव कोई ऐसी परिस्थिति उत्तेजक प्रेरणा का कारण बनकर हमारे सामने आयी है। जब देश समाज और उसकी अपनी विचारधारा के सामने एक़ गहरा संकट अथवा अंतरद्वन्द उपस्थित हुआ और उसकी प्रतिक्रिया में या उसके प्रबल समर्थन में बृहद राष्ट्रीय और राष्ट्रवादी आंदोलन खड़ा हुआ और देश ने अपने को और अपनी विचारधारा को पहले से भी अधिक परिपक्व किया और हर बार सफलता प्राप्त की। ऋषि याज्ञवल्क्य वेदव्यास के शिष्य थे, जिन्होंने यजुर्वेद के चालीसवे अध्याय को 'ईशोपनिषद ' या 'ईशावास्योपनिषद' का नाम देकर इस अध्यात्म आंदोलन की शुरुआत की थी। ऋषि याज्ञवल्क्य के समय तक महाभारत का महासंग्राम हो चुका था। अठारह दिनों तक चले इस महायुद्ध में इतिहास का भयानक जन धन का विनाश हो चूका (गुरुदत्त ने अपने उपन्यास "विनाशय च दुष्कृताम " इसका बृहद वर्णन किया है ) था। आमने सामने खड़ी दोनों सेनाओ ने लाखों सैनिक युद्ध में अपने प्राण गँवा चुके थे। इसी अनुपात में हुए रथ, घोड़े, हाथी धन सम्पदा के विनाश का अनुमान लगाया जा सकता है। इस युद्ध के परिणामस्वरुप देश में जिस सामाजिक और वैचारिक संभरम का माहौल बना उसकी सहज़ और सटीक कल्पना किया जा सकता है। देश में सामाजिक और पारिवारिक सम्वधो को लेकर तनाव का वातावरण हो गया था। 

वैचारिक आंदोलन 

प्रत्येक वैचारिक आंदोलन के पीछे सदैव कोई ऐसी परिस्थिति उत्तेजक प्रेरणा का कारण बनकर हमारे सामने आयी है, जब देश समाज और उसकी अपनी विचारधारा के सामने एक गहरा संकट अथवा अंतरद्वन्द उपस्थित हुआ था और उसकी प्रतिक्रिया में या उसके प्रबल समर्थन में बृहद राष्ट्रीय और राष्ट्रवादी आंदोलन खड़ा हुआ और राष्ट्र ने अपने को और अपनी विचारधारा को पहले से भी और अधिक परिपक्व किया, हर बार सफलता प्राप्त किया। ऋषि याज्ञवल्क्य वेदब्यास के शिष्य थे उनके गुरुकुल के क्षात्र थे। जिन्होंने यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय का 'ईशोपनिषद' अथवा 'ईश्वस्योपनिषद' का नाम देकर इस अध्यात्म आंदोलन का प्रारम्भ किया। ऋषि याज्ञवल्क्य के समय महाभारत का युद्ध प्रारम्भ हो चूका था अठारह दिनों तक चले इस महासंग्राम में अठारह अक्षोंहणी सेना मारी गयी थी। भयानक जन धन का नुकसान हो चुका था। इसी अनुपात में हुए रथ, घोड़े, हाथी धन -सम्पदा के विनाश का अनुमान लगाया जा सकता है। इस युद्ध के परिणामस्वरुप देश में जिस सामाजिक वैचारिक संभ्रम बना होगा उसकी सहज़ ही कल्पना की जा सकती है। अध्यात्म भारत की वैचारिक मुख्य धारा है जो वैदिक काल से ही है।

भगवान बुद्ध का अवतरण और उनकी विचारधारा का अपहरण

महाभारत युद्ध के पश्चात वैचारिक रूप से भारत में खालीपन आ गया था। भगवान बुद्ध के धर्मचक्र की भी कुछ खास बातें थी बुद्ध ने कोई तत्वज्ञान देने की बात नहीं की थी, धर्म की बात की थी। वे तत्वज्ञान से जुड़े प्रत्येक प्रश्न को अव्याकृत यानि बेकार की बातें मानते थे और संसार के दुःख दूर करने की बात करते थे। भगवान बुद्ध की दूसरी विशेषता यह थी कि वे सदैव जन समान्य की भाषा में अपनी बात किया करते थे। तीसरी और सबसे खास बात यह थी कि वे निरंतर प्रवास करते थे। यानी भगवान के तत्वज्ञान नहीं, संसार के दुःख दूर करने का उपदेश दिया करते थे। जो निरंतर था प्रवासशील भी था। इन विशेषताओं से युक्त भगवान बुद्ध का धर्मचक्र प्रवर्तन इतना प्रभाव पैदा करने वाला था कि अध्यात्म के बजाय संसार को महत्व देने वाली भारत की वैचारिक उप धारा के सामने अस्तित्व का संकट उपस्थित हो गया। जैसा भूतकाल में वीसवीं शताब्दी में देश के वामपंथियों ने गाँधी -नेहरू की राजनैतिक यात्रा में किया था और वे कांग्रेस में सदल -बल घुसकर गाँधी, गोखले व नेहरू की कांग्रेस का वैचारिक अपहरण किया, वैसा ही बुद्ध के समय संकटग्रस्त वैचारिक उपधारा ने किया और इस उपधारा की सम्पूर्ण सेना ने कमजोर हो चुकी व्यवस्था को बुद्ध के महानिर्वाण होते ही उसका उत्तराधिकार अपने हाथों में ले लिया। अवसर देख लोग वैसे ही बुद्ध के प्रवक्ता बन गये जैसे समाजवादी, वामपंथी लोग नेहरू के समय गाँधी की विचारधारा का खुल्लम - खुल्ला अपहरण कर लिया था। परिणाम स्वरुप वामपंथियों के समान बुद्ध को आत्म-विरोधी, वेद-विरोधी और यज्ञ-विरोधी घोषित कर दिया, यहाँ तक कि भगवान बुद्ध को प्रथम वामपंथी कहने लगे। जो कि भगवान बुद्ध कभी नहीं थे, क्योंकि वे वैसे थे इसका कोई प्रणाम नहीं मिलता।

अब आचार्य शंकर का अद्वैत आंदोलन 

आदि जगद्गुरु शंकराचार्य के अद्वैत आंदोलन का एक ही पक्ष है जो अब भारत के अद्वैत से परेशान अभिधम्मवादियों के दृष्टि से दार्शनिक कम राजनैतिक अधिक लगता है। वेदांत दर्शन आचार्य शंकर का अद्वैत दर्शन है, भारत में हम इसी दर्शन के आंदोलन की बात कर रहे हैं। जिसकी पृष्ठभूमि को इसलिए हम इतना विस्तार से बताने को आवश्यक समझे ताकि इस आंदोलन को भारत के दार्शनिक विकास में उसके सही योगदान को सही परिपेक्ष में देखा जा सके। अन्यथा असल में अद्वैत आंदोलन इतना प्रभावी रूप से चला है कि भारत में शंकराचार्य और अद्वैत दोनों ही पर्यायवाची बन गये हैं। जिस विचारधारा ने, भारत की आध्यात्मिक विचारधारा ने, यानी भारत की वैचारिक मुख्यधारा ने विष्णु के अवतार के रूप में प्रतिष्ठित उस विचारधारा का भारत में कैसा अद्भुत प्रभाव रहा होगा जो आजतक बना हुआ है। जगद्गुरु शंकराचार्य का अद्वैत के स्थापना के साथ ही मानों भारत को संवाद के रूप में बदल दिया गया षडदर्शनों के शेष पांच दर्शन संप्रदाय,  न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग और मीमांसा तो अब ऐतिहासिक सन्दर्भ को उधृत मात्र करने के लिए रह गए हैं। मानों देश क्रमशः वेदांती हो गया है वेदांत हमारी परंपरा में "उपनिषद" शब्द का पर्यायवाची है, वेद और अंत। इसमें वेद शब्द का अर्थ हम सभी जानते हैं, पर हम अंत शब्द का अर्थ भूल सा गये हैं, अंत शब्द का अर्थ है --संपूर्णता को प्राप्त, यानी वेदों की सम्पूर्णता उपनिषदों में है, उपनिषदों का दार्शनिक शंदेश है--"तत त्वम् असि " = तत्वमसि; त्वँ यानी तुम आत्मा, तत यानी ब्रम्हा हो। तुम ही ब्रम्हा हो, आत्मा ही परमात्मा है, तुम दोनों अगर एक दूसरे से पृथक भिन्न रहे हो तो वह 'माया' है। यही अज्ञान है, जिसे तुम्हें दूर करना है इस अज्ञान से मुक्त होकर अपने ब्रम्हा स्वरुप फिर से पा लेना है, यही वेदांत है, यही अद्वैत है बाकी सब उसकी ब्याख्याएं ही हैं।

शंकराचार्य द्वारा शास्त्रर्थ के बल पराजित

जब आचार्य शंकर ने वेदांत की प्रतिष्ठा कर दी तो भारत के धर्म-दर्शन के सम्पूर्ण संसार में अभूतपूर्व हलचल मच गई जिसके कुछ परिणामों को हम देखते हैं। पहला परिणाम तो वही समझ में आया जिसकी चर्चा हम इस आलेख में कर रहे हैं, भगवान बुद्ध ने जिस उपनिषद विचारधारा के निमित्त धर्मचक्र प्रवर्तन की घोषणा की और जिसे अनात्म वादी, देहवादी, इहलोकवादियों ने अपने भरसक प्रयासों से देहवादी और अनात्मवादी घोषित कर दिया था, जगद्गुरु शंकराचार्य ने भारतीय विचारधारा को पुनः अपने मुख्य मार्ग पर ला खड़ा कर दिया यानी भगवान बुद्ध की और उनके धर्मचक्र प्रवर्तन की प्रतिष्ठा हुई और उपनिषदों के प्रतिपादन आत्मवादी दर्शन की, भगवान की संवोधि और उनका निर्वाण इस सम्पूर्ण आत्मवादी दर्शन की प्रतिष्ठा हुई। जिन लोगों ने बुद्ध के धम्म को बुद्धघोष के प्रभाव में आकर 'अभिधम्म' बनाकर बिगाड़ दिया, उन सभी धम्म विरोधियों को तर्क और शास्त्रर्थ के आधार पर परास्त किया।

आचार्य शंकर के अद्वैत की निरंतरता 

शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन की विभिन्न व्याख्याएं कई रूपों में सामने आयी, जो शंकर के पश्चातl आज तक चल रही है, स्वामी विवेकानंद के समय तक चली है देश के प्रसिद्ध उपन्यासकार गुरुदत्त ने 'दिग्विजय' और नरेंद्र कोहली ने 'कारा तोड़ो कारा ' इन उपन्यासों के माध्यम से आज भी चल रही है। पर शंकराचार्य के बाद दशकों, सदियों में जो व्याख्याएं हुई हैं, उन्हें आचार्य निम्बार्क के द्वैताद्वैत, रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत, माधवाचार्य के द्वैत, वल्लभाचार्य के शुद्धाद्वैत, आचार्य अभिनवगुप्त के कश्मीरीय अद्वैत -इन नामों से प्रमुख रूप से जाने, समझे व पहिचाने जाते हैं। अर्थात आदि शंकर ने जिस अद्वैत दर्शन का प्रारम्भ किया वह अभी तक चल रहा है यह कह सकते हैं कि ऋषि याज्ञवल्क्य का अध्यात्म आंदोलन निरंतर चल रहा है उसी तरह जगद्गुरु शंकराचार्य का अद्वैत आंदोलन भी निरंतर चल रहा है।


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