महाभारत
महाभारत में बड़ी संख्या में अभूतपूर्व योद्धा, आध्यात्मिक योद्धा, वैज्ञानिक, सैनिक मारे गए जिसकी कल्पना करना बहुत मुश्किल है। पूरी तौर पर देश खाली हो चुका था अब भारत के सामने एक़ बड़ी चुनौती थी भारत की आध्यात्मिकता, भारत की लुप्त होती राष्ट्रीयता उसके बीच एक़ महान दार्शनिक आध्यात्मिक राष्ट्रीयता के प्रेरक, आध्यात्मिक आंदोलन के उदगाता महर्षि याज्ञवल्क्य। भारत और अध्यात्म का चोली दामन का साथ है इसे अलग कर पाना कठिन तो है ही लेकिन यह भारत के साथ अन्याय होगा जो संभव ही नहीं है, यदि भारत से अध्यात्म और राष्ट्रीयता अलग करने का प्रयत्न हुआ तो यह देश के साथ घात होगा। भारत के कुछ राजनैतिक दलों ने यह प्रयत्न किया लेकिन या तो वे समाप्त हो गये नहीं तो अपना अस्तित्व समाप्त करने पर मादा हैं। भारत की राष्ट्रीयता और अध्यात्म कुछ इस प्रकार है जैसे दूध मे पानी मिला रहता है। भारत की राष्ट्रीयता वैदिक काल से चली आ रही है ऋग्वेद कहता है "वयं राष्ट्रँ जाग्रयाम पुरोहिता " और ऋषि दयानन्द, याज्ञवल्क्य कहते हैं अपौरुषेय है। जबसे मानव सृष्टि हुई तभी सब वेद है। इसी ऋग्वेद का मंत्र एक़ गायत्री मंत्र है जिसमें सूर्य की उपासना है, जिससे हमारी बुद्धि को प्रखरता मिलती रहे, सारे संसार मे यह मंत्र अपनी प्रतिष्ठा करने में अग्रसर है। वे धर्मराज के राजसूय यज्ञ में रहे (उनकी आयु तीन सौ वर्ष की थी) फिर परीक्षित के राजतिलक में भी रहे वेदव्यास जी से उनका वैचारिक मत भेद होने के कारण उन्होंने हस्तिनापुर छोड़कर मिथिला नगरी पहुँचे जहाँ राजा जनक के दरबार में शास्त्रर्थ की परंपरा शुरू किया जिससे उपनिषदों का निर्माण हुआ जिसे हम ज्ञान मार्ग कहते हैं जहाँ वेदव्यास भक्ति मार्ग के उपासक थे वहीँ याज्ञवल्क्य ज्ञान मार्ग के उपासक थे।
आध्यात्मिक परंपरा
यह अध्यात्म नहीं तो और क्या है ? ऋग्वेद के ही अस्यवामिय सूक्त मे ऋषि दीर्घतमा ने कहा है कि सत्य एक़ है, परन्तु विद्वत जन इसकी व्याख्या अपने -अपने तरीके से करते हैं --"एकम् सद विप्रा :बहुधा वदंति" तो यह भारत का अध्यात्म ही है। रामायण और महाभारत दोनों ऐतिहासिक ग्रन्थ के साथ -साथ आध्यात्मिक ग्रन्थ के कारण भी प्रतिष्ठित हैं, इससे यह स्पष्ट है कि भारत और अध्यात्म की यात्रा एक साथ, साथ -साथ सदियों व सहसत्राबदियों से लगातार चलती आ रही है। पर हमें यह बात हमेसा याद रखनी चाहिए कि भारत मे अध्यात्म के अविराम प्रवाह के वावजूद देश में अध्यात्म को आंदोलन के रूप में प्रवर्तित करने का श्रेय पूज्य ऋषि याज्ञवल्क्य को ही जाता है। हम इस समय आध्यात्मिक आंदोलन की कर रहे हैं, जिस आचार्य ने पहली बार इतना बल देकर रेखांकित करते हुए कहा कि आत्मा को समझना जरुरी है,' "अहम् ब्रम्हास्मी" ऐसे आचार्य को हम "ऋषि याज्ञवल्क्य" के नाम से जानते हैं। वास्तव में ऋषि याज्ञवल्क्य भक्ति मार्ग के उपासक न होकर वे ज्ञान मार्ग के उपासक थे।
भारत में आध्यात्मिक आंदोलन के प्रवर्तक के ऋषि याज्ञवल्क्य के नाम तीन बड़े योगदान दर्ज है। पहला योगदान है शुक्ल यजुर्वेद के नाम से 'यजुर्वेद संहिता' का संकलन। वेदव्यास ने अपने काल में जो वेद श्रुति के रूप था उसे संकलित कराया, जो हज़ारों वर्षो से कई अचार्यो, ऋषियों द्वारा भाष्य किया गया। ऋषि याज्ञवल्क्य ने यज्ञ सम्वधी निर्देशों से विहीन सिर्फ मंत्रो से युक्त यजुर्वेद का एक नया भाष्य, संहिता यानी संकलन प्रचलित करवाया, यज्ञसम्वधी निर्देशों से रहित इस यजुर्वेद को शुक्ल यजुर्वेद बन गया और उसे "शुक्ल यजुर्वेद" कहा जाने लगा। वेदव्यास के भाष्य को "कृष्ण यजुर्वेद " कहना शुरू कर दिया। भारत की वैदिक परंपरा में शुक्ल यजुर्वेद की प्रतिष्ठा हो जाना ऋषि याज्ञवल्क्य का एक अद्भुत योगदान माना जाता है।
भगवान श्री कृष्ण का आध्यात्मिक स्वरुप
अब तक देश में अध्यात्म विद्या को, ब्रम्हा विद्या को उपनिषद विद्या अथवा उपनिषद के नाम से कहा जाता था, रामायण और महाभारत को प्रबंध कव्यों में जहाँ भी उपनिषद विद्या का शब्द मिलता है, वह इसी ब्रम्हाविद्या व अध्यात्म विद्या के रूप में ही जाना जाता है। एक लोकोक्ति है, "सर्वा: उपनिषद: गवो दोग्धा गोपालनन्दन :", यानी सारे उपनिषद गायों के दूध के समान है और गोपाल कृष्ण ने इन गउवो का दूध दुहकर पार्थ अर्जुन को पिला दिया। इस सुभाषित में इसी उपनिषद यानी ब्रम्हाविद्या का संकेत पाया जाता है, जिसके सन्दर्भ रामायण और महाभारत में जहाँ तहां मिल जाते हैं। पर उपनिषद नामक साहित्य धारा का प्रवर्तन करने का श्रेय ऋषि याज्ञवल्क्य को, वेदब्यास के गुरुकुल के शिष्य को जाता है। जिन्होंने इशोपनिषद की रचना के साथ इस नयी आध्यात्मिक का श्रीगणेश किया।
जब बौद्ध इस्लामिक बन गये
पूरे पश्चिम व मध्य एशिया जहाँ कभी बौद्ध धर्म पंहुचा था, वहाँ के सभी देश इस्लाम मतावलंबी बन अब ये देश इस्लामी देश बन चुके हैं। वहाँ सभी बौद्ध जनों का इस्लामीकरण हो गया। इधर भारत में आचार्य ऋषि याज्ञवल्क्य द्वारा प्रवर्तित आध्यात्मिक आंदोलन कई रूपों में विकसित और पोषित पल्लवित होता रहा तमाम आक्रमण को झेलता हुआ मदरसों और चर्चो को असफल कर्ता रहा। जहाँ एक ओर निगम परंपरा शुरू हुई, तो दूसरी ओर आगम परंपरा का विकास बराबर होता रहा। निगम परंपरा में उपनिषदों के आधार पर सांख्य, योग, न्याय, वैशेसिक, मीमांसा वेदांत ये सभी दर्शन संप्रदाय का स्वरुप ग्रहण कर लिया। वहाँ दूसरी ओर आगम परंपरा में एक लम्बी तीर्थंकर यात्रा के शिखर व्यक्तित्व भगवान महाबीर से अनुप्राणित जैन दर्शन संप्रदाय तथा भगवान बुद्ध से अनुप्राणित बौद्ध दर्शन देश में छा गया। तंत्र विद्या सभी से जुड़ा है निगम मे भी आगम में भी, वेशक उसकी गणना आगम में होती रही है। यानी ऋषि याज्ञवल्क्य द्वारा प्रवर्तित भारत में सम्पूर्ण अध्यात्म आंदोलन इसी निगमागम परंपरा का ही प्रतिफल है विस्तार भी है अभिव्यक्ति भी है। यही समझने की आवस्यकता है कि भारत की अध्यात्म परंपरा यानी ज्ञान मार्ग इन दो परंपराओं में अभिव्यक्ति होती चली आ रही है जो आज भी जारी है।
और देश बच गया
इसी लम्बी और अनवरत चली आध्यात्मिक परंपरा में से दूसरा वैचारिक आंदोलन ने जन्म ले लिया, जिसे हम अद्वैत आंदोलन कहते हैं। अद्वैत आंदोलन इसी आध्यात्मिक आंदोलन की संतती तथा विशिष्टतम अभिव्यक्ति बन गयी, और इसके उत्तराधिकारी आदि जगद्गुरु शंकराचार्य होकर नास्तिक राष्ट्र विरोधी बौद्ध मत को शास्त्रर्थ के बल समाप्त कर राष्ट्रवाद की पुनरप्रतिष्ठा की। इस प्रकार वैचारिक आंदोलनों एक मधुरतम फल सामने आया है कि गुलामी की सदियों में भी इस विराट, वैचारिक आंदोलन ने देश के वैचारिक आध्यात्मिक राष्ट्रवाद के व्यक्तित्व को बचाये रखा है। और यह प्रवाह किसी न किसी रूप में निरंतर जारी है।

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