धर्म विशेष

नेपाल राजा महेंद्र हिन्दूराज्य, माओबाद और लोकतंत्र

        
            नेपाल की स्वतंत्रता आन्दोलन के बाहक बी.पि.कोइराला तत्कालीन शासक राणा जो श्री-३ हुआ करते थे तथा राजा त्रिभुवन के बीच भारत के प्रधानमंत्री नेहरु की देखरेख में जो १९५० में समझौता हुवा मोनार्की विथ मल्टी पार्टी डेमोक्रेसी 'त्रिभुवन पावर फुल राजा हुए श्री बी.पि.कोइराला प्रजातंत्र के पहले प्रधानमंत्री हुए ,राजा त्रिभुअन और कोइराला ने अपने देश की चिंता करते हुए पडोसी देशो से भी अच्छे सम्बन्ध बनाये रक्खा राजा सेना क़ा पर्मधिपति हुआ निर्णय के अधिकार यानि १०४ वर्ष के बाद सर्बसत्ता सम्पन्न राजा।
          राजा त्रिभुवन की देहावसान के पश्चात् उनके पुत्र युवराज महेंद्र क़ा राज्याभिषेक हुवा बी.पि.कोइराला प्रधानमंत्री बने रहे १९५९मे नेपाल क़ा प्रथम प्रतिनिधि सभा क़ा चुनाव हुवा १०९ सीटो में से कोइराला को यानी नेपाली कांग्रेस को ७४ सीटे प्राप्त हुई ,महेंद्र के मन में हीन भावना ग्रंथि होने के कारण हमेसा भारत व भारतीय संस्कृति से अलग दिखाने के चक्कर में धीरे-धीरे वे भारत बिरोधी होते चले गए उनके मन में था की कांग्रेस पार्टी लोकतान्त्रिक पार्टी होने के नाते तथा भारतीय समाजबादियो से सम्बन्ध के कारण वे कांग्रेस भारत के पक्षधर समझाने के कारण वे कांग्रेस के घोर बिरोधी हो गए और बामपंथी बिचार को बढ़ावा देना शुरू किया ,उन्होंने नेपालियों में यह प्रचारित करना शुरू कर दिया की भारत नेपाल को हड़प लेना चाहता है इसी बीच चीन ने नेपाल के प्रधान मंत्री को चीन यात्रा पर बुलाया बी.पि.के साथ तत्कालीन कांग्रेस के बरिष्ठ नेता गणेशमान सिंह भी गए चीन के मावुचेतुंग ने नेपाल के सामने एक प्रस्ताव रखा की हिमालय हमारा है और हिमालय के उत्तर टिगड़ी नदी तक १६ की.मी.जो नेपाल के कब्जे में था चीन को दे दीजिये उसके बदले जो धन चाहिए हम देने को तैयार है,बी.पि.तो चुने हुए प्रधानमंत्री थे देश-भक्त भी होने के नाते ऐसा समझौता कर नहीं सकते थे यह बात चीन को नागवार गुजरी बी.पि.के वापस आने के एक महिना के पश्चात् राजा महेंद्र ने बी.पि.को गिरफ्तार कर लिया और चीन को आधा हिमालय सहित तिगनी नदी तक क़ा सारा भूभाग चीन को एक समझौते के तहत दे दिया ,चीन की शर्त थी की नेपाल में बामपंथी को बढ़ावा मिले और भारत क़ा बिरोध इसके बदले चीन ने नेपाल में मोनार्की को परमानेंट समर्थन देने क़ा तय किया महेंद्र ने तुलसी गिरी को प्रधान मंत्री बनाकर नेपाल को हिन्दू किंगडम घोषित किया जिससे भारत के हिन्दू बादी शक्तियों क़ा समर्थन प्राप्त हो और उसमे वे सफल भी हुए दूसरी तरफ उन्होंने चीन के इशारे पर जो-जो बिषय भारत व भारतीय संस्कृति से जोड़ने वाली थी उसे समाप्त करना शुरू कर दिया.
            नेपाल के मठ, मंदिरों में अकूत संपत्ति थी सोने-चादी की मुर्तिया थी राजा ने एक गूठी संसथान बनाकर सब अधिग्रहण कर लिया सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिया सभी कीमती मूर्तियों को सुरक्षा के नाम पर काठमांडू उठा ले गए ,एक आदेश जारी हुवा की जो नेपाली नागरिक नहीं है वह मंदिर क़ा महंथ, पुजारी नहीं हो सकता उस समय अयोध्या,मथुरा इत्यादि स्थानों से महंथो की नियुक्ति होती थी सारा नियंत्रण यही से होता था क्यों की सांस्कृतिक रूप से भारत नेपाल एक था ,महेंद्र ने भारत बिरोधी राष्ट्रबाद पैदा किया दरबारी यानि भारत बिरोधी, राष्ट्रबादी यानी भारत बिरोधी सारे संस्कृत विद्यालयों में वामपंथियों क़ा अधिकार सा हो गया हिन्दू राज्य घोषित कर हिन्दू बिरोध , योजना वद्ध तरीके से बामपंथियो को दरबार द्वारा मानधन देकर सभी सरकारी सन्सथानो में बामपंथियो रखा जाने लगा ,राजा बिरेन्द्र क़ा समय आते-आते और उनके समय भी बामपंथियो को प्रोत्साहन बना रहा और बामपंथी बिचार भी भारत बिरोधी होकर उभरा यानि अब नेपाल में राष्ट्रबादी यानी भारत बिरोधी दो ताकते हो गई ।
           लोकतंत्र की हवा सम्पूर्ण विश्व में चल रही थी उससे नेपाल अछूत नहीं रह सकता था राजा क़ा बिरोध बढ़ता जा रहा था बामपंथियो ने ऊपर तो राजा से मेल रहे लेकिन जनता में वे राजा के घोर बिरोधी थे जन आन्दोलन से राजा को झुकना पड़ा और पुनः संबैधानिक राजतन्त्र बहुदल ब्यवस्था बहल हुई नेपाली कांग्रेस सत्ता में आई हिन्दू राज्य बहल रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ महेंद्र के समय में ही हिन्दू संगर्थान के लिए कार्यकर्ता भेजे थे लेकिन राजा ने कार्य होने नहीं दिया क्यों की संघ तो देश भक्ति व स्वतंत्र रहना सिखाता है यह राजा को अच्छा नहीं लगा दस बर्ष तक कार्यकर्ता वह रहने के बाद वापस चले आये प्रजातंत्र आने के पश्चात् १९९१ में फिर से संघ क़ा कार्य शुरू हुआ, राजा बिरेन्द्र क़ा परिवार समाप्त होने के पश्चात् ज्ञानेंद्र राजा हुए वे अपने पिता महेंद्र के नक्सेकदम पर चले और प्रजातान्त्रिक सरकार को समाप्त कर सम्पूर्ण सत्ता अपने हाथ में ले लिया, मावोवादियो ने अपना कार्य तेज कर दिया यह उनके लिए यह उपयुक्त अवसर था क्यों की राजा ज्ञानेंद्र उनके कार्य में सहायक थे अन्दर-अन्दर उनका समझौता था वे प्रचंड, बाबुराम की चल को समझ नहीं पाए सेना ने कभी भी मोबदियो पर अटैक नहीं किया जहा भी अटैक हुआ वह राजा बिरेन्द्र के पक्षधर सेना के लोगो की हत्या हुई पूरे माओवादी आतंकबाद में लोकतंत्रबादीयों पर तो अटैक हुवा लेकिन किसी भी राजवादी पर कोई हमला नहीं हुआ ,राजा और मावोबादी क़ा एक ही लक्ष्य था की लोकतान्त्रिक ताकतों को समाप्त करना, अंत में माओवादियों को सफलता नहीं मिलने के कारण वे लोकतान्त्रिक धारा में आकर समझौता किया सभी दल एक हो गए नेतृत्व गिरजा बाबू के हाथ में आया आन्दोलन गाँधीबादी स्वरुप क़ा था पूरा नेपाल ठप था भारत ने प्रयत्न किया की राजा और लोकतान्त्रिक ताकते एक हो जाय राजा नहीं माना अंत में लोकतान्त्रिक ताकते और मावोबादी दोनों एक रास्ते में आ गए राजा को झुकना पड़ा पुनः गिरजा बाबू प्रधानमंत्री हुए ।
         संबिधान सभा क़ा चुनाव हुआ जिसमे माओवादियों को सर्बाधिक सीटे मिली लेकिन किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला चुकी बामपंथियो की संख्या जादे थी प्रचंड के नेतृत्व में सरकार बनी चीन ने राजा के समझौता को धता बताकर मावोबादी के पक्ष में चला गया बाद में प्रचंड ने नेपाली राष्ट्रबदियो क़ा आवाहन किया की हमारे साथ हो जाय तमाम राजाबादी माओबादी में सामिल हो गए महेंद्र ने जो हिमालय सहित उस पार की जमींन चीन को दिया अपने को देशभक्त बताने वाले मवोबादियो ने कभी चर्चा भी नहीं की और जन बिरोधी निति के कारण प्रचंड ९महिने में ही सत्ता से बाहर हो गए ,आज पूरे नेपाल में मावोबाद आतंकबाद क़ा पर्याय हो गया है पूरे देश में उनके खिलाफ बिद्रोह हो रहा है आवश्यक है की लोकतान्त्रिक माधव नेपाल की सरकार को समर्थन देना और दो- तिन साल उसे टिकाये रखना मावोबादी नेपाल की भूमि से समाप्त होने की प्रक्रिया में है वह हिन्दू भूमि है और आगे भी रहेगी उसी से देश क़ा और दुनिया क़ा कल्याण होने वाला है नेपाल को यह समझाना पड़ेगा की चीन किसी के साथ नहीं है वह तो भारत बिरोध के साथ है ।

3 टिप्‍पणियां

Himwant ने कहा…

संघ नेपाल में मित्रो के प्रति दुश्मन जैसा व्यवहार तथा दुश्मन से मित्र जैसा व्यवहार तो नही कर रहा है? क्या कही कोई दृष्टि-दोष तो नही है ? मुझे शक है की नेपाल के मामले को संघ ईसाईयो के चश्मे से देख रहा है ।

दीर्घतमा ने कहा…

Himwant ji sabhi ko kadui sacchhai ko swikar karne me aur wastavikta ko janane ki awasyakta hai .Nepali apna itihas ko nahi janana chahta .
fir bhi bichar kariye .
dhanyabad

Himwant ने कहा…

राणा प्रधानमंत्रीयो का अंत तथा शाहवंशीय राजाओ के शाषन कि पुनर्स्थापना भारत के सहयोग से होने के बावजुद राजा महेन्द्र चीन की मित्र शक्ति बन गए तथा हिमालय का दक्षिणी भाग चीन को सौप दिया जो नेपाल की जनता के साथ बहुत बडा धोखा था। गिरीजा को भारत ने सत्ता मे लाया तो उन्होने यहां धर्मानतरण कराना शुरु कर दिया। आज की बात करे तो भारत ने माओवादीओ एवम लोकतांत्रिक शक्तियो के साथ संझौता कराया तथा उन्हे सत्ता मे आने के रास्ता प्रशस्त किया । लेकिन सता मे आने के बाद वे भारत-विरोधी हो गए। उपेन्द्रको सता मे लाया - लेकिन वह भारत विरोधी हो गए। ऐसा क्यो होता है। कही आप अमेरीकीयो के झांसे मे तो नही आ रहे है? कदाचित नेपाल मे भारतीय कुटनीति मे कोई कमी तो नही जो मित्र दुश्मन बन जाते है। फिर आप दुश्मनको मित्र बनाने की कवायद शुरु कर देते है। नेपाल के राज भारत के स्वभाविक मित्र थे। आप उनके साथ मित्रता क्यो नही बना कर रख सके।