गुरु और राष्ट्र को समर्पित महर्षि दयानंद सरस्वती-----!


मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

              महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्म १२ फरवरी १८२४ को टंकारा (गुजरात) एक प्रतिष्ठित सम्पन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था, वे युग निर्माता थे उन्होंने भारतीय वांग्मय वैदिक सनातन धर्म के लिए काम किया अथवा अपने शिष्यों को प्रेरित किया आधुनिक युग में वे अकेले ही अपने पथ के पथिक थे, आज जो भी अथवा जिनको भी भारतीय राष्ट्रवाद प्रणेता के नाते हम जानते हैं चाहे लोकमान्य तिलक, वीर सावरकर, बिपिनचंद पाल, लाला लाजपतराय हों अथवा श्यामजी कृष्णवर्मा सहित हज़ारों क्रन्तिकारी जिन्होंने देश आज़ादी हेतु फांसी फंदे को चूमा वे सभी महर्षि के अनुयायी ही नहीं महर्षिकृति के प्रकट रूप थे आज भी हिन्दू विचार धारा को लेकर जो काम स्वामी जी के अनुयायी ही कर रहे हैं शायद कोई कर रहा होगा यह उनकी तपस्या का ही परिणाम है.
          स्वामी जी के बचपन का नाम मूलशंकर था उनका मन दीन, दुखियों, दलितों को देख ब्यथित हो जाता वे विचार करते कि सभी उसी भगवान की संतान हैं फिर क्यों भेद-भाव ? वे गरीबों को देख बिचलित होते-! वे भारत माता की गुलामी जिसकी संताने यसस्वी महाराणा प्रताप, शिवाजी महराज जैसी हुई, जिस माँ ने श्रीराम, श्रीकृष्ण जैसे महापुरुष दिए, जिस धरती माँ ने विश्वामित्र, परसुराम जैसे ऋषियों को जन्म दिया हो उसकी यह दुर्दशा वे दुखी होते, वे दुखी होते अपने समाज कि दुर्दशा देख, वे दुखी होते अपने वैदिक साहित्यों को विकृति होते देख, वे ब्यथित मन से भारत भ्रमण करते हुए विचार करते सन्यासी हो गए .
           उन्हें गुरु नहीं मिल पा रहा था एक दिन एक संत ने बताया कि तुम्हारे योग्य गुरु तो मथुरा के स्वामी विरजानंद है वही तुम्हारे गुरु हो सकते हैं स्वामी जी मथुरा स्वामी विरजानंद के आश्रम पहुचे उनके सिरपर बहुत सारे साहित्यों का गट्ठर था विरजानंद ने कहा कि यदि उनसे क्षिक्षा लेनी है तो तुम्हे यह सारे ग्रन्थ यमुना जी में फेकना होगा (विरजानंद जन्मांध थे) स्वामी जी ने वैसा ही किया लगातार तीन वर्षों तक उन्हीने वैदिक साहित्यों का अध्ययन किया, स्वामी विरजानंद बड़े ही कठोर अनुशासन पालन करने वाले थे वे एक बार मंत्रो को बताने के बाद दुहराते नहीं थे एक बार स्वामी जी पर वे बहुत नाराज हो गए वे दंड से अपने शिष्यों को पीटते स्वामी दयानंद खड़े थे जब उन्हीने दंड से मारने लगे तो उनका दंड दयानंद पर न लगा जमींन पर लगने से उनका हाथ झंझनाने लगा दयानंद जी दौड़कर उनका हाथ सहलाने लगे आपको कष्ट तो नहीं हुआ अब मै आपके सामने हू अब दंड चलाईये अपने गुरु के प्रति उनका आदर अदुतीय था अपने पिता से कहीं अधिक अपने गुरु के प्रति स्नेह था, स्वामी विरजानंद ने अपने प्रिय शिष्य को उनके पास जो कुछ था सबकुछ दे दिया और गुरु दक्षिणा में वेदों के प्रचार भारतीय स्वतंत्रता का वचन लिया उसी दिन स्वामी जी देश और भारतीय वैदिक साहित्यों हेतु अपना जीवन समर्पित कर दिया वे महर्षि दयानंद सरस्वती हो गए 1869 मे काशी नरेश के यहाँ विश्व प्रसिद्ध शास्त्रार्थ कर विजय प्राप्त किया, उन्हे लगा की बिना किसी संगठन के हम समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते १८७५ मे मुंबई मे आर्यसमाज की स्थापना की आठ वर्षों मे उन्होने संगठन के साथ ऋग्वेद भाष्य किया तथा ऋग्वेद भाष्यभूमिका सहित 43 ग्रन्थों का निर्माण किया उनके अडिग मन के सामने कोई भी बाधा काम नहीं कर पायी।
            एक बार वे मथुरा के प्रवास पर थे जहाँ जाते वहाँ शास्त्रार्थ होता सभी पराजित होते कोई भी मुल्ला- मौलबी या पादरी नहीं टिकता सनातनी साधू-संत भी उनसे जलन रखते एक बार एक महंत ने स्वामी जी की सेवा हेतु एक अपने गुंडे को भेजा वह पहलवान स्वामी जी से बड़ी बिनम्रता से उनका पैर दबाने के लिए आग्रह करने लगा स्वामी जी तो समझ गए की वह क्या चाहता है ! रात्री के समय जब वह उनका पैर दबाने लगा तो उसे लगा की स्वामी जी का पैर तो लोहे का बना हुआ है वह डर गया, स्वामीजी मुझे क्षमा कर दीजिये मुझे एक महंत ने आपको मारने के लिए हमे भेजा था और क्षमा मागते हुए वह चला गया। 
           एक बार स्वामी जी मेरठ एक प्रवचन कार्यक्रम मे गए कमिश्नर कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे बड़ी संख्या मे मुल्ला-मौलबी तथा पादरी इकट्ठा थे उन्हे लगा की एक सन्यासी ही हिन्दू धर्म की आलोचना करेगा बड़ी संख्या मे लोग जमा थे स्वामी जी जब पुरानों पुराणों की आलोचना शुरू की तो ईसाई मुसलमान दोनों बड़े ही प्रसन्न होने लगे थोड़ी ही देर मे उन्होने कुरान और बाइबिल की पोल खोलने लगे धीरे-धीरे सभी खिसकने लगे कोई भी स्वामी का उत्तर देने की हिम्मत नहीं जूता सका सायं कल स्वामी जी गंगा जी के किनारे घूमने गए उनका ध्यान लग गया गंगा जी की निर्मल धारा देख ध्यानस्थ हो गए कुछ मुस्लिम गुंडों को स्वामी जी पाच नहीं रहे थे वे उन्हे ठिकाने लगाना चाहते थे गुंडो ने स्वामी जी को ध्यानस्थ देख उनके दोनों हाथो को दोनों गुंडो ने पकड़कर गंगा जी मे फेक देना चाहते थे स्वामी जी ने अपना हाथ ढीला कर दिया उनका हाथ ठीक से पकड़ मे आ गया तब-तक स्वामी जी ने अपना हाथ दबाया और खड़े हो गए स्वामी जी लंबे तगड़े थे गुंडे लटक से गए स्वामीजी ने गंगा जी मे छलांग लगाई जब इस्लामी गुंडे डूबने लगे दयाकर स्वामी जी ने उन्हे छोड़ दिया क्षमा मगते हुए वे सब भाग निकले ऐसे थे स्वामी जी अपने जीवन को अपने गुरु का आदेश मान देश और धर्म के काम मे लगा दिया स्वामी जी ऐसे संत थे, यदि देश आज़ादी का श्रेय किसी एक को देना हो तो अकेले वे महर्षि दयानन्द सरस्वती ही उसके अधिकारी होगे, उन्होने इस्लामी काल के घर वापसी पर लगे प्रतिबंध को समाप्त कर पुनः घरवापसी शुरू कर हिन्दू समाज को नवजीवन प्रदान किया वास्तव मे वे भारतीय नवजागरण अग्रदूत थे।               
Reactions: