चैतन्य महाप्रभु मध्यकाल के योद्धा सन्यासी थे-------------!


गुरुवार, 13 मार्च 2014

      
        गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं जब-जब धर्म की हानि होती है अधर्म बढ़ता है मै आता हू, वे आये इस बार गौरांग महाप्रभु के रूप में-------! 
         वे भारत के महान सन्यास परंपरा के वाहक थे कहते हैं कि वे कृष्णावतार थे जिन्होंने बर्बर इस्लामिक काल मे भी हिन्दुत्व की ध्वजा ही नहीं फहराई बल्कि समय-समय पर विधर्मी हुए हिन्दू समाजकी घर वापसी भी की, वे सन्यासी तो हुए शंकर मत यानी अद्वैत सन्यासी लेकिन बाद मे बल्लभचार्य के भी शिष्य बने और कृष्ण भक्ति में सराबोर होकर समाज में नवचेतना के अग्रदूत हो गए वे योद्धा सन्यासी थे भय उनके निकट आता ही नहीं था जैसे श्री कृष्ण स्वयं ही उनके ह्रदय में विराजते हों वे बर्बर इस्लाम की चुनौती बन उभरे और हिन्दू समाज के अंदर ब्याप्त भय को नेस्तनाबूत कर दिया उन्होंने हिंदुओं को अभय महामंत्र दिया,
       हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे.
       हरे  राम  हरे  राम,   राम  राम  हरे  हरे.
यह महामंत्र मानो राष्ट्रमंत्र हो गया भक्ति राष्ट्रभक्ति मे परिनिति हो अपनी पराकाष्ठा केवल बंगाल में ही नहीं बल्कि बिहार, बंगाल और उड़ीसा उत्तर प्रदेश भी अछूता नहीं रहा उन्होंने तीर्थ यात्रा के माध्यम से भारत माता कि परिक्रमा भी की, चैतन्य महाप्रभु मध्ययुग के भारत की महँ अध्यात्मिक बिभूति थे, जब हिन्दू धर्म तथा हिन्दू समाज बिजातीय भावों द्वारा आक्रांत हो रहा था ऐसे काल में उनके अविर्भाव से इस राष्ट्र में मानों एक प्राणवायु का संचार हुआ, आज भी उनका जाज्वलमान पूत चरित हमारे जीवन में श्रद्धा, भक्ति, वैराग्य, अनाशक्ति आदि सात्विक भावों यानी स्वधर्म की प्रेरणा जगाता है. यदि इस घोर संकट के समय उनका आगमन नहीं हुआ होता तो यह कह पाना कठिन है की आज बंगाल, उड़ीसा व पूर्वी बिहार में अपने को हिन्दू कहकर परिचय देने वाला कोई मिल पाता या नहीं.
            इनके पिता जगन्नाथ मिश्रा माता शची देवी बड़े ही सात्विक और धर्म प्राण थे इनका मूल गांव ढाका के दक्षिण श्रीहट था उस समय नदिया शिक्षा का बड़ा केंद्र था जहाँ देश-देशान्तर से लोग केवल शिक्षा ग्रहण करने ही नहीं बल्कि शास्त्रार्थ के लिए भी आते थे जगन्नाथ मिश्र शिक्षा प्राप्त के पश्चात् नदिया में बस गए जो नवद्विप के नाम से जाना जाता है ईसवी सन १४८५ को फाल्गुन मास की होली पूर्णिमा के दिन संध्या को चंद्रग्रहण लगाना शुरू हुआ लोग हरिनाम कीर्तन करते हुए गंगा स्नान के लिए जा रहे थे रात्रि के प्रथम प्रहर  अति शुभ मुहूर्त में नवद्वीप को आलोकित करते हुए चैतन्यदेव का जन्म हुआ जहाँ जन्म हुआ था वह प्रसूत गृह नीम के पेड़के नीचे था इसलिए इनका नाम निमाई पड़ा पुरोहित ने विचारकर इनका नाम विशम्भर रखा बहुत सुन्दर कृष्ण के सामान नहीं काले नहीं वे अति सुन्दर के साथ-साथ बहुत ही गोरे थे अनायास ही माताएं उन्हें गोद में लेने के लिए ब्याकुल हुआ करती थीं इस कारन इन्हे गौरांग महाप्रभु भी कहने लगे.
         यह वह काल था जब बख्तियार खिलजी भारत को कुछ घुड़सवार सैनिको के साथ आक्रांत करता हुआ मठ- मंदिरो को तोड़ता हुआ नालंदा जैसे गुरुकुलों को जलाता हुआ इलाहबाद के रस्ते से बिहार में घुसकर लूट मार मचानी शुरू कर दी बख्तियार ने बिहार को जी भर कर लुटा और रौदा कुलीन घरों की स्त्रियां छाट-छाट कर निकाली गयीं और वे वैश्यालयों से भी बुरी स्थित में पंहुचा दी गयी, गुरुकुलों के विद्वानो को मौत के घाट उतर दिया गया प्रजाजनों को यह कहने को मजबूर किया कि ईश्वर और हिन्दू धर्म झूठा है, धर्मान्तरण-- बलात इस्लाम स्वीकार करो अथवा मृत्यु, हज़ारों को मुसलमान बनाया गया मुहम्मद बख्तियार का आतंक इतना बढ़ गया था कि अधिकांश हिन्दू उसका नाम सुनकर बलिदानी बकरों के सामान मजबूरन बिना लड़े ही अपना सिर उसकी तलवार के आगे झुका देते थे भय और अनास्था से ग्रस्त भारतवासी कायर हो चूका था, लुटेरा बख्तियार इस जोर दबदबे के साथ आगे बढ़ा, उसकी शनि दृष्टि बंगाल पर पड़ी, महमूद गजनवी, मुहम्मद गोरी और कुतुबुद्दीन ऐबक जैसे प्रबल आक्रमणकारियों ने कम से कम उत्तर भारत को रौद डाला बहुत से छोटे -छोटे राजवंश उखड गए उनकी शक्तियों का प्रभाव नष्ट हो चूका था ऐसे समय ईश्वर ने उन्हें यहाँ भेजा. 
             हारे हुए हिन्दू समाज कि मनस्थित बेहद कमजोर हो चुकी थी वे न तो अपने दीन के ही मालिक रहे न ही अपने दुनिया के, हिन्दू समाज एक दम सनक चूका था अराजकता बेहद बढ़ चुकी थी विजेताओं कि तलवार उन्हें धमकाकर कि ख़बरदार अपने धर्म और ईश्वर को कभी सच्चा नहीं कहना ईश्वर एक है और वह वही है जो इस्लाम ने देखा है, उस अल्लाह ने मुहम्मद साहब को धरती पर भेज कर तमाम पुराने पैगम्बरों के महत्व को नष्टकर दिया अब केवल एक ही ईश्वर और पैगम्बर बाकी सब झूठा. ऐसे समय में गौरांग खड़े हुए सामान्य हिन्दू समाज को हरिबोल कीर्तन के माध्यम से साहसी बनाने का काम किया और मुसलमान बने हए इस्लाम मतावलम्बियों को पुनः हिन्दू धर्म में वापस करने का नया मंत्र दिया वे स्वामी रामानंद के उस कार्य को नहीं भूले जिसमे उन्होंने ३४ हज़ार बने मुसलमानों को पुनः हिन्दू धर्म में सामिल किया था, नदिया न्याय शास्त्र का विद्या का केंद्र था यहाँ कश्मीर, काशी, उज्जैन, कांची और मिथिला तक से तमाम पंडित विद्वान शास्त्रार्थ हेतु नदिया आते गौरांग की ख्याति भारतवर्ष में ब्याप्त हो चुकी थी उन्होंने बौद्ध तथा अन्य मतावलम्बियों से शास्त्रार्थ कर हिन्दू धर्म की प्रमाणिकता को पुनः सिद्धकर होते हुए धर्मान्तरण को रोक ही नहीं दिया बल्कि पुनः हिन्दू धर्म में वापसी शुरू की, स्कान जो प्रभुपाद ने शुरू किया एक प्रकार से वह चैतन्य के ही भक्ति कीर्तन मार्ग का अनुशरण है जैसे प्रभुपाद ने उस समय बिधर्मी हुए हिंदुओं कि घार वापसी कि उसी प्रकार स्कान के माध्यम से आज लाखों गोरे हिन्दू सनातन धर्म का अनुसरण कर रहे हैं विश्व के प्रत्येक एयरपोर्ट पर भगवत गीता का प्रचार करते गोरे लोग मिल जायेगे यह प्रभुपाद की ही कृपा है.
      महाप्रभु का जन्मदिन होली पूर्णिमा १६ मार्च है आइये हम समरस हिन्दू समाज बना बिछड़े हुए बंधुओं को पुनः हिन्दू धर्म में वापस लाकर हिन्दू राष्ट्र और हिन्दू धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा करें यही गौरांग के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.   
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