धर्म सम्राट करपात्री जी महराज की जयंती 11अगस्त पर --!

 

भारतीय संस्कृति पर अनेक विदेशी आक्रमण होने के बावजूद भी आज सनातन धर्म केवल जीवित ही नहीं है बल्कि सारे विश्व में अपनी पताका फहराता जा रहा है। ये भारत भूमि रत्नगर्भा है--

                 "यदा  यदाहि    धर्मस्य    ग्लानिर्भवत   भारत: 

                  अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदातमानम सृजामहम।"

जब धर्म की हानि होती है मै आता हूँ, तो वे आये भी कभी आदि शंकर तो कभी स्वामी रामानुज कभी ऋषि दयानन्द कभी विवेकानंद के रूप में लेकिन वो आये करपात्री जी के भी रूप में। जिन्होंने केवल धर्म का उपदेश ही नहीं दिया बल्कि अपने जीवन को ही धर्म का प्रत्यक्ष प्रणाम बना दिया। वे 20वीं शताब्दी में ऐसे ही विलक्षण युगपुरुष थे धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महराज। वे केवल धर्म शास्त्रों के व्याख्याता ही नहीं थे, वे उन सन्यासियों में से थे जिन्होंने वेदांत की गंभीरता शंकराचार्य की तर्क परंपरा, तुलसीदास की लोकदृष्टि और राष्ट्रधर्म की चेतना को अपने जीवन में एकाकार कर लिया था।

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के भटनी ग्राम में हरिनारायण का मन बाल्यकाल से ही वैराग्य की ओर प्रवृत था। 19 वर्ष की अवस्था में हिमालय में तप वैराग्य, वेदांत और आत्मसाधना का मार्ग अपनाया, समाज में लौटे तो उनका जीवन स्वयं एक सन्देश बन चुका था। वे भिक्षा के लिए किसी पात्र का उपयोग नहीं करते थैं, दोनों हथेलियाँ ही उनका पात्र थीं, इसी अपरिग्रह ने उन्हें करपात्री बना दिया। वस्तुत : उनका करपात्र केवल भिक्षा का साधन नहीं था वह त्याग, सैयम और जीवन दृष्टि का प्रतीक था। "इशावास्योपनिषद" का वाक्य 'तेन त्यकत्येन भुंजिथा' उनके सम्पूर्ण जीवन में साकार हो उठा।

धर्मसम्राट करपात्री जी महराज

स्वामी करपात्री जी के लिए धर्म केवल पूजा पद्धति व कर्मकांड ही नहीं था, वे कहा करते थे "अपौरुशेय वेद एवं तदनुसारी शास्त्रों के अनुसार विधिविहित कार्य को ही धर्म कहा जाता है।"  उनके लिए धर्म वही व्यवस्था थी जो ब्यक्ति समाज और सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करे, इसी कारण उन्होंने तप को लोकमंगल से और समाज को शास्त्र से जोड़ा। बृन्दावन में उन्होंने रामचरित मानस की चौपाई "जगु पेखन तुम्ह देख निहारे" पर लगातार  13 दिनों तक प्रतिदिन तीन -तीन घंटे प्रवचन दिया। यह उनकी विलक्षण स्मृति, ज्ञान-परंपरा की उस गहराई का प्रणाम है, जहाँ एक ही चौपाई दर्शन, अध्यात्म और जीवन- दृष्टि का विराट संसार समेटे होता है। 

उन्होंने सामाजिक उत्तरदायित्व से पृथक धर्म को नहीं माना, गोरक्षा आंदोलन हो, सनातन धर्म अथवा सांस्कृतिक अस्मिता का प्रश्न हो, वे सदैव अग्रिम पंक्ति में दिखे। 7 नवम्बर 1966के गोरक्षा आंदोलन में लाठियाँ खाई और जेल स्वीकार किया, किन्तु सिद्धांतो से विलग नहीं हुए। उनका उद्घोष "धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो" आज भी लोक मंगल का उद्घोष बन गया है। रामायण मीमांसा, वेदार्थ पारिजात, विचार पीयूष और रामराज्य और कालमार्क्स जैसे ग्रंथों में उन्होंने परंपरा और समाज का समन्वय प्रस्तुत किया है।

अंतिम यात्रा 

कानपुर में भगवत कथा के मध्य अस्वस्थ होने के कारण वो काशी पहुँचे, इक्कीस दिनों की समाधि के पश्चात् भागवत कथा सुनने की इक्षा प्रकट किया, उन्होंने अंतिम समय मानस का दशरथ मरण प्रसंग सुनाने की आज्ञा दी श्रीसूक्त भगवनाम और ईश्वर स्मरण में स्थित रहकर उन्होंने शिव शिव का उच्चारण किया और ब्राम्हलीन हो गए।

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