श्रावणी पर्व और उसका महत्व


सावन माह व्रत तिथि, पूजन विधि और धार्मिक लाभ 


सावन माह भगवान शिव को समर्पित होता है, जिसमें भक्त विशेष रूप से सोमवार को व्रत और पूजन करते हैं। यह माह आध्यात्मिक उत्थान, मनोकामना पूर्ति और शिव कृपा प्राप्ति का शुभ समय माना जाता है।

सावन का महीना पूरी तरह भगवान शिव को समर्पित होता है, जिसे शिवभक्त पूरे श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाते हैं। इस दौरान भक्त रोज़ाना भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हैं, लेकिन सावन के सोमवार का विशेष महत्व होता है। इस दिन शिव भक्त उपवास रखते हैं और शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र आदि अर्पित कर जलाभिषेक करते हैं। माना जाता है कि सावन सोमवार का व्रत करने से भगवान शिव जल्दी प्रसन्न होते हैं और भक्त की हर इच्छा पूरी करते हैं।

सनातन परंपरा के अनुसार, देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीर सागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और इस अवधि में सृष्टि का संचालन भगवान शिव संभालते हैं। यह समय ‘चातुर्मास’ कहलाता है, जो पूरी तर धर्म, तप, व्रत और संयम का प्रतीक है।

ऐसे में सावन का महीना आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद खास माना जाता है। भगवान शिव की आराधना से जीवन की समस्याएं दूर होती हैं और सुख-शांति की प्राप्ति होती है। 

कब से शुरू हो रहा है सावन का महीना सावन मास में महायोग 

वर्ष 2026 में सावन का महीना कल 30 जुलाई 2026 (गुरुवार) से प्रारम्भ हो रहा है और इसका समापन 28 अगस्त 2026 (शुक्रवार) को होगा। इस पवित्र मास में भगवान शिव की आराधना के लिए कुल चार सोमवार आएंगे

 सावन के पहले दिन श्रवण नक्षत्र का संयोग, आयुष्मान योग, शश महापुरुष राजयोग, हंस राजयोग और गुरु-आदित्य राजयोग बन रहे है. जिसमें महादेव की पूजा करना बहुत ही विशेष माना जा रहा है।

सावन के पहले दिन जलाभिषेक का मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 4 बजकर 36 मिनट से लेकर सुबह 5 बजकर 24 मिनट तक

अभिजीत मुहूर्त- दोपहर 12 बजकर 20 मिनट से लेकर 1 बजकर 12 मिनट तक 

शिव पूजा मुहूर्त - सुबह 10 बजकर 46 मिनट से लेकर दोपहर 3 बजकर 50 मिनट तक

प्रदोष काल मुहूर्त - शाम 5 बजकर 32 मिनट से लेकर रात 8 बजकर 30 मिनट तक

विजय मुहूर्त- शाम 04 बजकर 28 मिनट से लेकर शाम 05 बजकर 29 मिनट तक रहेगा


सावन के सोमवार व्रत की तिथियां

 30 जुलाई 2026, गुरुवार सावन का प्रथम दिवस

प्रथम सोमवार व्रत: 3 अगस्त 

द्वितीय सावन सोमवार व्रत: 10 अगस्त

तृतीय सावन सोमवार व्रत: 17 अगस्त 

चतुर्थ सावन सोमवार व्रत: 24 अगस्त 

इसके बाद 28 अगस्त को सावन पूर्णिमा के साथ यह पावन महीना समाप्त होगा। इसी दिन रक्षाबंधन का त्योहार भी मनाया जाएगा। 

पूजा विधि

 सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इस दौरान यदि सही विधि से पूजा की जाए, तो भोलेनाथ शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। 

सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर और पूजा स्थल को साफ करें। फिर पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें।

शिवलिंग को गंगाजल और कच्चे दूध से स्नान कराएं। इसके बाद शुद्ध जल से धोकर साफ करें।

शिवलिंग पर बेलपत्र , धतूरा, सफेद पुष्प, भस्म, मिठाई और गाय का दूध अर्पित करें।

पूजन के दौरान ॐ नमः शिवाय मंत्र का 108 बार जप करें। चाहें तो शिव जी के 108 नामों का पाठ भी कर सकते हैं।

शिव चालीसा का पाठ करें और उसके बाद शिव आरती करें। अंत में हाथ जोड़कर भगवान शिव से अपने जीवन में सुख, समृद्धि और शांति की कामना करें।

सावन में इस तरह श्रद्धा से पूजा करने पर भगवान शिव अपने भक्तों को आशीर्वाद देकर जीवन को खुशहाल बना देते हैं।

सावन माह का धार्मिक लाभ

सावन माह हिन्दू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है और यह विशेष रूप से भगवान शिव की उपासना का समय होता है। इस माह में शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र आदि चढ़ाने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और पापों का नाश होता है। सावन सोमवार का व्रत रखने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और दांपत्य जीवन सुखमय बनता है। इस समय ध्यान, जप, व्रत और दान करने से आत्मिक शुद्धि होती है और पूर्व जन्मों के पाप भी नष्ट होते हैं। यह माह श्रद्धा व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उत्थान के लिए अत्यंत लाभकारी होता है।

श्रद्धा से पुकारो, महादेव स्वयं संकट हर लेते हैं 

श्रद्धा का पवित्र मास सावन शुरू हो गया है, यह मास आते ही मन प्रसंचित और श्रद्धा से भर जाता है। धरती हरियाली चादर ओढ़ लेती है, तब माँ पार्वती के साथ भोलेभंडारी इस धरा पर विचरण करते हैं। इसलिए इस माह में उनका पूजन, अर्चन और स्मरण विशेष फलदाई होता है। प्रत्येक पग स्वाभाविक शिव की ओर वढ़ जाते हैं, भगवान भोलेनाथ के जयकारों से धरा - अम्बर गुंजायमान हो जाता है। भक्ति की अविरल धारा चहुओर व्याप्त हो जाती है, भक्त इस मास का इंतजार बड़ी अतुरता और अधीरता से करते हैं। भोले बाबा, औघड़दानी उन्हें भोग, चढ़ावा या किसी विशेष अनुष्ठान की आवस्यकता नहीं रहती, भक्त संकट में हो, उन्हें पुकार रहा हो तो वह स्वयं दौड़े चले आते हैं। भक्ति को वह शक्ति देते हैं, भगवान भोलेशंकर में सुचिता और सादगी का समन्वय हैं। देवसूर संग्राम में समुद्र मंथन से निकले विष को जब कोई ग्रहण नहीं कर सका और उसके चलते पूरा ब्रम्हांड खतरे में पड़ गया था, तब शंकर जी ने उस हलाहल को पिया। विष की तिब्रता से उनका कंठ नीला पड़ गया तब देवों ने कई मास वर्षा की, और उन्हें नीलकंठ भी कहा जाने लगा। यही आज सावन ऋतु के रूप में जाना जाता है विद्यमान है। तबसे भोलेभंडारी का एक नाम नीलकंठ भी हो गया, देवाधिदेव महादेव हमेशा कंदराओं में प्रकृति के साथ रहते हैं। सरलता, सौम्यता और सृष्टि के प्रति लगाव महादेव में रहता है, यह शिव का स्वाभाव है, वैराग्य और औघड़दानी। जैसे वे हैं वैसे मनुष्य को भी उदार होना चाहिए, ऐसे भोलेभंडारी की महिमा का गुण गान जितना किया जाय वह कम ही है, उनकी स्तुति प्रतिक्षण, हर स्थान पर करना चाहिए।

                         "हर हर महादेव "

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