भारतीय राष्ट्र
भारतीय राष्ट्र हज़ारों, लाखों वर्ष का ही नहीं तो बल्कि हम यह कहते हैं कि हमारा जो सनातन राष्ट्र है यानी हिंदू राष्ट्र है ये करोड़ों वर्ष पुराना है तो यह अतिसयोक्ति नहीं होगा। ऋग्वेद अनुसार वेद जब ईश्वर ने हमें दिया उस समय की काल गणना अनुसार "एक अरब छानबे करोड़ आठ लाख वर्ष" से अधिक है। जो अपौरुशेय है ईश्वर की वाणी है इसीलिए वैदिक ऋषि स्वामी दयानन्द सरस्वती कहते हैं वेद अपौरुशेय है वेद स्वतः प्रमाण है जिसे हम श्रुति भी कहते हैं क्योंकि पहले और आज के भी कुछ गुरुकुलों में वेद याद कराया जाता है जिसे माना जाता है कि सुनकर याद किया यानी "श्रुति "।
धीरे -धीरे विकसित जो वेदों में प्रकृति पूजा का वर्णन है उसे एक अलग स्वरुप मिल गया। जब समाज जंगलों में रहता था, उस समय उसका जीवन "वनीय जीवन" था लेकिन वह आज का जो वनवासी समाज है वह नहीं था वर्तमान में जो वनवासी है वह सामान्य नहीं है वह तो स्वामी रामानंद के शब्दों में "धर्म योद्धा" है। तो वह वनवासी वह वनीय जीवन अथवा समाज कैसा था उसका संक्षेप में मैं आगे वर्णन करता हूँ।
प्रकृति पूजा क्यों-?
ये कोई पूजा नहीं एक प्रकार से ये जिस प्रकृति के कारण हमारी जीवन की कल्पना की जा सकती है उसका कृतज्ञता अर्पित करना है जैसे अपने हिंदू समाज में सर्वाधिक पीपल के पेड़ की मान्यता है सर्वाधिक पूजा पीपल के पेड़ की की जाती हैं, यहाँ तक कि कोई भी हिन्दू उसके बाये से नहीं जायेगा बल्कि दाहिने से ही जायेगा। पीपल की सर्वाधिक पूजा की जाती है क्योंकि यह बृक्ष हमे चौबीस घंटे आक्सीजन देता है इसके पत्ते से लेकर छिलका, जड़ सभी औषधि है। वास्तव में एक प्रकार से ये प्रकृति के प्रति हिंदू समाज कृतज्ञता का भाव अर्पित करना है। ऐसे ही अन्य पेड़-पौधे सभी का उपयोग है किसी का कम किसी का अधिक इसीलिए जब कोई वैद्य किसी औषधि पौधे को लेता है तो उसकी पूजा करता है। इसीलिए सनातन धर्म में प्रकृति पूजा का सर्वाधिक महत्व है।
प्रकृति पूजा के मुख्य रूप
प्रकृति पूजा का अर्थ है पेड़ -पौधों, नदी, पर्वतों और सूर्य जैसे प्राकृतिक तत्वों को ईश्वर का स्वरुप मानकर उनका आदर करना। भारतीय संस्कृति में प्रकृति के पंच महाभूत पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश को जीवन का आधार और पूजनीय माना गया है।
बृक्ष पूजा: पीपल, वट (वरगद) और आवला जैसे आक्सीजन देने वाले पेड़ो को पबित्र मानकर उनकी पूजा की जाती है।
जल और नदी पूजा: गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा जैसी नदियों को माँ मानकर उनका सम्मान किया जाता है। जब कोई ब्यक्ति किसी नदी को पार करता रहता है तो उसे गंगाजी का स्वरूप मानकर प्रणाम करता है इतना ही नहीं बल्कि जेब से कोई न कोई सिक्का निकलकर बड़ी श्रद्धा से नदी में डालेगा और प्रणाम करेगा।
पर्वत, पशु पूजा : गोवर्धन जैसे पर्वतों की पूजा कंकड़ -कंकड़ में शंकर जी का दर्शन और गाय, सांप जैसे जीवो की आराधना की जीवंत परंपरा है। यहाँ तक कि "पितर पक्ष" मास में खीर बनाकर घर के ऊपर रखा जाता है कि "कौवा उसे खायेगा और उसका गर्भ सुरक्षित रहेगा।"
"यह पर्यावरण और वनों की रक्षा करने की यह प्राचीन और वैज्ञानिक तरीका है।"
"इससे मनुष्य और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहता है। इसी क्रम में छठ और आवला नउमी पूजा होती है।"
"प्राचीन ऋषियों ने प्रकृति के अंगों को धार्मिक अनुष्ठानों से जोड़कर उनके संरक्षण का सन्देश दिया ताकि लोग स्वार्थवस उनका विनाश न करें। और कृतज्ञता व्यक्त करना यह जीवनदायिनी प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का एक माध्यम है।"
जो हमें जीवन देते हैं हम उन्हीं की पूजा कर रहे हैं!
वर्तमान मध्यप्रदेश में भोपाल, सिरोही, विदिशा, बैतूल, सारणी, हौसँगावाद, जबलपुर, इदौर, ग्वालियर, शिवपुरी करेंला, दतिया, सिंगरौली, रीवा, सतना, अनूपनगर इत्यादि सभी जिलों में उरांव जनजाति समुदाय निवास करते हैं। उरांव आदिवासी अपने इष्टदेव धर्मेश को मानते हैं। पूर्वजों का मानना है कि हमारी उत्पत्ति का कारण चंदो बीड़ी, बिनको (चांद, सूर्य और तारा ) अर्थात धर्मेश महादेव, धरती, पेड़-पौधे, जीव -जंतु, नदी, अकास, पाताल स्वरुप पार्वती आयो (माँ ) जिसे सरना आयो, चाला आयो से पुकारते हैं। यही हमारी सृजनहार है, ऐसा मानना है। इसीलिए उरांव आदिवासी जितने भी प्रकृति में पेड़-पौधे हैं जितने फल और कंदमूल साग, भाजी जड़ी -बूटी मिलते हैं नदी नाले जिनसे जीवन के लिए पानी मिलता है जंगल सरना (पेड़ों का झुण्ड ) जिससे लकड़ी शुद्ध हवा, कृषि कार्य के लिए लकड़ी का औजार बनाने के लिए, पेड़ पौधों से अच्छा मानसून इत्यादि मिलता है इन्हीं को ईश्वर अर्थात देव मानकर पूजते हैं। क्योंकि हम सभी प्रकृति में जितने भी चीज पाये जाते हैं जो हमें जीवन देते हैं उन्हीं की पूजा करते हैं। हमारे पूर्बज लोग शिवलिंग की उत्पत्ति का कारण मानकर पूजा करते थे।
"आदिवासी प्रकृति पूजक होते हैं कुंवार पूर्णिमा, कर्मा पर्व त्यौहार पर विशेष झलक दिखाई देती है ।"
"मध्यप्रदेश में उरांव आदिवासी की पहचान और उनकी संस्कृति "सरना स्थान" पर अटूट श्रद्धा रखते हैं जहाँ पर वे प्रकृति पूजा करते हैं।"

0 टिप्पणियाँ