ऋषि वशिष्ठ और सप्तर्षि --?

 

सप्त ऋषियों में से एक 

ऐसा मान्यता है कि ऋषि वशिष्ठ ब्रम्हा जी के मानस पुत्र थे, सृष्टि सम्बत के अनुसार एक अरब छानबे करोड़ आठ लाख छप्पन हजार वर्ष पहले ये मानस पुत्र हुए होंगे। फिर क्या मनुष्य बिना योनि के पैदा हो सकता है? तो हॉ क्योंकि आज उत्तरी ध्रुब में हिम मानव पाये जाते है जो बिना योनि के पैदा हुए है ऐसी मान्यता है। एक और बात ये जो सप्त ऋषि हैं इनकी पीठ अथवा कोई परंपरा रही होगी जैसे आज अनेक मठमंदिर हैं जो किसी न किसी आचार्य, महंत जगद्गुरु के नाम पर हैं अनेक विश्व विद्यालय हैं जिनकी अनेक शाखाएं हैं, उसी प्रकार इन ऋषियों की भी शाखाएं व पीठ रही होगी जो इन ऋषियों के नाम से जाना जाता है। इन सप्त ऋषियों को एक साथ वेदों का ज्ञान भगवान ब्रम्हा जी ने दिया, यही प्रमुख ऋषि रहे जो मंत्रदृष्टा हुए। यह कहना कि इन ऋषियों ने वेदों की रचना की यह कहना गलत होगा क्योंकि वेद तो अपौरूशेया है वह तो ईश्वर का दिया हुआ ज्ञान है ये ऋषि केवल मंत्रदृष्टा थे। महर्षि वशिष्ठ ने एक रचना की जिसका नाम "योग वशिष्ठ" है जो आज भी उपलब्ध है। आकाश में चमकते सात तारों में एक वशिष्ठ ऋषि माने जाते हैं। 

सप्तर्षि (सप्त +ऋषि ) सात ऋषियों को कहते हैं जिनके उल्लेख वेद सहित अन्य सभी महत्वपूर्ण ग्रंथों में पाया जाता है। वेदों के मंत्रदृष्टा अध्यन शील जिन सात ऋषियों का नाम है जो ऋषि कुल परंपरा से हैं वे इस प्रकार है।

         1.वशिष्ठ 2.विश्वामित्र 3. कंड़व 4. भारद्वाज 5. अत्रि 6. बामदेव 7. शौनक

 पुराणों में सप्त ऋषियों के अनेक नाम मिलते है, विष्णु पुराण के अनुसार सातवे मनवंतर में सप्त ऋषि इस प्रकार हैं - वशिष्ठ, विश्वामित्र, जमदग्नी, अत्रि, कश्यप, गौतम, भारद्वाज। इसके अलावा भी कुछ पुराणों में सप्तऋषियों के अन्य नाम हैं - क्रतु, पुलह, पुलस्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ और मारिची।

महाभारत ऋषियों की दो प्रकार की नामावली मिलती है एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम पाये जाते हैं दूसरा नामावली के अनुसार सप्तर्षि कश्यप, वशिष्ठ, मारिची, अंगिरस, पुलस्त, पुलह और क्रतु हैं। लेकिन कुछ ग्रंथों में कश्यप और मारिची को एक ही माना गया है।

सप्तऋषियों का परिचय -- हिंदू धर्म ग्रंथों के विभिन्न युगों में सप्तऋषियों के नाम बदलते रहते हैं लेकिन वर्तमान मनवंतर (वैवस्वत मनवंतर ) में सप्तऋषि इस प्रकार हैं।

सप्तऋषि कौन हैं और हिंदू धर्म में इनका महत्व 

हिंदू धर्म में सप्त ऋषियों का विशेष महत्व है इन्हे ब्रम्हांड के महान सप्त ऋषि कहा जाता है।जो सृष्टि की रचना वेदों के ज्ञान के संवाहक और धर्म के मार्गदर्शक माने जाते हैं। सप्त ऋषि ब्रम्हा द्वारा उत्पन्न मनुष्यों में से प्रथम थे जिन्होंने वैदिक ज्ञान आध्यात्मिकता और धार्मिक परंपरा को स्थापित किया। वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रंथों व अन्य ग्रंथों में इनका उल्लेख मिलता है और इन्हे हिंदू धर्म की नीव रखने वाले, (यानी मानव जीवन किस प्रकार जिया जाय मानव जीवन की कल्पना कर समाज में साकार किया इस कारण) ऋषियों के नाते पूजा जाता है इस लेख में हम सप्तऋषियों की पहचान, उनकी भूमिकाओं और उनके द्वारा धर्म को आकर देने के योगदान पर विस्तृत चर्चा करेंगे।

वैदिक ज्ञान का प्रसार -- सप्त ऋषियों ने वेदों के ज्ञान को गुरुकुलों के माध्यम से प्रसारित किया, उन्होंने मंत्रो ऋचाओं के माध्यम से धार्मिक परंपराओ को स्थापित किया और अपने शिष्यों को आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया। योग और ध्यान की शिक्षा -- ऋषियों ने ध्यान प्राणायाम और योग की विधियों को विकसित किया, जिसका उपयोग आज तक आध्यात्मिक और मानसिक शांति प्राप्त करने के लिए किया जाता है। वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ऋषियों ने योग के महत्व को दर्शाया। समाज में नैतिकता और धर्म की स्थापना -- सप्तऋषियों ने समाज को सत्य, धर्म, न्याय और करुणा के सिद्धांतो पर चलने का मार्ग प्रसस्त किया। ऋषियों ने धर्म शास्त्र, ब्राह्मण ग्रंथों और रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्यों के माध्यम से नैतिक मूल्यों का प्रसार किया। राजाओं और समाज का मार्गदर्शन -- ऋषियों ने केवल तपस्या ही नहीं की बल्कि राजाओं और समाज को धर्म, न्याय और राजनीती की शिक्षा दी, उदाहरनार्थ वशिष्ठ ऋषि ने अयोध्या के राजकुमारों को शिक्षित किया और विश्वामित्र ने भगवान श्री राम को दिव्य अस्त्र- शस्त्रों का ज्ञान प्रदान किया।

भारतीय ज्योतिष में सप्तऋषियों को आकाश में सप्तऋषि मण्डल से जोड़ा गया है माना जाता है कि ये ये ऋषि ब्रम्हांड की गतिविधियों पर दृष्टि रखते हैं और पृथ्वी के जीवो पर अपने प्रभाव डालते हैं। आज भी सप्तऋषियों की शिक्षाएं वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रंथों और अन्य धार्मिक ग्रंथों में संरक्षित है। योग, ध्यान, भक्ति कर्म और ज्ञान की जो परंपरा हम देखते हैं वह इन्हीं महर्षियों द्वारा स्थापित की गई हैं। सप्त ऋषि न केवल हिंदू धर्म के संरक्षक हैं बल्कि वेद, योग, ध्यान, और समाज के नैतिक उत्थान के प्रेरक भी हैं। इन ऋषियों ने धर्म को एक ठोस आधार प्रदान किया, जो आज भी हिंदू संस्कृति और जीवन शैली का एक अभिन्न अंग है और उनकी शिक्षाएं हमें जीवन में सत्य, धर्म और ज्ञान के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। सप्तर्षि हिन्दू धर्म के महान ऋषि, महर्षि का इतिहास वेदों के दृष्टा हिंदू संस्कृति, सनातन धर्म, योग और ध्यान ऋषियों की कथाएँ प्राचीन भारतीय ज्ञान ऋषि वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि द्वारा स्थापित की गई हैं।

सप्त ऋषियों के नाम और परिचय 

1. अत्रि ऋषि - ज्ञान तपस्या के प्रतीक अत्रि ऋषि को ब्रम्हा, विष्णु और महेश के संयुक्त ऊर्जा से उत्पन्न माना जाता है। इनकी पत्नी अनुसूईया थीं, जिन्होंने त्रिमूर्ति के तीनों देवों को बालक रूप में परिवर्तित किया था।

2- भृगु ऋषि -- ज्योतिष और धार्मिक अनुष्ठानों के जनक जिन्होंने भृगु संहिता नामक ग्रन्थ की रचना की जो भविष्य के धर्म कर्मकांड का आधार है।

3- वशिष्ठ ऋषि -- वैदिक मंत्र दृष्टा, भगवान श्री राम के कुल गुरु जिन्होंने ध्यान, योग के महत्व को स्थापित किया वशिष्ठ आश्रम ज्ञान और तपस्या का प्रमुख केंद्र रहा।

4- विश्वामित्र -- वर्ण व्यवस्था को स्थापित करने वाले यानी क्षत्रिय कुलोत्पन्न ब्राम्हर्षि हुए, महान तपस्वी जो "गायत्री मंत्र" के दृष्टा थे।

5- गौतम ऋषि -- सत्य और धर्म के प्रतीक जिन्होंने अहिल्या उद्धार और न्याय ब्यवस्था की स्थापना की प्रथम न्याय दर्शन के रचयिता।

6- कश्यप ऋषि -- सृष्टि के विभिन्न प्राणियों के जन्म दाता, जिन्होंने देवताओं, असुरों और मनुष्यों की वंश परंपरा की नीव रखी।

7- अंगिरस ऋषि -- आध्यात्मिक ज्ञान और तपस्या के प्रतीक जिन्होंने यज्ञ परम्परा को प्रतिष्ठापित किया।

ऋषि वशिष्ठ वैदिक ऋषि हैं वे अपने कुल गोत्र के प्रति सतर्क हैं इसीलिए वे विधार्थियो को अपने स्वधर्म में लाने में हिकचते हैं, इसी विषय को लेकर ऋषि वशिष्ठ और ऋषि विश्वामित्र में मतभेद दिखाई देता है। जहाँ विश्वामित्र "कृणवंतो  विश्वमार्यम " को दर्शाते हुए जो संभर राज के लोग अनार्य थे उन्हें आर्य बनने का कार्य किया। एतरेया ब्राह्मण में एक प्रसंग आता है कि राजा हरिश्चन्द्र को जलोधर रोग हो गया है और "नर बलि " चाहिए वशिष्ठ इसका विरोध करते है वही विश्वमित्र अपने साथ ऋषि जमदगनी को लेकर यज्ञ संपन्न कराते हैं और जिसकी बलि होनी थीं वह "सुनःशेप" मंत्र दृष्टा होकर बंधन मुक्त हो जाता है। कुछ पुराणों में वर्णन आता है कि महर्षि वशिष्ठ के सौ पुत्र थे जिनकी हत्या ऋषि विश्वामित्र ने की और वशिष्ठ उन्हें क्षमा कर ब्राम्हर्षि कह कर पुकारते है स्वागत करते हैं। ये वास्तव में पौराणिक कथा है ये सत्य नहीं हो सकता क्योंकि किसी के सौ पुत्र हो ही नहीं सकते हॉ यह सत्य है की उस समय उनके गुरुकुल में सौ विद्यार्थी रहे होंगे जिन्हें वे अपना पुत्र मानते रहे होगे क्योंकि अपना विद्यार्थी भी पुत्र समान ही होता है। जहाँ तक विश्वामित्र ने उन सौ पुत्रों की हत्या की यह तो बिलकुल असत्य पर आधारित है, जो वेदों का मंत्रदृष्टा हो जो ऋषि अगस्त का शिष्य हो जो अनार्यो को आर्य बनाने का कार्य करता हो वह ऐसा कर ही नहीं सकता ये पुराण कारों ने मनगढंत कथा बनाई है इन सबके पीछे बौद्ध मानसिकता हो सकती है वास्तव में बौद्ध ही वामपंथियों के जनक हैं।

 कुछ ऋषियों का वर्णन 

ऋषि वशिष्ठ -- राजा दशरथ के कुल गुरु पहले राजा सुदास के भी कुल गुरु थे, राजा दसरथ के चारो पुत्रों के शिक्षक हैं वशिष्ठ के ही कहने पर राजा दशरथ ने अपने दोनों पुत्र राम -लक्ष्मण को ऋषि विश्वामित्र के साथ असुरों के वध करने हेतु भेज दिया। ऋषि वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरुण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।

ऋषि विश्वामित्र  -- विश्वामित्र राजा गाधि के पुत्र थे वे राज्य के उत्तराधिकारी थे लेकिन बचपन से ही आध्यात्मिक रुझान होने के कारण तथा ऋषि अगस्त के प्रभाव के नाते वे ऋषि फिर ब्राम्हर्षि हुए। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा बहुत प्रचलित है। कहते है राजा त्रिशंकु को अपने तपस्या के बल सशरीर स्वर्ग भेज दिया था उन्होंने अलग विश्व का निर्माण किया ऐसी मान्यता है और जब स्वर्ग से राजा त्रिशंकु गिरे चिल्लाये ऋषि विश्वामित्र ने दूब के धनुष वाण से आकाश में रोक दिया, राजा के मुख से जो राल गिरा उसे "राल नदी' बन गयी। माना जाता है कि हरिद्वार में उन्होंने घनघोर तपस्या की और अलग स्वर्ग का निर्माण किया। वे गायत्री मंत्र दृष्टा थे जिसे आज सनातन धर्म में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

कँडव ऋषि -- माना जाता है की इस ऋषि ने सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को व्यवस्थित किया। वे वैदिक कालीन ऋषि और मंत्रदृष्टा थे इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का लालन-पालन हुआ था।

भारद्वाज ऋषि - वैदिक ऋषियों में ऋषि भारद्वाज का स्थान विशेष है भारद्वाज ऋषि के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि त्रेता के तीसरे चरण में हुए थे लेकिन एक उल्लेख के अनुसार उनकी आयु बहुत लम्बी थीं, वनबास के समय भगवान श्री राम इनके आश्रम प्रयागराज गये थे। जैसा की मै पहले ही वर्णन कर चूका हूँ कि ये ऋषि परंपरा गद्दी रही होगी क्योंकि भारद्वाज ऋषि वैदिक कालीन हैं और भगवान श्री राम त्रेता युग के चौथे चरण में हुए थे।भारद्वाज ऋषि के पुत्रों में 10 ऋषि ऋग्वेद के मंत्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम रात्रि था वह भी रात्रि शूक्त की मंत्रदृष्टा मानी गई है। ऋग्वेद के छठे मण्डल के मंत्रदृष्टा भारद्वाज ऋषि हैं इस मण्डल में  765 ऋचाएं हैं। अथर्वेद के भी भारद्वाज ऋषि तेईस ऋचाओं के मंत्रदृष्टा हैं। भारद्वाज स्मृति -भारद्वाज संहिता के रचयिता भी भारद्वाज ऋषि ही हैं। भारद्वाज ऋषि ने "यंत्र -सर्वस्व" नामक बृहद ग्रन्थ की रचना की थी, इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रम्हामुनी ने "विमान शास्त्र" के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचार करने वाले विमानो के लिए विविध धातुओ के निर्माण का भी वर्णन मिलता है।

ऋषि अत्रि -- ऋग्वेद के पंचम मण्डल के मंत्रदृष्टा महर्षि अत्रि ब्रम्हा जी के मानस पुत्रों में से एक थे, इनके पुत्र दुर्बसा ऋषि, चंद्र और दत्तत्रेय थे। इनकी पत्नी सती अनुसूईया थी अत्रि ऋषि कहीं जब बाहर गये थे उस समय त्रिदेव अनुसूईया के आश्रम में आये थे ब्राह्मण वेश में भिक्षाटन के लिए अनुसूईया ने अपने तपोबल से इन त्रिदेवो को बालक बना भिक्षा दिया  था। माता अनुसूईया ने भगवती सीता जी को पतीव्रत का उपदेश दिया था। अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में राजा पृथ और ऋषभ की तरह योगदान किया था अत्रि लोग सिंधु पार करके पारस गये थे जहाँ उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। अत्रियों के कारण ही अग्निपुजको का धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि पर अश्वनीकुमारों की भी कृपा थी।

वामदेव ऋषि -- बामदेव ऋषि वैदिक कालीन ऋषि हैं, इस समाज व देश को शामगान यानी संगीत यानी सामवेद के आध्येता थे इसको समाज में प्रचलित किया। ऋषि वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मण्डल के मंत्रदृष्टा थे ये गौतम ऋषि के पुत्र, तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं।

ऋषि शौनक -- ऋषि शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल के कुलपति बनकर विलक्षण सम्मान प्राप्त किया था, किसी भी ऋषि ने इतना बडा गुरुकुल चलाया ऐसा दिखाई नहीं देता। ऋषि शौनक वैदिक ऋषि शुनक के पुत्र थे, ये जो सप्त ऋषि माने जाते हैं उन्होंने देश व समाज को इतना कुछ दिया है कि कृतज्ञ देश इन्हे आकाश के तारा मण्डल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्वा दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलो पर टिक जाती है। इसके अलावा मान्यता है कि अगस्त, कश्यप, अष्टावक्र, याज्ञवळक्य, कात्यायन, एतरेय, कपिल, जेमिनी, गौतम आदि ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हे भी यही स्थान प्राप्त है। इस प्रकार हमने संक्षेप में इन सप्त ऋषियों के बारे में बताने का प्रयास किया है।

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