हिंदुत्व के भूषण --महाकवि भूषण

 


महाकवि भूषण 

अपने देश में जैसे देश, धर्म की रक्षा हेतु संत तुलसीदास, सूरदास और संत कबीरदास को याद करते हैं ठीक उसी प्रकार जब भी भारतीय हिंदुत्व के इतिहास में जब भी वीर रस कविताओं का बात होगी तो महाकवि भूषण और श्यामनारायण पांडेय के विना अधूरी रहेगी। जिस प्रकार चंद्रवरदायी ने पृथ्वीराज रासो लिखा और मेवाड़ के इतिहास राणारासो के रूप में पाया जाता है निश्चित तौर पर उसी प्रकार श्याम नारायण पांडेय की रचना हल्दीघाटी को याद किया जाता है। लेकिन महाकवि भूषण क्षत्रपति शिवाजी महाराज दरबारी कवि थे उन्होंने जिस प्रकार शिवजी महराज और वीर छात्राशाल का अपनी कबिताओ के माध्यम से उत्साह वर्धन किया वह अद्भुत है। महाकवि भूषण ने जहाँ शिवाजी महराज की वीरता का वर्णन "शिवा बावनी" में किया ठीक उसी प्रकार "छत्रसाल दशक" लिखकर बुंदेला वीर छत्रसाल की वीरता का वर्णन किया है। आज हम उनकी वीर रस कविताओं के माध्यम से शिवाजी महराज और वीर छत्रसाल को सारे जगत में बता सकते हैं।

महाकवि भूषण मूलतः उत्तर प्रदेश के लेकिन आश्रय शिवाजी महराज का 

भूषण का जन्म तिलकवापुर, कानपुर उत्तर प्रदेश में 1613 ई. में हुआ था, ये मोरंग, कुमायु,श्रीनगर, जयपुर, जोधपुर, रीवा, छत्रपति शिवाजी और वीर छत्रसाल बुंदेला के आश्रय में रहे। लेकिन महाकवि के सबसे पसंदीदा राजा थे छत्रपति शिवाजी महराज और बुंदेलखंड के वीर छत्रसाल थे, एक स्थान पर वे लिखते हैं "शिवाजी को सराहूँ कि छत्रसाल को'। एक प्रकार से वे स्वतंत्रता, हिंदुत्व दोनों के प्रबल समर्थक थे यदि हम ये कहें कि वे हिंदुत्व की आवाज थे उस समय या शिवाजी महाराज की अभिव्यक्ति थे तो ये कम ही होगा। महाकवि भूषण का पूरा नाम क्या था? शायद ही कोई जानता होगा भूषण की जन्मभूमि टिकवापुर के लोग भी नहीं जानते कि उनका वास्तविक नाम घनश्याम त्रिपाठी था। एक समय ऐसा था जब इस गांव में काव्य सरिता निरझार बहती थी, घनश्याम त्रिपाठी की वचपन से ही काब्य संस्कार पिता कवि रत्नाकर त्रिपाठी से विरासत में मिली थी। रत्नाकर त्रिपाठी की सभी संताने कविकर्म में सिद्धहस्त थीं, कानपुर जिले के घाटमपुर स्थित लव -कुश की युद्धभूमि कभी टिकमपुर कभी टिकवापुर तो कभी त्रिविक्रमपुर कहलाता था। घनश्याम के भ्राता चिंतामणि त्रिपाठी एक दरबारी कवि थे लेकिन संसार में महाकवि भूषण की तेजस्वी और ओजस्वी वाणी ने राष्ट्र की चेतना और भारतीय संस्कृति को कृतार्थ और धन्य कर दिया, महाकवि भूषण ने राष्ट्र के महान जन नायक बुंदेलखंड केशरी वीर छत्रसाल और छत्रपति शिवाजी महराज को अपनी काव्यरचाना का आदर्श बनाया। बताते हैं कि घनश्याम अपनी भाभी के एक ताने से घर छोड़कर कई आश्रमो में गये आखिर में वे छत्रपति शिवाजी महराज के आश्रय में गये और अंत तक वहीँ रहे।


और खो गया स्मृति स्थल 

महाकवि भूषण के गांव में अधिकांश लोग यह जानते ही नहीं हैं कि इतने बड़े महाकवि के गांव में वे रहते हैं जब उन्हें यह पता ही नहीं है तो उन पर गर्व करना तो दूर की बात है। पूरे गांव में खोजने के पश्चात् भी शायद ही भूषण रचित कोई साहित्य मिल जाय इसका अर्थ यह समझ सकते हैं कि कितनी उपेक्षा के शिकार हुए हैं। इतना ही नहीं पहले भूषण की कबिताएं उनकी जीवनी पाठ्यक्रम में थी लेकिन जब इंद्रा गाँधी ने लम्बे समय तक शासन किया तो कांग्रेस का दुर्भाग्य यह था कि इस पार्टी के पास अपना कोई विचार नहीं होने के कारण केवल सत्ता की भूख में अटकी इस पार्टी ने सभी राष्ट्रवादियों चरित्र व पुस्तके पाठ्यक्रम से हटा दिया क्योंकि इस पार्टी की जो बौद्धिक अथवा विमर्श था वों बामपंथियो के पास था और नेहरू तो स्वयं को बामपंथी ही कहने में गर्व महसूस करते थे। साहित्यवेत्ता श्री चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित यह कहते हैं कि महाकवि भूषण छत्रपति शिवाजी महराज के जीवन और युद्ध प्रसंगो को लेकर शिवराज भूषण और शिवा बावनी रचनाएँ उस समय लिखी जब साहित्य में युद्धवीरों, धर्मवीरों और कर्मवीरों का यशोगान प्राणों के लिए संकट का विषय था। काशी नगरी प्रचारणी सभा के एक पत्रक के अनुसार महाकवि भूषण द्वारा रचित तीन पुस्तक अभी अप्रकाशित हैं, महाकवि भूषण ने छत्रपति शिवाजी महराज और बुंदेलखंड के वीर छत्रसाल को अपने काब्य का आदर्श बनाया। शिवाजी महराज और वीर छत्रसाल की प्रशंसा में लिखे उनके छंद हिंदी साहित्य जगत में कीर्ति ध्वज के रूप में आज भी फहर रहे हैं।


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