महाराजा सुहेलदेव
महाराजा सुहेलदेव ग्यारहवीं शताब्दी के श्रावस्ती के एक हिन्दू राजा थे, जिन्होंने 1034 में गजनी के सेनापति शेख सलार गाजी को हराकर मार डाला था। चितौरा झील के पास हुई ऐतिहासिक युद्ध में विदेशी आक्रमण करियो को पराजित किया रोका वे वीरता और हिंदू संस्कृति के प्रतीक के रूप में जाने जाते हैं जिसका उल्लेख "मिरात ए मसूदी" में पाया जाता है। वे ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में श्रावस्ती क्षेत्र के राजा थे जिनका प्रभाव क्षेत्र पूर्बांचल, अवध और नेपाल के तराई इलाके तक फैला था।
आक्रताओं का काल
इतिहास में महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ मंदिर लूटने की कहानी तो सब जानते हैं… लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब उसके क्रूर भतीजे ने भारत पर हमला किया… तो उसका क्या हश्र हुआ था? मिलिए 11वीं सदी के उस अजेय योद्धा — श्रावस्ती के महाराज सुहेलदेव । साल 1034- जिसे कहते हैं आक्रांताओं का काल --! गजनवी का भतीजा सैयद सालार मसूद विशाल सेना लेकर भारत को कुचलने निकला। कहा जाता है कि रास्ते भर उसने अत्याचार किए, नगरों को रौंदा और बहराइच तक पहुँच गया। लेकिन उसे नहीं पता था कि वहाँ उसका सामना एक ऐसे राजा से होने वाला है। जिसे लोग कहते हैं — आक्रांताओं का काल।
राजाओं का संघ
महाराज सुहेलदेव ने आसपास के 21 राजाओं को साथ लाकर एक महा-संघ बनाया। फिर बहराइच के मैदान में ऐसा युद्ध हुआ कि धरती कांप उठी। लोककथाओं और ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार, रणभूमि में सालार मसूद पराजित हुआ और उसकी विशाल सेना बिखर गई। कहा जाता है कि इस विजय के बाद लंबे समय तक विदेशी आक्रमणकारियों में भय फैल गया। और फिर भारत की ओर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाये। यह सिर्फ एक युद्ध नहीं था, यह था भारत की रक्षा, स्वाभिमान और एकता का प्रतीक। हमारे इतिहास के इस महान रक्षक के लिए अभिनन्दन जिसे भुला दिया गया जो आज भी लोक कथाओं में जीवित है। ऐतिहासिक दस्तावेज के अनुसार वे सत्तरहवी शताब्दी के फ़ारसी ग्रन्थ "मिरात ए मसूदी" में मिलता है जो मसूद गाजी की जीवनी है हलाकि इनके अस्तित्व को लोक कथाओं और स्थानीय लौकिक परंपराओ के आधार पर भी माना जाता है। उन्हें एक कुशल योद्धा हिंदू धर्म और संस्कृति का रक्षक माना जाता है। उन्हें राजा सुहेलदेव, शालदेव जैसे विभिन्न नामों से भी जाना जाता है।
राजा सुहेलदेव सूर्य उपाशक
राजा सुहेलदेव भगवान सूर्य के उपाशक थे उन्होंने कई स्थानों पर सूर्य कुंड का निर्माण कराया था आज भी उसका प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध है प्रयागराज जिले के गंगापार के सोरांव तहसील में तथा बहराइच में इन सूर्य मंदिरों और कुंडो का प्रमाण इस रूप में मिलता है कि इन स्थानों पर 99% प्रतिशत हिंदू धर्मवलंबी ही जाते हैं। कोई स्नान के स्थान न मिलने पर वे जहाँ भी पानी पाते हैं वही स्नान कर लेते हैं। आज भी टूटे फूटे मंदिरो के अवशेष पाये जाते हैं इससे यह प्रमाणित होता है कि आक्रताओं ने मंदिरो को तोड़ा और सूर्य कुंड को भी नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। लेकिन आज भी श्रद्धालु वड़ी संख्या में इन दोनों स्थानों पर जाते हैं। जब हम विचार करते हैं तो ध्यान में आता है कि पुरे पर्वांचल में सूर्य उपासना अधिकांश स्थानों पर होती चली आयी है बिहार के औरंगाबाद जिले में देव मंदिर बहुत प्रसिद्ध है ऐसे बिहार के अनेक स्थानों पर सूर्य मंदिर और छठ पूजा का महापर्व मनाया जाता है वास्तविकता यह है कि जो छठ पर्व है वह सूर्य उपासना ही है। जब हम उड़ीसा की ओर बढ़ते हैं तो ध्यान में आता है कि समुद्र के किनारे कोणार्क मंदिर है जो विश्व प्रसिद्ध मंदिर है लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।
अपनी -अपनी विरासत से जोड़ने की चाहत
आधुनिक समय में राजा सुहेलदेव को लेकर कई जातियाँ जैसे -राजभर, पासी और वैश्य क्षत्रिय के बीच अपनी विरासत को लेकर उनसे जोड़ने की बहस चलती रहती है। लेकिन मुख्य रूप से उन्हें उत्तर भारत के एक वीर हिंदू रक्षक शासक के रूप में जाना जाता है। राजा सुहेलदेव के बारे में बहुत सारे भ्रान्तियाँ हैं पासी समाज उन्हें अपनी जाती से जोड़ता है वहीँ राजभर समाज उन्हें भर जाती के जोड़कर स्वाभिमान के साथ गांव -गांव में सुहेलदेव लीला करते हैं। और लीला में राजा सुहेलदेव, शेख सलार गाजी का वध करते हैं। एक और किवदन्ति है की पासी समाज यदि किसी मुस्लिम लड़की से विवाह करता है तो पासी समाज उसे पांच हज़ार रूपये इनाम में देता है। एक हमारे मित्र थे वे जगदीशपुर अमेठी के रहने वाले थे उनका नाम था रामलखन पासी वे कहते थे ये परंपरा राजा सुहेलदेव के समय से चली आ रही है।
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में ऐसा माना जाता है कि राजा सुहेलदेव वैश्य राजपूत थे उनके पुर्बजो का वर्णन पाया जाता है वैसे किसी भी महापुरुष को किसी जाति में बांधना ठीक नहीं है क्योंकि भारत में जातिय व्यवस्था थीं ही नहीं वर्ण व्यवस्था थी ये जातिय व्यवस्था पहले मुस्लिम फिर अंग्रेजो ने गढ़ा और इसे रूढ़ किया। राजा सुहेलदेव महाराजा त्रिलोकचंद वैश्य के द्वीतीय पुत्र विडारदेव के वंशज थे, इनके वंश भाला चलाने में निपुड़ थे जिस कारण बाद में वो भाले सुल्तान के नाम से प्रसिद्ध हुए, आज भी सुल्तानपुर जिले के जगदीशपुर के पास भालेसुल्तान राजपूतों की पर्याप्त संख्या पायी जाति है। सुल्तानपुर की स्थापना इसी वंश ने किया था, सुहेलदेव राजा मोरध्वज के पुत्र थे, उनका राज्य पश्चिम में सीतापुर से लेकर पूर्व में गोरखपुर तक फैला हुआ था।
अंतिम प्रयाण
राजा सुहेलदेव का निधन 1034 इसवीं में उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में चितौरा झील के किनारे हुए भीषण युद्ध के दौरान माना जाता है, उन्होंने शेख सालार गाजी को पराजित करने के पश्चात् युद्ध क्षेत्र में अपनी वीरता का प्रदर्शन करते हुए प्राण दिए थे। उनकी मृत्यु के पश्चात् उनका अंतिम संस्कार भी बहराइच में ही किया गया। आज हिंदू समाज उनका ऋणी है उनकी श्रद्धांजलि उनके उद्देश्यों की पूर्ति ही होगी आशा है कि हिन्दू समाज इनसे प्रेरणा लेकर उनसे उऋण होगा।
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