भगवान श्रीजगन्नाथ जी रथयात्रा वैदिक दर्शन

 


वैदिक रथयात्रा 

समस्त हिंदू समाज की मान्यता है कि वेद अपौरुशेय है यानी ईश्वर प्रदत्त है। चारो वेद सर्वप्रथम आदित्य, अग्नि, वायु और अंगिरा इन चार ऋषियों के कंठ मे आया। इन ऋषियों ने ये वेदों का ज्ञान भगवान ब्रह्मजी को दिया, इसलिए जो लोग पौराणिक चित्र बनाते है और अपने घरों में लगाते हैं उसमें भगवान ब्रम्हाजी के चार मुखों को दिखाया गया है। वे चार मुख नहीं बल्कि चार वेद हैं। अब वेदों में क्या है ? तो चाहे वर्तमान हो अथवा भविष्य सभी में जो कुछ है अथवा होने वाला है सब कुछ वेदों में है जो वेदों में नहीं है वह कहीं नहीं है न होने वाला है, इसलिए वेदों में कहा गया है "न इति न इति " यही नहीं तो आगे भी है। यही है वेदों का संकेत क्योंकि अन्य मतावलंबियों का मानना है कि केवल मेरी ही किताब सर्वश्रेष्ठ है जिससे सारे विश्व के अंदर तनाव, हिंसा, हत्या और बलात्कार को बढ़ावा देते हैं और इन किताबियों से सारा विश्व व मानव जगत परेशान है।

विविधता में एकता 

जगत अर्थात शरीर जो क्षयशील है, नाथ अर्थात शरीर में स्थित अक्षय आत्मा। जगत में दृश्यमान प्रत्येक जीव जगन्नाथ जी का स्वरुप ऐसी मान्यता है, जगत अर्थात दृश्यमान शरीर यानी प्रकृति नाथ अर्थात प्रकृति को आलोक प्रदान करने वाला सूर्य नारायण। अग्निसोमांतक जगत, "अग्निर्ह च वृषभश्य धेनु:" ऋग्वेद के इस मंत्र के अनुसार श्री जगन्नाथ अग्निस्वरुप वृषभ हैं और आल्हादिनी शक्ति लक्ष्मी अथवा लक्ष्मी जगत रूपी धेनुस्वरूपा है। श्रीजगन्नाथ जी परब्रम्हा परमात्मा, श्रीवल्लभद्र जीवात्मा, श्रीसुभद्रा मायाशक्ति और श्रीशुदर्शन क्रियाशक्ति के रूप में विद्यमान हैं।

 श्रीजगन्नाथ ही सकल सृष्टि का कारक हैं यह बताकर श्री रामानुजाचार्य ने उन्हें वैष्णवमत का केंद्रविन्दु स्वीकार किया। उनका मत है कि जगन्नाथ ही परमात्मा हैं, बलभद्र संकर्षड़ यानी जीव, सुभद्रा प्रधुम्न यानी मन, तथा शुदर्शन अनिरुद्ध यानी अहंकार है। "शुद्धाद्वैतवाद" के आचार्य वल्लभाचार्य ने अणुभाष्य में जगन्नाथ जी को अक्षर ब्रह्म के रूप में स्वीकार किया और श्रीचैतन्य महाप्रभु ने उन्हें राधाकृष्णा का उन्हें सम्लित स्वरुप माना है। आचार्य शंकर के "अद्वैत दर्शन" में चार मुख्य तत्व हैं -- ब्रह्म यानी जगन्नाथ जी, जीव यानी वलभद्र, सुभद्रा यानी माया और सुदर्शन यानी जगत। जीव और ब्रह्म एक ही हैं, यह वैदिक सिद्धांत है, जैसे सभी नदियाँ समुद्र में अपना अस्तित्व खो देती हैं, वैसे ही माया द्वारा जीव अलग - अलग प्रतीत होते हुए भी ब्रह्म ही हैं। 

मुख्य उद्देश्य समरसता और शांति 

  पुराणों के अनुसार विष्णुभक्त, इंद्रधुम्न महराज ने साक्षात् विष्णु पूजन चतुर्धा मूर्तियों को स्थापित किया था, तब से श्रीजगन्नाथ जी की रथयात्रा चल रही है। श्रीमंदिर में श्रीजगन्नाथ जी, श्री बलभद्र और सुभद्रा तथा सुदर्शन अनेक प्रकार की लीलाये दिखाई गई हैं। इन्हीं में से एक हैं यह वैदिक रथयात्रा, इस महोत्सव के माध्यम से वैदिक संस्कृति की महिमा का प्रतिपादन किया जाता है। रथयात्रा महोत्सव का प्रमुख उद्देश्य श्रीजगन्नाथ जी की उपासना के माध्यम से वैदिक परंपरा का सरक्षण करना। रथयात्रा के अवसर पर रथ प्रतिष्ठा के साथ वैदिक विधि से चतुर्धा मूर्तियों की विशेष पूजा संपन्न की जाती है। भगवान जगन्नाथ समस्त वेदों के अमूर्त स्वरुप माने जाते हैं, रथयात्रा महोत्सव का प्रमुख उद्देश्य वेदों के माध्यम से समानता, धर्म, संस्कृति और नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना है। श्रीजगन्नाथ जी की लीला में मानवता का गूढ दर्शन छिपा है, वे 'सर्वभूर्तहिताय' के भाव को मूर्त रूप देते हैं, उनकी उपासना में वर्ण, जाति, भाषा और संप्रदाय का कोई भेद नहीं है। उनकी भक्ति मानव प्रेम सहिष्णुता, करुणा, मानवता व समरसता का मार्ग प्रसस्त करती है, अतः रथयात्रा महोत्सव का उद्देश्य सम्पूर्ण में शांति सद्भावना और समृद्धि का मार्ग प्रसस्त करना यानी विस्तार करना है।

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