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विश्वविद्यालय स्थापना की पृष्ठभूमि

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को समझने के लिए हमे इसके पृष्ठभूमि में जाना होगा कि किन परिस्थितियों में इस विश्वविद्यालय की स्थापना हुई जब तक हमें इसका ज्ञान नहीं होगा हम इसे समझ नहीं सकते क्या यह विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए बनाया गया था अथवा किसी विचारधारा को देश में स्थापित करने के लिए, किन परिस्थितियों में इस शिक्षा संस्थान की स्थापना हुई, "जवाहरलाल नेहरू"कांग्रेस किचन कैबिनेट के साथ बैठे थे वहां पर उत्तर प्रदेश के "गोविन्दवल्लभ पंत जी" भी थे नेहरू जी के एक चम्मच ने नेहरू से कहा कि अब देश को सम्हालने लायक "इंदिरागांधी" हो गई है नेहरु का चेहरा खिल उठा लेकिन पंत जी तुरंत बोल उठे अभी इंद्रा बच्ची है तुरंत नेहरू तनावपूर्ण स्थिति में कहा कि इंद्रा हम सबसे अधिक समझदार हो गई है यह थी नेहरू के वंशवाद की पौध, नेहरू के देहांत के पश्चात "लालबहादुर शास्त्री" भारत के प्रधानमंत्री हुए 1965 चीन युद्ध के पश्चात "ताशकन्द" समझौता वे नहीं लौट सके आज तक कोई जाँच नहीं किया गया जबकि उनके शरीर का रंग काला पड़ गया था यह साफ था कि उन्हें जहर दिया गया था, उनके पश्चात "इंद्रागांधी" प्रधानमंत्री तो हुई लेकिन पार्टी के सभी नेताओं की असहमति के कारण बिभाजन सरकार अल्पमत की होने के कारण वामपंथियों का सहयोग लेना पड़ा।

कांग्रेस और वामपंथी

कांग्रेस का इतिहास बताने की आवश्यकता नहीं कि उसकी स्थापना एक विदेशी ने की थी और वामपंथी विचारधारा भी भारतीय नहीं है दोनों ने समझौता किया एक तरफ जहां पहले कांग्रेस में किसी "आर्यसमाजी" को सदस्यता नहीं मिलती थी क्योंकि वे राष्ट्रवादी थे उसी प्रकार वामपंथी का तो देशविरोधी विचार ही था, दोनों की सरकार वनी "इंदिरागांधी" ने वामियो का एहसान चुकाया भारत के सभी बौद्धिक संस्थाओं को वामपंथियों को सौंप दिया देश के सारे संस्थानो का वामपंथी करण शुरू हो गया सारे पाठ्यक्रम में बदलाव किया गया जहाँ महाराणा प्रताप, क्षत्रपति शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह पढ़ाये जाते थे, जहाँ श्रीराम, श्रीकृष्ण तथा रामायण व महाभारत के कुछ अंश पढ़ाये जाते थे सारे के सारे राष्ट्रवादी चरित्र सब कुछ समाप्त कर दिया गया सेकुलरिज्म के नाम पर राष्ट्रद्रोही शिक्षा देने प्रारंभ हो गई "ग" से "गणेश" नहीं "ग" से "गधा" पढाना शुरू हो गया लेकिन वामी इतना से नहीं माने वे तो 'मार्क्सवाद' की एक 'नर्सरी' चाहते थे बड़ी ही सावधानी से जवाहरलाल नेहरू के नाम पर उन्होंने एक विश्वविद्यालय खोलने की पेशकश की और सफलता भी प्राप्त की यह विश्वविद्यालय कोई शिक्षा के लिए नहीं खुला ये तो देश के अंदर "अर्बन नक्सली", देश के विभिन्न हिस्सों में नक्सलियों को भेजने की प्रक्रिया अब तक उन लोगों ने आधे देस में हिंसा फैलाने में कामयाब और अर्बन नक्सली उसे अभिब्यक्ति की आज़ादी के नाम पर जायज ठहराने में कामयाब इन्हीं सारे उद्देश्यों को लेकर यह विश्वविद्यालय खोला गया था।

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वास्तव में जो काम जिस उद्देश्य को लेकर किया जाता है परिणाम भी उसी प्रकार का निकलता है इस विश्वविद्यालय में शुरु से ही 'भारत विरोधी षडयंत्र' होते रहे हैं इस विश्वविद्यालय में कोई नई बात नहीं है कि हिंसा हत्या बलात्कार के बारे में देश जान रहा है इस देश की जो संस्कृति है उसमें इस प्रकार के कृत्य को अच्छा नहीं माना जाता लेकिन यह आश्चर्य नहीं क्योंकि यहां का तो कल्चर यही है, कभी- कभी आश्चर्य होता है कि रात्रि को 10 बजे के पश्चात लड़कियां - लड़कों के क्षत्रावास में क्या करती हैं, कौन सा ज्ञान लेती यह समझना मुश्किल है, जब कुलपति ने रात्री में लड़कियों तथा लड़कों को एक दूसरे के क्षत्रावास में जाने से रोक लगाने का प्रयास किया तो इनके स्वतंत्रता पर प्रहार हो जाता है, जब आतंकी अफजल को फांसी होती है तो ये उसकी वर्षगांठ मानते हैं और नारा लगाते हैं "अफजल हम शर्मिंदा हैं तेरे कातिल जिंदा है" क्या सुप्रीम कोर्ट के जज की हत्या करना चाहते हैं ? ये इस विश्वविद्यालय में "भारत तेरे टुकड़े होंगे" का नारा लगाकर अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जताते हैं, "हम मार के लगे आजादी", "हम लड़के लेंगे आजादी" ये कौन सा लोकतंत्र है, वास्तविकता यह है कि वामपंथी लोकतंत्र में विस्वास नहीं रखते केवल दिखावा करते हैं, ये सेकुलर भी नहीं सेकुलर के एजेंडे के पीछे भारत विरोध और कुछ नहीं, यह जबसे इसकी स्थापना हुई है तभी से देशद्रोही कृत्य हो रहा है लेकिन इस पर पर्दा डालने का हमेशा प्रयास, जब 2014 में बीजेपी की सरकार केंद्र में आयी तो यह सब देश को ध्यान में आया जिस प्रकार कीड़े मकोड़े के "बिल" में तेल डालने से वे बिलबिलाते बाहर निकल आते हैं ठीक उसी प्रकार ये चिल्ला रहे हैं क्या हम अपने ही विश्वविद्यालय में भारत विरोधी हिन्दू विरोधी नर्सरी को अपने ही पैसे से पनपने देगें !

जथा नामे तथा गुणें

जब "गांधी- नेहरू" का भारतीय राजनीति में प्रवेश हुआ तो उस समय जो बड़े विचारक चिंतक थे उन्होंने अपना रास्ता अलग चुना क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी "स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती" देश के लिए हरिद्वार में "गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय" खोला, "महर्षि अरबिंदो" पॉन्डचेरी में आश्रम भारतमाता की साधना में लग गए, "महामना मदनमोहन मालवीय" काशी हिन्दू विश्वविद्यालय खोलकर शिक्षा साधना में लग गए लेकिन इस देश में कुछ और विश्वविद्यालय खुले कोई अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने तो उसने अपना रंग दिखाया देश के विभाजन का रास्ता खोलकर लाखों हिंदुओ का कत्लेआम कराया आज तक देश के विभाजन का जिम्मेदार "भारतीय शत्रु जिन्ना" का चित्र इस विश्वविद्यालय में लगा है किसी की हिम्मत नहीं कि उसे हटा सके, देश की राजधानी दिल्ली में "जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय" खुला यह तो इंदिरागांधी ने अपनी सरकार चलाने के बदले एक विश्वविद्यालय वामपंथियों के लिए खोला जिसमें बिना किसी पैसे के उनका (आतंकवादी देशद्रोही) प्रशिक्षण हो सके, आज यह विश्वविद्यालय के वामियो की नर्सरी ही नहीं आतंकवाद की नर्सरी भी बन गया है देश भर में "आतंकवाद" फैलाना, "ब्याभिचार परोसना", "भारत तेरे टुकड़े होंगे", "कश्मीर मांगे आज़ादी", "अफजल हम शर्मिंदा हैं तेरे कातिल जिंदा हैं" ऐसे देशद्रोही नारों का यहां प्रचलन है और देश भर के इस्लामिक व वामपन्थी आतंकवादी सभी का सुरक्षित ठिकाना बना हुआ है।

अब क्या करना चाहिए

समय की आवश्यकता है कि 1980 में इसी विश्वविद्यालय की संस्थापक "श्रीमती इंदिरा गांधी" ने एक वर्ष के लिए वंद कर दिया था देश में यदि कोई देशद्रोह की नर्सरी है तो उसे तुरंत बंद करने होंगे, क्या केवल "jnu" में पढ़ने वाले ही गरीब हैं इसपर भी विचार करना चाहिए, सारे देश के विश्वविद्यालयों में और इसमें क्या अंतर है यही की इस विश्वविद्यालय में आतंकवादी बनते हैं, देस के सभी विश्वविद्यालयों में समान सुविधाएं होने चाहिए, यहाँ के अध्यापकों को या तो अनिवार्य छुट्टी अथवा अन्य विश्वविद्यालय में स्थानांतरित किया जाना चाहिए, विश्वविद्यालय कोई देश से बढकर तो नहीं हो सकता इस पर सरकार के मानवसंसाधन मंत्रालय को तत्काल विचार करने चाहिए।