पौरव वंश का महान सम्राट उदयन महान

पौरव राजवंश

महाभारत के पश्चात "सम्राट युधिष्ठिर" ने 36 वर्ष शासन किया उनके हिमालय जाने के पश्चात "अभिमन्यु" पुत्र "महाराजा परीक्षित" तत्पश्चात "जनमेजय" का राज्यारोहण हुआ उनकी सातवीं पीढ़ी "अधिशीम कृष्ण" के बाद उसका पुत्र "नेमिचक्र" हस्तिनापुर का राजा हुआ, इसी काल में "गंगाजी" में बहुत विकराल बाढ़ आ गई 'हस्तिनापुर' उस भयंकर बाढ़ में बह गया परिणामस्वरूप "राजा नेमिचक्र" को हस्तिनापुर छोड़ना पड़ा, गंगाजी के किनारे रहने के स्वभाव ने उन्हें 'प्रयागराज' के पश्चिम "कौशाम्बी" को राजधानी बनाई यह 'कौशाम्बी' 'वत्सदेश' की राजधानी हुई, 'राजा नेमिचक्र' लगभग 82 वर्ष शासन किये, हस्तिनापुर में टिड्डिदल ने सारी फसल नष्ट करने के कारण यह राजवंश पुरी तरह 'कौशाम्बी' का होकर रह गया, बचे खुचे राजवंश के लोगों ने छोटे छोटे राज्यों की स्थापना कर कौशाम्बी के अधीनस्थ राज्य करने लगे, यही वंश जिसे हम 'कौरव वंश' के रूप में जानते हैं वही 'वत्सदेश' में आकर "पौरव राजवंश" हो गया।

वत्सराज उदयन

इसी राजवंश की 26वीं पीढ़ी में "उदयन" का जन्म हुआ, 'शतानीक द्वितीय' के बाद उनके पुत्र 'उदयन' "वत्सदेश" के राजा हुए भारतीय इतिहास में यह नाम बहुत प्रमुखता से लिया जाता है, "उदयन" केवल राजा ही नहीं था बल्कि उनके नाम बहुत सारे उनकी साहित्यिक कृतियों भी है, "महाराज उदयन" के तीन भाई थे "वत्सदेश" छोटा राज्य था 'राजा शतानीक' के मृत्यु के पश्चात "राजा उदयन" का राजतिलक हुआ ही था कि इन्हीं के सम्वन्धी "पांचाल राज़" के "राजा आरुणि" ने "राजा उदयन" पर आक्रमण कर दिया उस समय वहां का मंत्रिमंडल दिवंगत राजा के क्रिया कर्म में लगा था सब लोग शोक में थे राज्य की रक्षा में असावधान भी थे 'राजा उदयन' के राज्य सम्हालते ही "वत्सदेश" एक छोटा सा राज्य रह गया था, तभी 'पांचाल राज आरुणि' ने वत्सों पर आक्रमण कर 'वत्सदेश' का कुछ भाग हड़प लिया।

राजा उदयन का मंत्रिमंडल

राजा व मंत्रालय के असावधानी के कारण पांचाल राजा आरुणि ने कुछ प्रदेश हड़प लिया, वत्सदेश का मंत्रिमंडल बड़ा सुदृढ़ था राज्य का सारा कार्य मंत्रिमंडल की देख रेख में होता था राज्य का महामात्य 'योगंधरायन' था उनका मंत्री 'हर्षरक्षित' था ये सभी निति निपुण' शास्त्रविद' शूरवीर ब्यक्तित्व के थे वे राज्यहित के लिए कभी भी राजा व रानी से मिल सकते थे देश हित में अपनी नीति चलाते थे सेना की जिम्मेवारी सेनापति की थी लेकिन एक अतिरिक्त सेनानायक भी था, राजधानी के लिए नगराध्यक्ष की अलग ब्यवस्था थी एक प्रकार से राजा को अन्य विचार करने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता नहीं था क्योंकि मंत्रिमंडल पूरी जिम्मेदारी से राज्य का कार्य भर देखता था।

गुणी उदयन

'राजा उदयन' भारतीय संस्कृति व परंपरा के अनुसार जहाँ राजा व सम्राट तो थे लेकिन वे तानाशाह नहीं होकर एक प्रकार से लोकतांत्रिक ब्यवस्था ही थी सारा का सारा निर्णय मंत्रिमंडल के सदस्यों सामंतो के अधीन होता था यानी राजा भी निर्णय में शामिल होता था न कि वह तानाशाह होता था भारतीय ब्यवस्था में प्रत्येक गांव स्वतन्त्र इकाई हुआ करता था गांव में कोई बेरोजगार नहीं सभी रोजगार युक्त 'जो कमायेगा वही खायेगा' ऐसा नहीं तो "कमाने वाला सबकी चिंता करेगा" एक किसान है तो लोहार, कोहार, धोबी, नाउ, पुरोहित ऐसे वर्ष में दोनों फ़सलों के समय सभी को खेत से ही अनाज दिया जाता था सभी का एक दूसरे को सहयोग कोई मुकदमा नहीं सभी के साथ न्याय सभी अपने धर्मानुसार कार्य करने में विस्वास करते थे राजा का जब राजतिलक होता था तो सारी परंपरा निर्वाहन में राजा कहता था कि "मैं सर्वशक्तिमान हूँ" उस समय राजपुरोहित कहता है नहीं उसके सिर पर दंड से तीन बार सिर पर मारता है और कहता है कि "तुम धर्मदंड के अधीन हो" यानी राजा का आचरण धर्मानुसार होता था उसी प्रकार 'महाराज उदयन' हुआ करते थे जहाँ वे संगीत प्रेमी थे वहीं उनके पास एक ऐसा गुण था "घोषवती नामक दिब्यवाणी" जिससे वे हाथी को भी अपने बस में कर लेते थे वे महत्वाकांक्षी भी थे अपने पूर्वजों की कीर्ति अनुसार राज्य विस्तार विदेशियों को देश से बाहर निकालने उन्हें पराजित कर अपनी सत्ता के विस्तार में विस्वास रखते थे।


उज्जैन राजकन्या से विवाह

राजा उदयन "गज विद्या" में बड़े निपुण थे उन्हें हाथी पकड़नेे का बड़ा सौक था वे "घोषवती" वीडॉ वजाकर हाथी पकड़ लेते थे राज्य्या्भिषेक के कुछ दिन बाद ही अपने सेनापति तथा कुछ सैनिकों के साथ यमुना नदी के बगल 'नागवन' में गए थे उसी समय उज्जैनी राजा "चंद महासेन" जो महापराक्रमी था ने षड्यंत्र द्वारा अपने मंत्री 'शालंकायन' द्वारा "वत्सराज" को बंदी बनाकर उज्जैन लेकर चला गया, उज्जैन राजा की पुत्री "वासवदत्ता" थी उसके लिए संगीत के शिक्षक की आवश्यकता थी वंदी उदयन जब उज्जैन लाया गया तो उसे "राजकुमारी वासवदत्ता" के शिक्षक के लिए नियुक्ति हुई, वे "राजा उदयन" तो थे ही खूबसूरत नवजवान भी थे उनका राजकुमारी से प्रेम हो गया और मंत्री "यौगन्धरायण" की बुद्धि के कारण महाराज उदयन 'राजकुमारी वासवदत्ता' को लेकर भाग गया, महाराज शकुशल अपनी राजधानी "कौशाम्बी" पहुंच गए राजमाता उस समय तक जीवित थी उन्होंने बड़ी धूमधाम से दोनों का विबाह किया, वासवदत्ता से विबाह के पश्चात 'उदयन' राजनीति दृष्टि से मजबूत होने लगे अब उज्जैन का प्रतापी राजा "चन्द महासेन" राजा उदयन के पक्ष में हो गया और राज्यविस्तार में जुट गया।


साम्राज्य विस्तार

"पंचालराज आरुणि" ने जो भाग वत्सों का हथिया लिया था मंत्रिमंडल ने राजा पर दबाव डालकर पांचाल पर आक्रमण कर दिया, वर्षो खोया हुआ अपना प्रदेश ही नहीं तो पंचालराज के अन्य क्षेत्र भी जीत लिया और 'राजा आरुणि' वंदी बना लिया गया, "वत्सराज" भारतवर्ष के सोलह महाजनपदों में से एक था और बहुत ही शक्तिशाली राज बन गया था, "अवंति" और "मगध" जैसे शक्तिशाली साम्राज्यों से सम्बंध स्थापित हो जाने के कारण राजा उदयन की शक्ति और भी बढ गई, वत्सराज की राज्यविस्तार की महत्वाकांक्षा और बढ़ गई। "राजा उदयन" को अकस्मात अपने पूर्वजों की गाड़ी हुई सम्पत्ति सोना, चाँदी, हीरे, जवाहरात, माणिक, मुक्ता इत्यादि तथा वह "हस्तिनापुर का सिंहासन" मिल गया जो महाराजा के राज्य विस्तार में बहुत सहायक ही नहीं सिद्ध हुआ बल्कि उत्साह वर्धक वन गया।


विजय ही विजय

बुद्धिमान मंत्री 'यौगन्धरायण' ने महराज से जब उस सिंहासन पर बैठने के लिए कहा तो महाराज ने कहा कि इस पर बैठने वाले पूरी पृथ्वी पर शासन करते थे यौगन्धरायण बहुत प्रसन्न होकर राजा को दिग्विजय के लिए उकसाने लगा, पड़ोसी राज्य "वाराणसी" 'वत्सदेश' का पुराना शत्रु था उस समय वहां "ब्रम्हदत्त" नाम का राजा राज करता था "राजा उदयन" ने "मिथिला" का राज्य अपने शाले को दे दिया, अपनी सेना के सहयोगी द्वितीय "रानी पद्मावती" के भाई "सिंघवर्मा" को "चेदि राज्य" का राजा वना दिया इस प्रकार राजा ने अपनी सैनिक शक्ति को बढ़ा लिया, कहते हैं कि "उदयन" के आक्रमण के कारण "काशी नरेश" के मंत्रियों ने विष प्रयोग किया तमाम घास फूसों में कुवा तालाबों में जहरीले पदार्थ का मिश्रण डलवा दिया तथा विषकन्या का भी प्रयोग किया लेकिन "उदयन' का मंत्री यौगन्धरायण बहुत बुद्धिमान व्यक्ति था उसने सबकी काट कर दिया सैनिक छावनी में आने वाली सभी स्त्रियों का वध करवा दिया वहां के सेनापति की हत्या करवा दिया कुटिनीतिक सफलता प्राप्त हुआ 'राजा ब्रम्हदत्त' चौतरफा आक्रमण से घबरा गया उसने सभी दिशाओं से आक्रमण से महाराज "उदयन" को अजेय समझ वत्सराज के पास शान्ति दूत भेजा, राजा ने उचित उपहार लेकर "राजा ब्रम्हदत्त" का बहुत सम्मान किया, तत्पश्चात वत्सराज उदयन ने वंगदेश, कलिंग, कामरूप देश, विन्ध्य पर्वतीय राजाओं होते हुए दक्षिण में चोल राजाओं से कर लिया मुरल देश (केरल) दक्षिण के विजय प्राप्त करने के बाद उज्जैन विश्राम वहाँ साथ मे "वासवदत्ता तथा पद्मावती" को देख उज्जैन राजा बहुत प्रसन्न हुआ, महाराजा उदयन ने पश्चिम अभियान किया "सिंधुराज" पर विजय प्राप्त किया "पारसी राजा" का वध किया जो हूण चढ़ गए थे उनका समूल नाश कर दिया सम्पूर्ण भारतवर्ष को एक सूत्र में बांधने का अदभुत प्रयत्न किया।

सम्राट उदयन

इस प्रकार सभी राज्यों को अपने अधीनस्थ करके राजाओं को अपने शासन में लाकर परंपरा अनुसार महाराज अपनी कुल परंपरा से आये हुए सिंहासन पर साधिकार बैठे दिग्विजय यात्रा में बिपुल धनराशि प्राप्त किया उसे ब्राम्हणोँ में यथासंभव दान करने का काम किया तथा विजय महोत्सव मनाकर सभी नरेशों, मंत्रियों को भी कृतार्थ किया इस प्रकार "राजा उदयन" "दिग्विजयी उदयन" "साम्राट उदयन" जिसने सर्व प्रथम मलेक्षो, हूणों इत्यादि विदेशियों को केवल पराजित ही नहीं किया बल्कि उन्हें देश से बाहर खदेड़ दिया भारतवर्ष की सीमा को सुरक्षित कर चक्रवर्ती हुआ। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि "कौशाम्बी" ने भारतवर्ष की राजधानी होने का गौरव प्राप्त किया उसे हस्तिनापुर, इन्द्रप्रस्थ और पाटिलीपुत्र के समान सम्राट भी प्राप्त किया।

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