महारानी विक्टोरिया का प्रथम दौरा काशी ही क्यों --?
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जब "ईस्ट इंडिया कंपनी" ने भारत वर्ष की शासन सत्ता "महारानी विक्टोरिया" को सौंपी तो महारानी विक्टोरिया ने प्रफेसरों की एक टीम प्रतिनिधि मंडल के रूप में "भारत" भेजा, कि मेरा शासन कैसे चल रहा है ?
छः महीने भ्रमण के पश्चात प्रोफेसरो ने महारानी विक्टोरिया को एक विनती पत्र चढ़ाया। जिसमें लिखा था कि सभी जिलों में डीएम, एसपी तो है लेकिन आपका कोई शासन भारत में नहीं है!
महारानी विक्टोरिया ने पूछा कि फिर शासन किसका है प्रतिनिधि मंडल ने बताया कि वहां संन्यासियों, साधुओं, पुरोहितों, पाहन और पंडितों का शासन है।
वो कैसे --?
आपके डीएम - एसपी की कोई बात हिंदू समाज नहीं मानता वह साधू, संन्यासियों और पंडित, पाहन और पुरोहितों की बात मानता है।
महारानी विक्टोरिया ने पूछा --!
इसकी राजधानी कहां है --?
काशी -!
महारानी विक्टोरिया का प्रथम दौरा काशी हुआ और उसने एक "क्यूंस कॉलेज" खोला! वह कालेज कोई अंग्रेजी कॉलेज नहीं था वह संस्कृति महाविद्यालय था जिसे आज "सम्पूर्णानन्द विश्व विद्यालय" कहते हैं। उन्हें यह पता था कि जब तक भारतीय ग्रंथों में छेड़ छाड़ नहीं किया जायेगा हिंदू समाज को कोई गुलाम नहीं बना सकता। इसीलिए बड़ी योजना वद्ध तरीके से हमारे ग्रंथों में छेड़ छाड़ करके विकृत करने का कार्य इसी "क्यूंस कालेज" से किया जाने लगा। जिसका वर्तमान में नाम है "सम्पूर्णणा नन्द विश्व विद्यालय "।
फिर वहां पर कर्मकांड और सनातन धर्म की शारी शिक्षा शुरू हो गई जिसके द्वारा हमारे ग्रंथों में क्षेपक डालकर शिक्षा देने का काम शुरू किया।
अंग्रेजों को यह पता था की भारत में सर्वाधिक पुराना ग्रंथ मनुस्मृति है जिसके प्रति सर्वाधिक निष्ठा भी है। इसलिए उसमें सर्वाधिक क्षेपक डलवाया।
जो जानते हैं उन्हें पता है कि मनुस्मृति में अभी कुल 2685 श्लोक है लेकिन मूलतः मनुस्मृति में 1214 श्लोक ही मनु का है।
जो क्षेपक डाला गया है आज भी वही पढ़ाया जा रहा है।
मनुस्मृति में क्षेपकों की खोज
इसलिए डॉ सुरेंद्र कुमार जी ने मनुस्मृति का भाष्य किया है और क्षेपकों को हटाया है उसे पढ़ने की आवश्यकता है। आज भी जिनकी शिक्षा किसी अच्छे गुरुकुल में हुई है यदि वह प्रयत्न करें तो वह सत्य श्लोक निकाल सकता है जैसा कि डॉ सुरेंद्र कुमार जी ने खोज पूर्ण निकाला है। क्योंकि मनुस्मृति वैदिक कालीन ग्रन्थ है, इसलिये उसमें जो श्लोक है वह देव वाणी है यानी वैदिक कालीन संस्कृति है न कि लौकिक संस्कृति में।
डॉ भीमराव अंबेडकर "शूद्रों की खोज" पुस्तक में लिखते हैं कि "हिंदू धर्म ग्रंथों में किसी प्रकार का छुआ-छूत, ऊंच -नीच, भेद -भाव का वर्णन नहीं है। ये छुआ-छूत, ऊंच- नीच, भेद-भाव सब इस्लामिक काल की देन है। हमारे ग्रंथों में दास प्रथा को भी कोई स्थान नहीं है उसी पुस्तक में डॉ भीमराज अम्बेडकर लिखते हैं गुलाम बनाने की भी किसी परंपरा का वर्णन हमारे सनातन धर्म ग्रंथों में नहीं है आगे वे लिखते है कि विश्व के कई देशों में मनुस्मृति आधारित संविधान बना हुआ है।"
कांग्रेस पार्टी और ब्रिटिश
कांग्रेस का स्कूल ऑफ़ थॉट्स कभी देश हितैषी नहीं रहा कांग्रेस की स्थापना ही राष्ट्र विरोध में हुआ था। क्योंकि कांग्रेस की स्थापना भारत को आज़ाद कराने के लिए नहीं बल्कि भारत को गुलाम बनाये रखने के लिए ही हुई थी। एक समय आया कि योजना वद्ध तरीके से लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय और विपिनचंद पाल जैसे क्रन्तिकारी उसमें घुस गये और उसका राष्ट्रीयकरण होने लगा। फिर क्या था अंग्रेजो यह बात समझ में आ गई और बड़े ही तरीके से उन्होंने गांधी, नेहरू इत्यादि जो काले अंग्रेजो को घुसा दिया कांग्रेस का राष्ट्रीय करण रूककर अंग्रेजी करण हो गया और फिर क्या था एक वोट भी नेहरू को न मिलने के बावजूद अंग्रेजो ने अपने षड़यंत्र द्वारा नेहरू को प्रधानमंत्री तक नियुक्त करा दिया। आज जो कांग्रेस है वही अंग्रेजी कांग्रेस आज भी वही कांग्रेस है।
कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष मल्लिका अर्जुन खड़के को डॉ भीमराव अंबेडकर की पुस्तक "शूद्रों की खोज" और "पार्टिशन ऑफ इंडिया - पाकिस्तान" पढ़ने चाहिए। क्योंकि जोभी उन्होंने संसद भवन में बोला है यदि उनकी हैसियत है तो वे किसी राष्ट्रवादी से इस पर बहस कर le लेकिन वे जानते हैं कि उनकी ये हैसियत नहीं है वे संसद में हमारे समाज को अपमानित कर सकते हैं बाहर करेंगे तो उन पर कार्यवाही की जा सकती है। ये ध्यान रहना चाहिए विश्व में सर्वाधिक चर्चित ग्रन्थ कोई है तो वह मनुस्मृति ही है।
सूबेदार जी
धर्म जागरण समन्वय
पटना

1 टिप्पणियाँ
मनुस्मृति मानवता का प्रथम ग्रन्थ ही नहीं बल्कि प्रथम विधान भी है। हिंदू धर्म ग्रंथों को विकृत करने का प्रथम कार्य बौद्धों ने फिर मुस्लिमों ने उसके बाद सर्वाधिक प्रहार अंग्रेजों ने किया है। इसलिए हमे अपने ग्रंथों को विवेक व तर्क पूर्वक की आवश्यकता है शंका और हीनता का कोई कारण नहीं है अपने पूर्वजों सनातन वैदिक धर्म पर अडिग रहने की आवश्यकता है है।
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