चित्तोड़ की महारानी मीरा
मीराबाई का जन्म विक्रम सम्बत 1560 मे राजस्थान के मेड़ता परगना "कुड़की" गांव मे प्रसिद्ध राठौर वंश मे हुआ था। वे जोधपुर के संस्थापक राव जोधा जी की प्रपौत्री, मेड़ता के राव दूदा जी की पौत्री और रतन सिंह की पुत्री थीं। उनका लालन पालन प्रसिद्ध भक्ति जयमल जी के साथ हुआ जिनकी सराहना भक्त नाभा ने भी भक्तमाल मे किया है। जयमल जी मीरा के ताऊ वीरम जी के पुत्र थे।
मीरा की युक्ति :--- "मेड़तिये घर जन्म लियो है, मीरा नाम कहायो।"
मीरा राजघराने से थीं बचपन मे मीरा की एक बहिन का विबाह हुआ मीरा ने बचपना मे अपनी माँ से पूछा कि मेरा विवाह किसके साथ होगा, माँ मीरा का मुख देखती रह गई फिर माँ ने एक संत की दी हुई भगवान कृष्णा की मूर्ति मीरा को देते हुए कहा कि तुम्हारी शादी इस कृष्णा कन्हैया से होगी। अब मीरा के मन मे यह बात घर कर गई और प्रति दिन उस कृष्णा कन्हैया की पूजा अर्चना मे लग गई और इतना उस मूर्ति से प्रेम करने लगीं कि माँ का बार बार ध्यान आता कि माँ ने कहा है कि तुम्हारा विवाह कान्हा से अब मीरा तो प्रेम भक्ति मे लीन रहती। अपना सुध बुध खो बैठती।
मीरा का समय भगवान श्यामसुंदर के रूप सौंदर्य -चिंतन में बीतने लगा, घर वाले उनकी भक्ति -बृत्ति से बहुत प्रसन्न रहते थे। यथा समय चित्तोड़ के अधिपति महाराणा के जेष्ठ पुत्र कुंवर भोजराज के साथ मीरा का विवाह कर दिया गया। विवाह मंडप मे मीरा ने भगवान कृष्णा की मूर्ति रख रखी थी, कुंवर के साथ फेरे लेते समय मीरा ने गिरधर गोपाल के साथ भी फेरे लिए। उन्होंने विचार किया की हांड मांस के नश्वर पुतले से विवाह करने की अपेक्षा अजर, अमर और अविनाशी देवकीनंदन को अपना पति स्वीकार कर लेना अधिक श्रेयस्कर है। वो गिरधर गोपाल की मूर्ति लेकर चित्तोड़ आयीं, राजमहल मे साक्षात् कृष्णभक्ति ने ही मीरा के रूप मे प्रवेश किया।
और कृष्ण मूर्ति से वार्ता
चित्तोड़ का राजप्रसाद शक्ति संपन्न तो था ही, रानी मीराबाई के आगमन से वह भक्ति से समृद्ध और संपन्न हो उठा, कुमार भोजराज को मीरा सदा प्रसन्न रखने का प्रयत्न करती थीं। भोजराज का मीरा के प्रति व्यवहार अत्यंत शिष्ट एवं सयमित था, एक बार उनकी बहन उदा ने कुमार से शिकायत किया कि मीरा तो रात मे मंदिर बंद करके न जाने किस पुरुष से आधीरात तक बात करती है। एक दिन कुंवर भोजराज पट के बाहर खड़े हो गए, मीरा एकांत मे अपने गिरधर गोपाल की विग्रह से प्रेम पूर्वक बात कर रही थीं। कुमार को ऐसा लगा कि कोई दूसरा ब्यक्ति अंदर बैठा है, उन्होंने तलवार खींचली, भीतर आकर मीरा से पूछा, मीरा ने बताया कि मैं तो कान्हा से बात कर रही थी, मैं इस जीवन में किसी दूसरे पुरुष को जानती ही नहीं। राणा भोजराज ने मंदिर का कोना-कोना छान मारा, अंत मे उन्हें अपनी करनी पर बड़ा ही पश्चाताप हुआ, राणा भोजराज ने उनके लिए किले के पास ही रणछोड़ जी का मंदिर बनवा दिया। मीरा उसमें निवास कर संतों की मंडली में भजन -पूजन करने लगीं, राजकीय मर्यादा के लिए यह असह्य हो गया। राजरानी मीरा राजमर्यादा और लोकशक्ति को ताक पर रखकर वृन्दावन के लिए निकल पड़ी।
एक अलग प्रकार की कथा भी है कि "राणा ने विष दिया" लेकिन इस राजघराने के बारे में कौन नहीं जानता? कि कितना मर्यादित, संस्कृति संवाहक राजपारिवार था इसलिये बामपंथियो ने इस प्रकार की किवदन्ति गढ़ा। जब महयोगिनी मीरा वृन्दावन के लिये निकली तो केवल साधन ही नहीं उपलब्ध कराया गया पूरा राजसी मर्यादा और एक सुरक्षा टुकड़ी भी मीराबाई के साथ-साथ रहती थी । किसी की हिम्मत नहीं थी कि उस क्षत्राणी संत के साथ कोई आँख उठाकर देख सके। अब भक्तशिरोमणि रानी मीरा वृन्दावन पहुंचे रही हैं। कुछ देर बीत जाने के पश्चात् एक जोरदार स्वर सुनाई दिया :- जय माखन चुरैया की, जय कृष्णा कन्हैया की! जय गिरधर गोपाल की।
मीरा वृन्दावन पहुंची
मीरा ने मन ही मन भगवान कृष्ण को नमन किया और रथ चलाने वाले से बोली, तनिक रथ रोको। गाडीवान ने एक साथ रथ रोका दिया, भक्तशिरोमणि मीरा रथ से नीचे उतरी और सबसे पहले वहाँ की मिट्टी को उठा माथे पर लगाया। और बारम्बार नमन करते हुए "ए सवरियां नटनागर! मैं तुम्हारे नगरी में आयी हूँ, गैया चराते हुए, मुरली बजाते हुए मिलोगे न! मैं लोक लाज छोड़कर तुम्हारे शरण में आई हूँ, बिना मिले कदापि नहीं लौटूगी। मीरा का मन गद गद हो उठा उनके रोम रोम में नन्दलाल की माधुरी मूर्ति समा चुकी थी, और कहा कि अब मैं यहाँ से पैदल चालूँगी। क्योंकि अब हम वृन्दावन आ चुके हैं, कान्हा की क्रिणा भूमि का भरपूर आनंद लेंगे। आज भी माटी में बांके बिहारी की सुगंध है, तभी तो यहाँ की भूमि चन्दन गुलाब जैसी है। महारानी मीरा को आये वृन्दावन में कुछ समय ही हुआ था, लेकिन मथुरा, वृन्दावन सभी स्थलों पर क्षत्राणी महाभक्त मीरा की ही चर्चा, कहीं कहीं उन्होंने अपना क्षत्रिय धर्म भी निभाया कुछ व्यभिचार में लिप्त लोगो को रास्ते पर लायी ये सभी चाहे धर्मी हों अथवा विधर्मी सभी को पता था कि ये सामान्य कृष्ण दिवानी नहीं है ये महाराणा सांगा की पुत्र बधू है। रानी के साथ सुरक्षा टुकड़ी भी थी और लोग महाराणा परिवार से भी परिचित थे, उनकी मर्यादा से भी परिचित थे।
कहते हैं क़ि मीराबाई स्वामी रामानंद से मिलने काशी गयी वहाँ उन्होंने स्वामी रामानंद से दीक्षा लेने की इच्छा प्रकट किया, रामानंद स्वामी ने भक्तशिरोमणि मीरा से कहा तुम्हारा गुरु तो तुम्हारे घर मे ही है। ज्ञातव्य हो कि संत शिरोमणि संत रविदास मेवाड़ के धर्मगुरु थे वे चमरसेन वंश से थे और फिर मीराबाई ने काशी से आकर संत रविदास से दीक्षा ग्रहण की।
राणा भोजराज लेने पहुँचे वृन्दावन
बहुत दिन हों चुका है राणा भोजराज मीराबाई के लिए अत्यंत दुखी रहने लगे थे, आखिर उन्हें अपने राणा परिवार की मर्यादा का भी ध्यान था वे भक्ति शिरोमणि मीरा को वापस मेवाड़ ले जाने के लिए वृन्दावन आ ही गए। मीराबाई ने महाराणा सांगा के पुत्र से कहा कि मैं तो गोविन्द का ही गुण गान करती हूँ, उनका दर्शन करना और चरनामृत पान करना मेरा नित्य का नियम है। मैं पैरों में घुघरू बांधकर उनके मंदिर में नित्य नृत्य भजन करती हूँ, भोजराज ने उनसे कहा :- तुम्हारे परिवार के लोग युद्धरत हैं, इसमें कोई संदेह नहीं कि हम हिन्दू हैं. बाहर से देश पर आक्रमण कारी आये हैं वे युद्ध द्वारा हमारी सत्ता और अस्तित्व को मिटा देना चाहते हैं। उनसे रक्षा करने के लिए युद्ध तो करना ही होगा न! भोजराज ने टहलते हुए ये सब बताया कि हार तो हमारी अथवा उनकी होगी लेकिन राजधर्म तो यही है कि हम प्रजा और देश की रक्षा करें। राणा भोज ने समझा बुझाकर उन्हें चित्तोड़ चलने के लिए राजी कर लिया। वो पति के कहने पर चित्तौड आ गई और भगवान का भजन करने लगीं। संवत 1580 में राणा भोजराज का देहांत हो गया, महाराणा सांगा ने भी परलोक गमन किया। विक्रमदित्य मेवाड़ के महाराणा हुए, अब भक्तशिरोमणि मीरा को परेशान करने लगे राज की मर्यादा का नाम लेकर राजमर्यादा क़ो तार तार करना शुरू कर दिया। अब मीराबाई की भगवान गिरधर गोपाल में और आशक्ति बढ़ती चली गयी। एक दिन राजरानी ने महल की ओर देखा, उन्होंने ऐश्वर्य के भौतिक पुतले से विदा मांगी, चित्तौड़ की पवित्र माटी की वंदना की और विदा मांगी। गिरधर नागर ने अपनी लीला भूमि में चलने का संकेत किया :- "चलो मन गंगा यमुना तीरे " अब उदाबाई का मन बदल चुका था उन्होंने मीरा क़ो भरसक रोकने का प्रयत्न किया लेकिन वे वृन्दावन के लिए व्याकुल थीं कहा :- "मैं गिरधर के घर जाऊं।" और वे वृन्दावन चली आयीं।
द्वारिका और अंत में गिरधर गोपाल में समाहित हुईं
ब्रजभूमि मे रहते रहते उन्हें लगा क़ि कान्हा तो अंतिम समय द्वारिका मे ही रहे और मीरा द्वारिका चली गईं। वे रणछोड़ मंदिर मे भजन कीर्तन करती। इधर चित्तौड़ की हालत अच्छी नहीं चल रहीथी बड़ा संघर्ष होने लगा था। मेवाड़ वासियों के मन में था क़ि मीराबाई के बाहर जाने से राजदरबार की हालत ठीक नहीं चल रही है। इसलिए सभी चाहते थे कि महारानी मीरा क़ो पुनः मेवाड़ में लाया जाय। फिर क्या था राजपुरोहित को द्वारिका भेजा गया कि राज आज्ञा है कि मीराबाई को पुनः मेवाड़ चलना है, अब क्या करतीं राज आज्ञा तो राज आज्ञा है, उसे मना नहीं किया जा सकता। संवत 1630 में भक्तशिरोमणि मीरा ने पुरोहित जी सुरक्षा टुकड़ी से कहा कि मैं कान्हा से आज्ञा ले लूँ, वे रणछोड़ मंदिर के अंदर गयीं और लौट कर नहीं आयीं। किसी ने नहीं देखा वे किधर और कहाँ गईं बड़ी खोज बीन के पश्चात् लोग मंदिर के अंदर गये और क्या देखा? देखा कि मीराबाई के दुपट्टा का एक हिस्सा भगवान की मूर्ति मे अटकी फसी हुई है। लोगो ने भगवान कृष्णा के साथ भक्तशिरोमणि मीरा की जय जयकार किया और ध्यान में आया कि मीरा को गिरधर गोपाल ने अपने में समाहित कर लिया सबूत के तौर पर वह उनकी ओढ़नी बंशी में फसी दिखाई दे रही थी।

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