महात्मा बुद्ध और भारत ---------!

         कोई ३१०० वर्ष पूर्व अहिंसा और आत्म ज्ञान के लिए जिस धर्म का उदय हुआ वह भारतीय वांगमय व वैदिक न होने के कारण केवल ३२५ वर्ष में ही भारत भूमि से समाप्त प्राय सा हो गया, इस पंथ की कायरता जहाँ विदेशी हमलावरों को रोक नहीं सका, वही दूसरी तरफ साकेत तक घुसी हुई विदेशी यवन सेनाओ को पराजित करता हुआ सेनापति पुष्यमित्र जब पाटलीपुत्र लौटा तो देखा कि वहाँ राजा तो अहिंसा के नाम पर यवनों के आगे समर्पण कर चुका है, तब भारत की मर्यादा बचाने के लिए पुष्यमित्र शुंग ने राजा बुद्धगुप्त का बधकर पाटलीपुत्र की राज-गद्दी पर बैठा। 
      कपिलवस्तु राजा सुद्दोधन के यहाँ एक पुत्र पैदा हुआ राजमहल में प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं रहा राजा ने पुरोहित को बुला भेजा पुरोहित ने बिचार करने पश्चात् राजा को बताया यह बालक या तो बहुत बड़ा राजा होगा या बहुत बड़ा सन्यासी होगा, इसका नाम सिद्धार्थ होगा, राजा सुदोधन को लगा यदि हमारा पुत्र पढ़ लिख गया तो अवस्य ही सन्यासी हो जायेगा, इस नाते योजना बद्ध बालक सिद्धार्थ पढने की ब्यवस्था नहीं की गयी इस कार राजकुमार सिद्धार्थ पढ़े-लिखे नहीं थे, राजकुमार सिद्धार्थ का विबाह बचपन में ही एक बहुत सुन्दर राजकुमारी से कराया गया,  उनके भोग- बिलास [सूरा -सुंदरी ]की पूरी ब्यवस्था राजमहल में ही कर दी गयी, इतिहास बताता है कि जिस दिन वे घर छोड़े उस रात वे बहुत सी सुन्दरियों के साथ सोये थे। 
          एक दिन वे राजमहल से बाहर अपने मंत्री के साथ निकले तो रास्ता रुका (जाम) हुआ था उन्होंने मंत्री से पूछा की ये क्या है--? उसने बताया राजकुमार ये मरा हुआ मनुष्य है अंतिम संस्कार हेतु ले जाया जा रहा है, ये ऐसा क्यों होता है--? उसने बताया एक दिन सबको जाना ही पड़ता है यह तो विधि का बिधान है, आगे उन्होंने देखा की एक ब्यक्ति डंडा लेकर ठेगते जा रहा है राजकुमार सिद्धार्थ के पूछने पर मंत्री ने बताया की एक दिन सभी मनुष्य इस अवस्था में आते है, उसी दिन उन्होंने तय किया कि मै इसका खोज करुगा और वह अर्ध रात्रि के समय सन्यास के लिए चल दिए।
        ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् उन्होंने सारनाथ में चार भिक्षुओ को उपदेश दिया और अपने घर की तरफ चल दिए उन्होंने सर्व प्रथम अपने पुत्र और परिवार के लोगो को दीक्षा दी, अब वे सिद्धार्थ से महात्मा बुद्ध हो चुके थे उनकी ख्याति भारतवर्ष में चारो तरफ फ़ैल चुकी थी उस समय हिंसा चार बढ़ गया था महात्मा बुद्ध ने हिंसा के विरुद्ध शिक्षा दी वे अहिंसा वादी थे ऐसा नहीं था कि वे अहिंसा का प्रथम उपदेश दे रहे थे भारत में तो अहिंसा को पहले ही वेदों में विस्तार से बताया गया है, लेकिन कर्मकांडी ब्राह्मणों ने कर्म -कांड में इसका गलत उपयोग किया और कहा गया की ये सब वेदोक्ति है, महात्मा बुद्ध ने कहा यदि ये कर्म-कांड (हिंसा ) वेदों में है तो मै वेद ही नहीं मानता जब पुरोहितो ने ये कहा की ये सब भगवान को चढ़ाया जाता है तो भगवान बुद्ध ने कहा कि मै ऐसे किसी भगवान को भी नहीं मानता जो हिंसा करवाता हो, इस नाते बुद्ध का दर्शन न तो वैदिक रहा न ही इश्वर को मानने वाला बुद्ध दर्शन नास्तिक दर्शन हो गया, लेकिन वे हमेशा वैदिक जीवन पद्धति मानते रहे इस कारण इसमे उनका दोष नहीं था ये तो सनातन परंपरा मानने वाले लोगो, पंडितो और उनके पिताश्री जिन्होंने उन्हें पढाया नहीं वे वेद नहीं पढ़े थे उन्हें उपनिषदों का ज्ञान नहीं था उन्होंने गीता देखी नहीं थी इस नाते वे मनुष्य की दुखी अवस्था से दुखी होकर उन्होने यह मार्ग अपनाया, महात्मा बुद्ध ने कभी राजसत्ता नहीं छोड़ी यह एक प्रकार के शासक ही थे और बौद्ध धर्म के द्वारा ही सत्ता चलाना चाहते थे यह विश्व का प्रथम मिशनरी यानी प्रचारक धर्म था इसी कारन यह धर्म लम्बे समय तक भारतीय वैदिक भूमि पर टिक नहीं सका। 
        उनका ज्ञान बहुत ऊंचा था उनके सारे क्रिया -कलाप यानी कर्म-कांड वैदिक ही थे अलग कुछ भी नहीं था लेकिन नास्तिक दर्शन होने के कारण भारतीय बांगमय अथवा वेद बिरुद्ध हो गया इतना ही नहीं यह धर्म सद्गुण बिकृति का शिकार हो गया, इस कारण भारत की जितनी हानि बुद्ध धर्म या उनके बिचारो से हुआ उतना किसी परकीय धर्म ने नहीं किया न तो इसाईयों द्वारा न ही मुसलमानों द्वारा, बुद्ध की शिक्षा का असर इतना हुआ कि वैदिक गुरुकुलो को बुद्ध गुरुकुलो में परिवर्तित किया जाने लगा क्योंकि बुद्ध ऐसे संत थे जो क्षत्रिय राजबंश से आते थे इस कारण भारतीय राजाओ को लगा यह तो अपने ही कुल-गोत्र का है बिना जनता की राय या मत लिए ही उद्घोषणा कर दिया गया कि सभी हिन्दू धर्म छोड़कर बुद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया, लेकिन ऐसा नहीं था वैदिक धर्म में ऐसा नहीं होता जो राजा का धर्म हो वही जनता माने लेकिन जोर जबरदस्ती जनता पर थोपा हुआ धर्म, बौद्ध धर्म था परिणाम स्वरूप भारत में इस धर्म ने कारयता और आलसी लोगो को पैदा किया जो कर्महीन और राज्याश्रित हो गए, बुद्ध ने अहिंसा पर जोर दिया लेकिन कोई भी बुद्ध धर्म मानने वाला शाकाहारी न होकर सभी मांसाहारी होते है यहाँ तक इनके सबसे ताकतवर धर्माचार्य दलाईलामा घोर मांसाहारी है बौद्धों की कथनी और करनी में जमीन- आसमान का अंतर है सभी गो मांस भक्षक है, भारतवर्ष (हिन्दू) जो अरब, अफगानिस्तान, ईरान, इराक तक था सभी बौद्ध मत को स्वीकार कर लिया क्योंकि यह पंथ प्रतिक्रिया बादी था इस कारण हिंदुत्व के बिरोध में था परिणाम स्वरूप सारा का सारा यह क्षेत्र इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लिया इतना ही नहीं पश्चिम के आक्रमण कारियों का साथ देकर भारत का बिरोध करना ही अपना कर्तब्य समझा फिर क्या था--? इस्लाम की ताकत बढती गयी और ऐसी घटनाये होनी शुरू हो गयी कि जिस नालंदा गुरुकुल में दस हज़ार क्षात्र पढ़ते हो, हजारो आचार्य हो, वहाँ लुटेरा आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी 200 घुड़-सवारों के साथ आता है और विश्व प्रसिद्ध गुरुकुल का पुस्तकालय जलाकर चला जाता है इस बौद्धधर्म अथवा गौतम बुद्ध का संदेश यदि देश में नपुंसकता को पैदा करता है तो यह भारत के लिए कितना खरतनाक सिद्ध हुआ यह हम समझ सकते हैं। 
        कुछ विद्वानों का मत है कि बौद्ध मत भगवान बुद्ध का नहीं वे तो वैदिक ही थे उनका ब्यवहार दर्शन सभी कुछ वैदिक था वे अहिंशक थे लेकिन जब सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया उसने भगवान बुद्ध के नाम पर अपना पंथशुरू किया जिसे हम बुद्ध मत कहते हैं क्योंकि बुद्ध तो अहिंसक थे फिर हिंसा कहाँ से आ गयी तो अशोक ने हिंसक मत शुरू किया और भगवान बुद्ध का नाम दे दिया क्योंकि भगवान बुद्ध का दर्शन कभी भी हिंसक हो ही नहीं सकता अशोक के काल मे भारत वर्ष का खंड -खंड होना शुरू हो गया था। 
         इस बिचार के कारण भारत की सीमाए केवल सिकुड़ी ही नहीं वल्कि  बिहार का नाम कभी बिहार नहीं था बौद्ध-विहार होने के कारन इस प्रदेश का नाम बिहार पड़ा, यहाँ बौद्ध विहार बहुत थे ये सारे के सारे विहार मस्जिदों में परिणित हो गए और सारे बौद्ध मतावलंबी इस्लाम मतावलंबी हो गए, जो आज बर्तमान बिहार के लिए हिन्दुओ के लिए जीना दूभर किये हुए है इतना ही नहीं बिहार तो इस समय आतंकवाद की नर्शरी का रूप धारण कर चुका है हमें खुले मन से बिचार करने की आवश्यकता है की नालंदा गुरुकुल को नया वि.वि. बनाने की तयारी चल रही है क्या हम वैसा ही गुरुकुल चाहते है--? जिसमे 200 घुड़सवार आयें और उसे समाप्त कर चले जाय नालंदा का नाम उस समय बहुत बड़ा था जब वह गुरुकुल वैदिक गुरुकुल था जिसमे सम्पूर्ण विश्व के विद्यार्थी पढने के लिए आते थे जो बिन्दुसार जैसा वीर शक्तिशाली राजा को जन्म देता था। 
         आज भी ये प्रतिक्रिया वादी ही है बोध गया में आदि शंकराचार्य के मंदिर के सामने ये जूता रखने का स्थान बनाये हुए है इतना ही नहीं बोध गया के बौद्ध मंदिर में प्रवेश द्वार पर भगवन विष्णु का विग्रह बना हुआ है बुध के हाथ में शिवलिंग रखा हुआ है वहाँ नवबौद्ध प्रतिदिन आन्दोलन करते है की विष्णु और शंकर की मूर्ति हटाई जाय, यदि वहाँ का हिन्दू खड़ा हो जाय कि शंकराचार्य के मंदिर का जीर्णोद्धार किया जायेगा और वहां पर  बौद्ध मंदिर के विकाश को रोका जाय तो क्या होगा ----? यह भी हमें सोचना चाहिए, हमें बिचार करने की आवस्यकता है हिन्दू के अतिरिक्त कोई भी विचार उदारवादी नहीं है बौद्ध विचार भी इस्लाम और ईसाईयत के सामान ही है ये अपनी सर्बोच्च सत्ता चाहते है, हमने ब्यवहारिक दृष्टि से यह लिखा है, हमें उसी प्रकार मूल्याकन करने की जरुरत है जैसे कुरान-इस्लाम को प्रेम मोहब्बत का धर्म बताकर सम्पूर्ण विश्व में आतंक फैला रखा है उसी प्रकार बौद्ध दर्शन को केवल पढना ही नहीं भारत ने जो भोगा है उसे भी यथार्थ रूप से देखना पड़ेगा। 

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