और दीपावली मनायी गयी जो आज राष्ट्रीय त्यवहार बन गया -----------!


सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

शुभ दीपावली----!
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 कोई भी राष्ट्र तत्काल अथवा अल्प काल मे नहीं बनता वह एक लंबे समय की परंपरा का एक हिस्सा होता है, हिन्दू समाज मे जब कोई त्यवहार, उत्सव मनाया जाता है तो उसका कोई न कोई उद्देश्य होता है तो इस पवित्र दीपावली पर्व का उद्देश्य क्या है, मनाया ही जाता क्यों है -? 

वैदिक काल में दीपावली---!
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वैदिक काल मे राजा-महाराजा और आर्य गृहस्थों द्वारा नियमित यज्ञ किया जाता था यज्ञ चातुर्मास समाप्त होने के साथ कार्तिक पुर्णिमा पर चतुर्मास्य यज्ञ किए जाते थे, उत्तरायन -दक्षिणायन के आरंभ मे जो यज्ञ होते थे, वे नवसस्येष्ठि यज्ञ कहलाते थे जो कालांतर मे दीपावली का पर्व बन गया, वैदिक काल मे उत्तरायन और दक्षिणायन का बृहद विचार था यजुर्वेद और अथर्वेद इसका विस्तार से वर्णन है, दीपावली परिवर्तन से संबन्धित त्यवहार है, इस समय सूर्य दक्षिणायन होते हैं, साथ ही नया फसल "धान" आता है उसका चिवुरा खाया जाता है तथा दीपोत्सव मनाया जाता है।    

जब राजा बलि ने ढ़ाई कदम दान किये--!
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हम सभी जानते हैं की जब "भक्त प्रहलाद" पौत्र "महाराजा बलि" ने तीनों लोक अपने पराक्रम से विजित कर लिया वे तीनों लोको पर शासन करने लगे महान दानी थे, सारे देवता "भगवान विष्णु" के पास गए महाराज यह देवलोक, देवभूमि हमे पुनः वापस दिला दीजिये भगवान जानते थे वह तो महान पराक्रमी और दानी है, वे "बामन" रूप धारण कर वे "राजा बलि" के पास गए राजा उनके सुंदर स्वरूप को देख भाव विह्वल हो गए, ब्राह्मण बालक ने अपने लिए तीन कदम धरती मागा "महाराज बलि" के "गुरु शुक्राचार्य" ने बहुत समझाया ये "भगवान विष्णु" है तुम्हें ठगने आए है, लेकिन "राज़ा बलि" ने उनकी अनसुनी कर यज्ञ वेदी पर बैठ उन्होने कहा कि यदि ये "विष्णु" ही हैं तो इससे बड़ा महान कार्य और क्या हो सकता है! कि भगवान स्वयं ही मेरे यहाँ दान हेतु आए हैं राज़ा ने संकल्प ले उस "सुंदर बामन ब्रह्मण" बालक को दान देने का संकल्प लिया संकल्प लेते ही वह सुन्दर छोटा सा बालक विशाल के होता दिखाई दिया, उस "बामन भगवान" ने ढाई कदम से ही धरती नाप दी, तीसरा कदम "राजा बलि" के सिर पर रखा। उसके पश्चात भगवान ने राजा बलि को "पाताल लोक" का राज्य वापस कर दिया, देवता बहुत प्रसंद हुए पहली बार धरती पर दीपावली मनायी गयी सभी ने अपने- अपने घरों को सजाया खुशियां मनाई -------!

और नचिकेता----!
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जब मृत्यु के रहस्य की गुत्थी सुलझाने हेतु तीन दिनो तक "नचिकेता यमराज" के दरवाजे पर भूखा- प्यासा बैठा रहा, आने पर "यमराज" को बड़ा ही पश्चाताप हुआ उन्होने उसके बदले "तेजस्वी नचिकेता" से तीन वर मागने को कहा उसने किसी प्रकार का प्रलोभन स्वीकार नहीं किया, मजबूर हो "यमराज" ने मृत्यु रहस्य बता, "नचिकेता" को संतुष्ट कर वापस पृथ्बी पर भेज दिया "नचिकेता" के वापस आने पर आध्यात्मिक जगत मे ही नहीं बल्कि मानव समाज में भी "दीपावली" मनाई गयी तब से यह परंपरा पड़ गयी।

भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक--!
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"रामायण" यानी "त्रेतायुग काल" मे जब "भगवान श्रीराम" ने "राक्षस राज रावण" का बध कर "अयोध्या" लौटे तो यह भी दिन वही "विजयदशमी" के पश्चात "अमावस्या" का दिन था बड़ी ही धूम-धाम से "अयोध्या" ही नहीं सम्पूर्ण मानव जगत मे "दीपावली" मनाई गयी सभी मानवों ने अपने-अपने घरों को सजाया, दीपक ज्ञान का प्रतीक है अंधकार का शमन करने वाला दीपक देवताओं की ज्योतिर्मय शक्ति का प्रतिनिधि है, इसे भगवान का तेजस्वी रूप माना जाता है, बीच मे एक बड़ा घृत दीपक उसके चरो ओर 10-12 दीप प्रज्वलित कर अपने अंतर-मन को ज्ञान के प्रकाश से भर लेते हैं जिससे हृदय और मन ईश्वरीय प्रकाश से जगमगा उठे, इस कारण समस्त भारतवर्ष मे "दीपावली राष्ट्रीय पर्व" (त्यवहार) के रूप मे मनाया जाता है।  
        "और दीपावली पर्व भारत का राष्ट्रीय पर्व बन गया जिसे समस्त भारतीय समाज जो भी अपने को भारतीय राष्ट्रीय मानता है सभी भारतीय इस पर्व को राष्ट्रीय पर्व के नाते बड़ी धूमधाम से मनाते हैं" ।  
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