गंगू_मेहतर

क्रांतिवीर ''गंगू मेहतर'' को कई नामों से जाना जाता है, भंगी जाति के होने के कारण उन्हें गंगू मेहतर, पहलवानी का शौक़ होने के कारण 'गंगू पहलवान', सतीचौरा स्थान पर इनका अखाड़ा था, श्रद्धा से लोग इन्हें 'गंगू बाबा' कहकर बुलाते थे। गंगू के पुरखे कानपुर जिले के अकबर पूरा गाँव के रहने वाले थे, शोषण, बेगारी व अमानवीय व्यवहार के कारण वे शहर में रहने लगे। कानपुर में जन्मे 'गदरपार्टी' के जाबाज़ "गंगादीन मेहतर" जिन्हें गंगू महतार के नाम से जाना जाता है एक उच्च कोटि के पहलवान थे ।

पहलवानी सीखी और पेशवा की सेना में भर्ती

19वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय राजाओं से 'सिक्योरिटी गार्ड' रखने की अनुमति ली, लेकिन चोरी चोरी सिक्योरिटी गार्ड के स्थान सेना की भर्ती शुरू कर दिया। जब देश के राजाओं को पता चला तो बिरोध स्वाभाविक ही था सभी को ध्यान में होगा कि 1857 के पहले कंपनी का ही तथाकथित शासन था। लेकिन उन्हें ध्यान में आया कि हम भारतीयों से लड़ना उनके लिए सम्भव नहीं हो सकता था फिर सत्ता रानी विक्टोरिया के हाथ में आ गई। देश भर में कंपनी और ब्रिटिश साम्राज्य का खिलाफ विद्रोह की भावना फैल गई थी। कंपनी ने सिक्योरिटी गार्ड के नाम पर जो सेना बनाया था उसके साथ ब्रिटिश सरकार ने दक्षिण अफ्रीका तथा नेपाल से सैनिक सहयोग लिया हम जीतते जीतते हार गए। मराठा साम्राज्य के अंतिम शासक पेशवा ''बाजीराव पेशवा'' थे। वे निःसंतान होने के कारण ''नाना साहब'' को गोद लिया था, अंग्रेजी सरकार ने गोदनामा को मान्यता नहीं दिया उस समय पेशवा की राजधानी "कानपुर बिठूर" थी। 'नाना साहब पेशवा' ने सेना भर्ती शुरू किया उसमें चुकी 'गंगू मेहतर' अखाड़ा लड़ते - लड़ाते थे इस प्रकार अपने साथियों के साथ पेशवा की सेना में भर्ती हो गए। गंगू मेहतर को अंग्रेजों के धोखे से सेना का गठन बहुत अखरता था वे अंग्रेजों को देश से निकलना चाहते थे। उन्हें नाना साहब जैसे क्रांतिकारी सिपहसालार का साथ मिला, गंगू मेहतर ने यह साबित कर दिखाया कि सेना में सभी का अधिकार था कोई भेद - भाव नहीं था।

1857 की क्रांति का एक गुमनाम नायक जिससे अंग्रेज़ दहसत में थे

जब अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध शुरू हुआ तो भारतीय क्रांतिकारियों की सेना ब्रिटिश सेना पर भारी पड़ रही थी। अंग्रेजों के पास अत्याधुनिक हथियारों के कारण क्रांतिकारी दबाव में आ गए। इसी बीच गंगू मेहतर ने सैकड़ों अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया, कुछ लोग कहते हैं कि 200 से अधिक अंग्रेजी सैनिकों को अकेले गंगू ने मार गिराया। अंग्रेजी सेना सहम गई, गंगू मेहतर को गिरफ्तार करने के लिए कुत्ते के समान पीछे पड़ गए,  गंगू को गिरफ्तार कर लिया गया। 1857 की लडा़ई में इन्होने (गंगू मेहतर ने) नाना साहब की तरफ़ से लड़ते हुए अपने शागिर्दों की मदद से सैंकड़ो अंग्रेज़ों को मौत के घाट उतारा था। और इस क़त्ल ए आम से अंग्रेज़ी सरकार बहुत सहम सी गई थी, जिसके बाद अंग्रेज़ों ने गंगू मेहतर जी को गिरफ़्तार करने का आदेश दे दिया। गंगू मेहतर अंग्रेज़ों से घोड़े पर सवार होकर वीरता से लड़ते रहे, अंत में गिरफ़्तार कर लिए गए। जब वह पकड़े गए तो अंग्रेज़ों ने उन्हे घोड़े में बाँधकर पूरे शहर में घुमाया और उन्हें हथकड़ियाँ और पैरों में बेड़ियाँ पहनाकर जेल की काल कोठरी में रख दिया और तरह तरह के ज़ुल्म किये।


अंतिम समय तक संघर्ष

गंगू मेहतर पर इलज़ाम था के इन्होने कई महिलाओं और बच्चों का क़त्ल किया था; पर ये बात प्रोपेगंडा का हिस्सा भी थी। क्योंकि अंग्रेज़ों ने उस समय मिडीया का भरपूर उपयोग प्रोपेगंडा के लिए किया था! बहर हाल गंगू मेहतर को फांसी की सज़ा सुनाई जाती है। उसके बाद कानपुर में इन्हे बीच चौराहा पर ''8 सितम्बर 1859'' को फाँसी के फंदे पर लटका दिया जाता है। लेकिन दुर्भाग्यवश भारत के इतिहास में इनका नामो निशान नही है। बामियों व सेकुुुलरों ने  इतिहास को गलत दिशा में लिखा जो क्रन्तिकारी थे देशभक्त थे उन्हें उपेक्षित किया गया। जो उपनिवेश वाद के पक्षधर थे उन्ही को आज़ादी का श्रेय देने का प्रयास किया, लेकिन अब देश जाग रहा है पुनः इतिहास लेखन होगा और देशभक्तों क्रांतिकारियों के साथ न्याय होगा !
हुत्तात्मा गंगू मेहतर अपनी अंतिम सांस तक अंग्रेजों को ललकारते रहे, हुतात्मा गंगू मेहतर ने आने वाली पीढियों को शंदेश दिया जिससे नवजवानों को प्रेरणा मिल सके। और ख़ुशी से फासी के फंदे को चूम लिया--! 

 “भारत की माटी में हमारे पूर्वजों का ख़ून व क़ुर्बानी की गंध है, एक दिन यह मुल्क आज़ाद होकर रहेगा।”

एैसा कहकर उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को क्रान्ति का संदेश दिया और देश के लिए शहीद हो गए। कानपुर के चुन्नी गंज में इनकी प्रतिमा लगाई गई है।