वैदिक ऋषि आचार्य बृद्ध गर्ग

 
आचार्य वृद्ध गर्ग 

भारतीय संस्कृति का संघर्ष काल

भारत में जिन्हें हम ऋषि, महर्षि कहते हैं वे सभी शोध कर्ता, वैज्ञानिक थे। जब पश्चिची जगत के लोग ठीक से कपड़ा नहीं पहन पाते थे उस समय भारतीय ऋषि महर्षियों ने आज से भी अधिक शोध सभी क्षेत्रों में किया चाहे वह खगोल शास्त्र हो अथवा चिकित्सा क्षेत्र हो। दुर्भाग्य देश का कि भारत विभाजन के पश्चात् भारत का जो प्रथम प्रधानमंत्री था वह राष्ट्रद्रोही था उसमें अपने संस्कृति परंपरा के प्रति हीन भावना थी इस कारण भारतीय संस्कृति को समाप्त करने का काम किया। लेकिन हिंदू सनातन संस्कृति आदि काल से है ओर अनादि काल तक रहने वाली है, जिसे मिटाने का प्रयास इस्लामिक आक्रमण कारी, ब्रिटिश नहीं कर पाये उसे समाप्त करना नेहरू के उनके खानदान के बस की बात नहीं है।

आचार्य बृद्ध गर्ग का पुरातन ग्रन्थ

ज्योतिष शास्त्र में गर्ग भारत वर्ष के सबसे मुख्य ज्योतिषीयों में से एक़ हैं। उनके द्वारा लिखी गई गर्ग संहिता ज्योतिष और खगोल शास्त्र के मुख्य ग्रंथों में से एक़ है, वेवर और केन सहित पिंगरी और मीटचीरेन जैसे विद्वान आचार्य गर्ग के ग्रन्थ को हज़ारों वर्ष पूर्व का मानते हैं। डेविड और पिंगरी ने गर्ग संहिता को एक़ महान और अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य माना है। "गर्ग संहिता" ज्योतिष और खगोल शास्त्र पर लिखी गई सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक़ है, उनके द्वारा लिखा गया यह बहुत पुरातन ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ कई सनातन ऋषियों द्वारा अपने कार्यों के लिए उपयोग किया गया है, दुर्भाग्य यह है कि वर्तमान में यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है, परन्तु बाद के ग्रंथों में इस ग्रन्थ का वर्णन पाया जाता है।

धूमकेतु का वर्णन 

आचार्य बृद्ध गर्ग ने गर्ग सहिता में कई धूमकेतुओं का वर्णन किया है, यह अनुमान लगाना कठिन है कि बिना किसी उन्नत तकनिकी और बिना किसी आधुनिक मशीन के किसी प्रकार का धूमकेतु के बारे में आचार्य ने अध्ययन किया होगा, इस पुस्तक में 16धुमेकेतुओं का उल्लेख किया गया है। वह कलिकेतु और शंख धूमकेतु के बीच 18वर्ष 6माह के अंतर है, यह हमारे ऋषियों के तपस्या का परिणाम है जिसे आज के पश्चिमी वैज्ञानिक खोज रहे हैं वह भी हमारे ऋषियों के खोज के आधार पर। प्रस्तुत श्लोकों में धूमकेतु एवं उसके समय के बारे में आचार्य कहते हैं।

                  मार्ग शिष्यां अमावास्या गदाकेतु प्रदशर्यते।

                  आदित्य रौद्र सर्पणी बारहस्पयां तथेव च ।।

                   कोष्ठा  गरं च  शिखयाधुपयंत्र रुणाभया  ।

                    गदनिभो गद्केतु हन्यात दृश्यों नभो गत ।।

भावार्थ ---- गदाकेतु मार्गशीर्ष अमावस्या में अद्रा, पुष्य, पुनर्वसु तारों के क्षेत्र के पास यह देखा जा सकता है। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि धूमकेतु उन्होंने अपने जीवन काल में ही देखा था। कालकेतु के लिए विशिष्ट कक्षा के बारे में बताया गया है। वे लिख़ते हैं --कि कालकेतु पश्चिम भ्रमन्त भ्रमहरिदयम और ध्रुब तारे से होता हुआ सप्तर्षि की तरफ जाता है। यह धूमकेतु संवर्तक और धूम धूमकेतु से 1000 वर्ष के अंतराल में दीखता है। बृद्ध गर्ग ने इन दो धूमकेतुओं के विनाशकारी लक्षण जो पृथबी पर कारण होते हैं, भी लिखते हैं। इन दोनों के कारण उल्कापिंड धरती पर गिरते हैं, समुद्र में भूकंप आते हैं और पहाड़ों को भी नुकसान होता है।

हमारे ऋषि

गर्ग संहिता आज उपलब्ध नहीं है, लेकिन आचार्य बृद्ध गर्ग मंत्र दृष्टा हैं उन्होंने सरस्वती नदी के किनारे तपस्या की थी। दुर्भाग्य यह है कि आधुनिक विद्वान जो भारतीय संस्कृति के लिए ही कार्य करते हैं वे भी हीन भावना से ग्रसित है। उन्हें लगता है दुनिया दस हजार साल पहले थी ही नहीं जबकि सनातन धर्म में वैदिक गड़ना अनुसार वेदों का प्रदुर्भाव एक़ "अरब छानबे करोड़ आठ लाख वर्ष" पुराना है। आचार्य बृद्ध गर्ग को मंत्र दृष्टा बताया गया है तो वे करोड़ों वर्ष पूर्व रहे होंगे उस समय वेदों के मंत्रदृष्टा ऋषि आज के वैज्ञानिकों से श्रेष्ठ थे। उसी में एक़ आचार्य ऋषि बृद्ध गर्ग भी थे।

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