दिग्विजय आदि शंकर का

 

आचार्य शंकर 

अद्वैत मतावलंबी आदि शंकर 

स्वामी शंकराचार्य ने वेद और उपनिषदों की विवेचना कर भारतवर्ष के विद्वानों में धूम मचा दी, जहाँ तक जन साधारण की बात थी, उसका तो देवी-देवताओं तथा ईश्वर के स्वरुप के साथ सम्वन्ध था। शंकराचार्य तो अद्वैत को मानने वाले थे उनका वहुदेव में विस्वास नहीं था। वो मानते थे कोई भी किसी से छोटा बड़ा नहीं, सभी देवता एक समान हैं। यह सुनकर आम लोग गद-गद हो जाते, सबके मन में हर्ष और एक्य भाव उत्पन्न होने लगा। जन साधारण में यह भाव उत्पन्न हो रहा था श्रुति स्मृति में वर्णित धर्म भारत का धर्म है। भारतवासियों की संस्कृत ब्राह्मण ग्रन्थ, भागवत गीता तथा उपनिषद के आधार पर निर्माण हुई है। भारत के अंदर प्रचलित मत -मतांतरण एक ही श्रोत से उत्पन्न हुई है और सभी के पूज्य भी है। इन धारणाओ के बनने देश में एकत्वभाव उत्पन्न था और हो रहा था। जो फूट वाद -विवाद और द्वेषभाव बौद्ध मीमांसको ने उत्पन्न कर दिया था वह व्यर्थ प्रतीत होने लगाइस प्रकार भारत के वैदिक मतावलम्बियों में एक प्रकार से विद्युत् तरंग दौड़ने लगी थी, जिससे सम्पूर्ण हिंदू समाज में चेतना के लक्षण दिखाई देने लगे। जहाँ स्वामी जी नहीं पहुंच पाये, वहाँ पर भी लोगों में उत्साह आशा और प्रसन्नता का संचार होने लगा था। उनके ह्रदय में सततन धर्म में नये मानदंड की अनुभूति होने लगी।

मिथिला से जगन्नाथ पुरी 

इस पर भी रूढ़िवादी निर्मल नहीं हो पाये, स्वामी शंकराचार्य मिथिला से सीधा जगन्नाथ पुरी जा पहुँचे। वहाँ असुरों का शैव मत, तीर्थंकरों का जैन मत और नास्तिको का वाम मत, इन तीनों का एक विचित्र संमिश्रण बना हुआ था। पुरी में कोई ऐसा विद्वान नहीं था जिसकी प्रतिष्ठा सर्वोपरि हो और जिससे बार्तालाप करने से जन सामान्य पर प्रभाव डाला जा सके। प्रायः तीनों मत कर्मकांडी थे, यद्यपि तीनों में कर्मकांड भिन्न -भिन्न था। इस पर भी धर्म के वास्तविक लक्ष्य की ओर ध्यान न देकर, आडम्बर पर अधिक जोर दिया जा रहा था। अतः शंकराचार्य जी ने इस प्रकार के शास्त्रार्थ की जैसा उन्होंने मंडन मिश्रा और प्रभाकराचार्य से किया था, इसकी आवस्यकता नहीं समझी। उन्होंने सीधा जन सामान्य से संपर्क उत्पन्न करना आरम्भ कर दिया। स्वामी जी ने मुख में पट्टी बांधना, रात्रि में भोजन नहीं करना, स्वच्छ जल को भी छान कर पीना इत्यादि जैनियों की अहिंसा को आडम्बर बताया। स्वामी जी का कहना था कि अहिंसा का अर्थ है प्राणी मात्र को सुखी रखने का यत्न करना। इसके लिए जो उपाय और संभव हो, ग्रहण करने चाहिए, इस पर भी वे इस बात पर सबसे अधिक बल देते थे कि हिंसक पशु अथवा दुष्ट ब्यक्ति की हत्या किसी प्रकार की हिंसा नहीं।

अराष्ट्रीय मतों का खंडन 

सारे राजा महाराजा जैन और बौद्ध मतावलम्बियों से उनकी गलत फिलास्फी से उनके अराष्ट्रीय कृत्यो से दुखी थे उन्हें डूबे को सहारा यानि स्वामी शंकर मिल गये थे जो निडर थे राष्ट्रवादी थे । कांची के राजा ने एक विद्वानों की सभा का आयोजन किया जिसमें शंकराचार्य को आमंत्रित किया। कांची के विद्वानों का मत था कि सामाजिक व्यवस्था देने हेतु स्वामी शंकराचार्य को बुलाया जाय क्योंकि भारतीय समाज की सामाजिक व्यवस्था को बौद्ध मतावलम्बियों ने बर्बाद करके रख दिया है। अतः आगामी मकर संक्रन्ति को तिरुचिरापल्ली में धर्म सभा में आने का निमंत्रण दिया और शंकराचार्य ने स्वीकार कर लिया। और समय पर वहाँ पहुंचने का वचन भी दिया। इस धर्म सम्मलेन की चर्चा पूरे देश में होने लगी और एक माह से सारे देश भार से विद्वान तिरुचिरापल्ली आने लगे। स्वामी जी मकर संक्रांति से एक मास पहले ही वहाँ पहुंच गये। जब इस धर्म सभा का समाचार काशी पंहुचा तो वहाँ से विद्वानों की मंडली उस धर्म चर्चा को सुनने और उसके परिणामों को जानने हेतु यह विद्वानों की टोली भेजी गई।

और अंत में चार मठों की स्थापना 

काशी से आये विद्वानों की टोली को बहुत हर्ष की अनुभूति हुई, उन्होंने अपनी धर्म सभा की मान्यता दक्षिण के विद्वानों ने भी देख ली। वे सब कहने लगे, "हमको इस बात का गर्व है  कि हमारी व्यवस्था की मान्यता हुई, परन्तु यह सत्य है कि स्वामी जी की तर्क शक्ति का ही यह फल है। उनके तर्क के सम्मुख भारत भर में कोई ठहरने की क्षमता नहीं रखता "। सभा में स्वामी जी ने अपने मत का प्रतिपादन कर दिया। उन्होंने बताया, "भारतीय संस्कृत मेरा विषय है, संस्कृति में धर्म, देश, राष्ट्र, प्रथा और परंपरा सब समाहित है। इन सबके समन्वय से ही मानव का, जो भारत में बसे हैं उनका कल्याण संभव है। देश, राष्ट्र परंपरा और धर्म के समन्वय करने के लिए कुछ मूल भूत सिद्धांत है, उनके आधार पर ही उक्त बातों के विषय में विचार किया जा सकता है। मैं उन मूल भूत सिद्धांतो के विषय में फिर कहूंगा, पहले उन वस्तुओं का जिनका समन्वय हम चाहते हैं आपके सामने वर्णन करता हूँ। स्वामी शंकराचार्य ने चार मठ को स्थापना किया, एक कांची में, दूसरा पुरी में, तीसरा द्वारिका में और चौथा बद्रीकाश्रम में। भारत को चार भागों में बाटकर प्रत्येक भाग में कार्य के लिए इन मठों के अधीन चार संगठन बनाये गये, जिस आचार्य को जहाँ कार्य मिला वहीँ के होकर कार्य करने में लग गए।

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