स्वतंत्रता संग्राम 1857 - स्वतंत्रता की देवी रानी अवंतीबाई लोदी

 

रानी अवन्तीबाई लोधी और 1857 का स्वतंत्रता संग्राम 

रानी अवन्ती बाई का जन्म 16 अगस्त 1831 को मध्य प्रदेश के शिवानी जिले के मनकेहड़ी गांव में जमींदार राव जुझार सिंह के यहाँ हुआ था। उनका विवाह रामगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह के पुत्र राजा विक्रमदित्य लोदी से हुआ था। दुर्भाग्य ऐसा क़ि राजा विक्रमदित्य की बीमारी के कारण रानी अवंतीबाई को शासन की बागडोर अपने हाथों में लेना पड़ा। उस समय ब्रिटिश सरकार ने "डाक्ट्रीन ऑफ़ लैप्स" के तहत  रामगढ़ राज्य को हड़पने का प्रयास किया तो रानी ने इसका कड़ा प्रतिकार किया।

1857के स्वतंत्रता संग्राम में महारानी ने बड़ी भूमिका निभाई, उन्होंने अपने आस -पास के राजाओं और जमींदारों को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया। लेकिन मध्य प्रदेश के रजवाड़े अंग्रेजो से भयाक्रांत थे वे लड़ने को तैयार नहीं थे तब रानी अपने राष्ट्रभक्ति की पुकार सुनकर सभी राजाओं को एक पत्र लिखा और साथ में कांच की चूड़ियाँ भेजी। सभी राजाओं को राष्ट्रभक्ति मातृभूमि के प्रति प्रेम से वे ललकार उठे और महारानी अवंती बाई के साथ लड़ने के लिए एक बड़ी सेना तैयार किया। रानी हड़प नीति का विरोध करते हुए 4000 सैनिकों की फ़ौज के साथ अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध किया।

23 नवम्बर 1857 को खेरी के युद्ध में उन्होंने ब्रिटिश डिप्टी कमिश्नर "वडिंगटन" को पराजित किया। महारानी अवंतीबाई को जब महसूस हुआ कि वे अब से घिर चुकी हैं, और उनकी पराजय निश्चय है। तो उन्होंने अंग्रेजो के सामने झुकने से मना कर दिया और अपनी तलवार से स्वयं को समाप्त कर लिया। 20 मार्च 1858 को उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया।

नैरेटिव ऐसा भी 

अंग्रेजों ने कहा और वामपंथियों ने नैरेटिव सेट किया कि जो भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था वह सैनिक विद्रोह था। गांधी कहते थे कि ये जो क्रांतिकारी है, महाराणा प्रताप, क्षत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोविंद सिंह, गुरु अर्जुन देव, गुरु तेगबहादुर अथवा १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को भटके हुए देशभक्त मानते थे उन्हें कभी आदर नहीं देना। जब देश में काले अंग्रेजों (कांग्रेस) का शासन हुआ तो पिछले सत्तर सालों में किसी क्रांतिकारी को सम्मान नहीं मिला और यह प्रचारित किया गया कि आजादी अहिंसा से मिली है तो राणा प्रताप, शिवाजी कौन थे.? रानी लक्ष्मीबाई, वीर कुंवर सिंह और रानी अवंतीबाई कौन थीं.? फिर चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस व वीर सावरकर क्या थे.? विभाजन के समय बीसों लाख लोगों के बलिदान क्यों हुआ.? आज समय आ गया है कि हम अपने देश भक्तों, क्रांतिकारियों और राणा प्रताप, शिवाजी महाराज जैसे प्रेरणा स्रोतों स्मरण कर देश को आजादी के महत्व को बनाए रखें।

 और महारानी अवंतीबाई का सम्मान 

"धरती रोई, अम्बर रोया, रोइ सब तरुणाई थी, मातृभूमि की आन की खातिर लड़ी अवतीबाई थी।"

1857 के शीर्ष क्रांतिकारियों में रामगढ़ की रानी अवतीबाई भी अग्रगड़ी पंक्ति में शामिल है। घुघरी की पहाड़ियों पर जब अंग्रेजो ने चारों ओर से घेर लिया तब महारानी ने समर्पण के बजाय मृत्यु को स्वीकार करना उचित समझा। भारत सरकार ने उनकी वीरता को सम्मानित करने के लिए 1988 और 2001 में उनके नाम पर डाक टिकट जारी किया। आइये हम ऐसे क्रांतिकारियों के प्रति आज रानी अवतीबाई का सर्वोच्च बलिदान दिवस है, यह बलिदान उन्हें रानी लक्ष्मीबाई और वीर कुंवर सिंह के समकक्ष खड़ा करती है। रानी अवंतीबाई का मातृभूमि के लिए बलिदान को देश प्रेम, देश की अखंडता बनाये रखना, उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। आइये उनके रास्ते का अनुगमन करें यहीं उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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1 टिप्पणियाँ

  1. रानी अवंतीबाई लोदी एक स्वतंत्रता सेनानी क्रांतिकारी थीं वे रानी लक्ष्मीबाई, वीर कुंवर सिंह की पंक्ति में खड़ी पाई जाती हैं दुर्भाग्य यह है कि कांग्रेसी वामपंथी इतिहासकारों ने योजनाबद्ध तरीके से इन स्वतंत्रता सेनानियों को इतिहास से गायब कर दिया आज समय आ गया है कि हम लोग अपने आजादी के दीवानों को उचित स्थान दिलाएं जिससे आने वाली पीढ़ी अपने इतिहास को जान सके।

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