रानी तलाश कुँवरि
"महारानी तलाश कुंवारी" "अमोढा स्टेट" वर्तमान यू.पी. के बस्ती जिले की रानी थी । (आज भी अमोढ़ा राज्य को राजा जालिम सिंह के गढ़ के नाते स्थानीय लोग याद करते हैं) जिन्होंने 1857 में वीर कुंवर सिंह, महारानी लक्ष्मीबाई के समान अंग्रेजों से युद्ध लड़ा उसी युद्ध के पश्चात "अमोढा गढ़" को अंग्रेजों ने तोपों से ढहा दिया। लेकिन बामी, कांगी इतिहासकारों ने योजनाबद्ध तरीके से इतिहास के इस स्वर्णिम पृष्ठ को गायब कर दिया। राजा ज़ालिम सिंह भगवान श्री राम के वंशजों में से एक थे वे सूर्यवंशी क्षत्रिय थे आज भी जनकपुर से अयोध्या जाने वाले मार्ग जिससे भगवान श्री राम की बारात भगवती सीता जी को लौटे थे उसे रामजानकी मार्ग कहते हैं उसी मार्ग पर अमोढ़ा राज्य स्थित था जो खंडहर के रूप में देखा जा सकता है। इसी राज्य की रानी थी स्वतंत्रता सेनानी रानी तलाश कुंवरि! राजकुमारी तलाश कुंवरि का जन्म 1829 इसवीं में 28 मार्च के दिन हुआ था। अमोढ़ा राज्य के राजा जंगबहादुर सिंह का विवाह 1850 में अंगोरी राज्य की राजकुमारी तलाश कुंवरि के साथ हुआ था। दुर्भाग्य से राजा जंगबहादुर सिंह की असमय मृत्यु के कारण रानी ने राज्य की बागडोर सम्हाली। रानी तलाश कुंवरि बचपन से ही राजकुमारों की तरह शास्त्र कला मे निपुण थीं। भाला, तलवारवाजी, घुड़सवारी, तिरंदाजी आदि में रानी को महारत हासिल था वे हमेशा युद्ध मैदान में पुरुष वेश धारण कर युद्ध करती थीं।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अहम् भूमिका
रानी तलाश कुँवरी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की उन वीरांगनाओं में गिनी जाती हैं, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ साहस, संगठन और नेतृत्व का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, कर्नाटक के कित्तूर रानी चेनेम्मा ने अंग्रेजो के नको m दम कर दिया था उसी कड़ी मे अमोढ़ा राज्य की रानी तलाश कुंवरि का नाम अग्रगाणी पंक्ति मे लिए जाता है। उनका नाम भले ही इतिहास की मुख्यधारा की पुस्तकों में कम मिलता हो, लेकिन स्थानीय परंपराओं और लोककथाओं में वे अदम्य साहस की प्रतीक मानी जाती हैं। और सैन्य व्यूह रचना में अपनी सिद्धहस्तता को भी प्रमाणित किया। 1857 के विद्रोह के दौरान उन्होंने अपने क्षेत्र में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध लोगों को संगठित किया। ग्रामीणों और सैनिकों को एकजुट कर क्रांति का संदेश फैलाया। स्थानीय स्तर पर अंग्रेजी प्रशासन का विरोध और बहिष्कार कराया।
स्वतंत्रता की भावना को जन-जन तक पहुँचाया।
महिला नेतृत्व का सशक्त उदाहरण उस समय महिलाओं का युद्ध या राजनीति में आना असाधारण माना जाता था। रानी तलाश कुँवरी ने सामाजिक बंधनों को तोड़ते हुए नेतृत्व संभाला महिलाओं को भी संघर्ष के लिए प्रेरित किया। यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता केवल पुरुषों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का अधिकार है। और उन्होंने रानी दुर्गावती, रानी अवन्तिबाई, महारानी पद्मनी, महारानी करणावती का अनुसरण करते हुए "मैं अपना अमोढ़ा राज्य अंग्रेजों को नहीं दूंगी" इस उबघोष के साथ स्वतंत्रता युद्ध में कूद पड़ी और महिला पुरुषों की स्वतंत्रता हेतु प्रेरणा श्रोत बन गई।
संघर्ष और बलिदान
अंग्रेजी सेना के दमन के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अंतिम समय तक प्रतिरोध जारी रखा। अपने प्राणों की आहुति देकर मातृभूमि के प्रति समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया। आज भी अयोध्या और बस्ती, गोरखपुर के हाई वे राजमार्ग पर छावनी थाने के ठीक सामने एक पीपल का बृक्ष जिस पर सैकड़ो स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेजो द्वारा फांसी पर लटकाया गया था। वह पीपल का बृक्ष आज भी चिल्ला - चिल्ला कर कह रहा है कि हम देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान दे देंगे गुलामी स्वीकार नहीं करेंगे। प्रत्येक स्वतंत्रता दिवस के उत्सव पर वहाँ के स्थानीय लोग अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने जाते हैं। ऐतिहासिक महत्व ऐसा है कि बामी व कांगी इतिहासकारों ने -- 1857 की उन गुमनाम वीरांगनाओं में से हैं जिनका योगदान स्थानीय समाज जीवन इतिहास में अमर है। लेकिन कांगियों ने बामियों ने अछम्य अपराध किया और इतिहास से गायब कर दिया। जिससे यह साबित हो सके कि क्रांतिकारियों का कोई महत्व नहीं है आजादी तो चरखा काटने से अहिंसा से मिली यह लिखकर लाखों क्रन्तिकारियों, बलिदानियों का घोर अपमान किया है। अपने साहस, शौर्य और रणकौशल की बदौलत दस महीने तक अंग्रेजों से मुकाबला करने के पश्चात्ब दो मार्च 1858 को पखेरवा के युद्ध में अंग्रेजो से बुरी तरह घिर जाने पश्चात्, अंग्रेजो के हाथ न लगने की अपनी शर्त पर उन्होंने खुद ही अपनी कटार से अपनी लीला समाप्त कर लिया। उनके वफादार सैनिकों ने जान पर खेलकर उनकी लाश को अंग्रेजो के हाथ नहीं लगने दिया। और रानी के शव को अमोढ़ा राज्य की कुलदेवी माता भवानी चौरा के पास अंतिम समाधि के रूप में अंतिम संस्कार किया।

0 टिप्पणियाँ