शल्यचिकित्सा
मैं अपनी चिकित्सा हेतु "G.V. पंत, L.N.J.P." हॉस्पिटल दिल्ली में जाता-आता था एक दिन वहाँ की ऑफिसियल गैलरी में कुछ ऋषियों के चित्र लगे हुए हैं मैंने देखा। मेरे मन में आया कि इन ऋषियों की तपस्या का ही परिणाम है कि आज सारे विश्व में चिकित्सा का विकास हो रहा है, फिर मैंने सुश्रुत ऋषि के बारे में लिखने के लिए विचार कर आज यह लेख लिख रहा हूँ। ऋषि सुश्रुत भारतीय शल्य चिकित्सा के शोधकर्ता थे, जनक थे, हजारों, लाखों साल पहले हमारे ऋषियों, महर्षियों ने मानव कल्याण हेतु तपस्या किया यानि शोध कार्य किया जिससे आज विश्व का विकास कल्याण हो रहा है। जैसे बाल्मीकि रामायण में कई प्रकार के विमानों का वर्णन है, महाभारत में युद्ध के समय किस-किस प्रकार के वाण चलाए जाते थे जिनसे अग्नि भी होती थी, वर्षा भी होती थी यानी वो परमाणु बम हुआ करते थे। अभी-अभी एक खोज के अनुसार महाभारत के युद्ध के समय किस प्रकार के हथियारों का उपयोग किया गया उससे "नासा" तक के वैज्ञानिक आश्चर्य चकित हैं। ऐसा था पहले भारतीय विज्ञान जिस पर प्रत्येक भारतीय गर्व का अनुभव करता है। ये हजार वर्षों के इसलामिक व ब्रिटिश काल में संघर्ष के कारण भारतीय संस्कृति, विज्ञान शोध कार्य सबके सब तहस-नहस हो गया। हम अपने को अपनी संस्कृति को स्वतंत्रता को बचाने में सब कुछ भूल गए, अब समय आ गया है कि हम पुनः जागे, खड़े हो और सुश्रुत जैसे ऋषियों के शोध कार्य को आगे बढ़ाएं।
ऋषि सुश्रुत
सुश्रुत भारत के महान चिकित्सक और शल्यचिकित्सक थे वे प्लास्टिक सर्जरी के पितामह थे। उन्होंने सुश्रुत संहिता नामक ग्रन्थ लिखा जो आयुर्वेद और शल्य चिकित्सा का आधार भूत ग्रन्थ है। उनका निवास काशी में था उन्होंने नाक सर्जरी जैसी जटिल तकनीक विकसित किया। उन्होंने अपनी संहिता में 300 से अधिक ऑपरेशनों, 120 से अधिक सर्जिकल उपकरण और लगभग 1100 रोगों का वर्णन किया है। सुश्रुत ने वाराणसी में भगवान धन्वंतरि के वंशज से शिक्षा प्राप्त किया।
सुश्रुत संहिता बृहदत्रयी का महत्वपूर्ण एक ग्रन्थ है (चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, अष्टांगहृदयम ये बृहदत्रयी ) यह संहिता आयुर्वेद साहित्य में शल्यतंत्र की बृहद साहित्य मानी जाती है। धन्वंतरि द्वारा उपदिष्ट एवं उनके शिष्य सुश्रुत द्वारा प्रणीत ग्रन्थ आयुर्वेद जगत में सुश्रुत संहिता के नाम से विख्यात है। कालक्रम में पांचवी शताब्दी में नागार्जुन द्वारा इस संहिता में उत्तरतंत्र जोड़ने के साथ साथ सम्पूर्ण संहिता का प्रतिसंस्कार भी किया गया। इसके बाद दसवीं शताब्दी में तीसटपुत्र चन्द्रट ने जेज्जट की व्याख्या के आधार पर इसकी पाठ शुद्धि की। उनका यह योगदान भी प्रतिसंस्कार जैसा ही था इसके रचयिता भी सुश्रुत ही हैं। यद्यपि वर्तमान काल में उपलब्ध सुश्रुतसंहिता में अष्टांग आयुर्वेद का पर्याप्त वर्णन मिलता है तथापि शल्यचिकित्सा को आधार मानकर निर्मित होने के कारण इसे शल्य चिकित्सा के प्राचीनतम ग्रन्थ के रूप में मान्यता प्राप्त हुई है। आधुनिक शल्यचिकित्सा भी सुश्रुत को ही शल्यचिकित्सा का जनक मानते हैं। सुश्रुत संहिता मूलतः पांच स्थानों और 120 अध्यायों में विभाजित है नागार्जुन कृति उत्तरतंत्र के 66 अध्यायों को इसमें जोड़ देने पर वर्तमान में इस संहिता में कुल 186 अध्याय मिलते हैं।
सुश्रुत संहिता
सुश्रुतसंहिता शल्यपरंपरा का आधार भूत ग्रन्थ है, जिसमे शल्य चिकित्सा की विधाओं के निर्देश के साथ साथ प्रत्यक्ष कार्याभ्यास को भी पर्याप्त महत्व दिया गया है। किन्तु प्रत्यक्ष कर्माभ्यास शास्त्र के सम्यक अध्ययनोपारंत ही संभव है। संहिता के गुढ़ार्थ को समझे बिना प्रत्यक्ष कर्माभ्यास में सम्यक गति होना संभव नहीं है। तथा बिना कर्माभ्यास के शल्य चिकित्सा में सिद्धि की कल्पना ब्यर्थ है अस्तु संहिता के गूढ एवं सफुटित विषयों के प्रकाशनार्थ परवर्ती अचार्यो द्वारा इस संहिता पर अनेक व्याख्याओं का प्रणयान किया गया। वर्तमान में सुश्रुतसंहिता पर डल्हड़विरचित निवन्धसंग्रह, गयदास विरचित, न्यायचंदिका, चक्रपानिदत्त विरचित भानुमति केवल सूत्र स्थान पर उपलब्ध है। जबकि निबंधसंग्रह और सुश्रुतार्थसंदीपनि व्याख्याएं पूर्णतः प्रकाशित हैं। निबंधसंग्रह सुश्रुतसंहिता की उपलब्ध व्याख्याओं में से पठन-पाठन में सर्वाधिक प्रचलित एवं परमपयोगी व्याख्या हैं। इस व्याख्या की महत्ता न केवल सम्पूर्ण उपलब्ध होने के कारण है अपितु विषयों का सरल एवं सुबोध भाषा में स्पष्टीकरण भी इसके महत्व ख्यापन का एक हेतु है, इस व्याख्या के बारे में विद्वतजनों की मान्यता यह है कि संस्कृति का सामान्य ज्ञान रखने वाला स्नातक भी इसके सहित सुश्रुतसंहिता का अध्ययन करके आयुर्वेद के गूढ रहस्यो को आसानी से समझ लेता है। इस व्याख्या में द्रव्यों के अप्रचलित नामों पर टीका करते हुए प्रचलित पर्याओं का उल्लेख करके संदिग्ध द्रव्यों की समस्या का कुछ हद तक समाधान किया गया है।
सुश्रुत की विशेषता
इस संहिता के सूत्रस्थान में आयुर्वेद के मौलिक सिद्धांत जैसे दोष, धातु, मल ऋतुचार्य, हिताहित, अरिष्ट, रस गुण, वीर्य -विशाक, आहार, औषधि, द्रव्य वमन वीरेचन आदि के साथ साथ शल्यचिकित्सा के मुलभुत सिद्धांतो तथा अष्टविध शल्यकर्म, यंत्र, शस्तानुशस्त्र, क्षारकर्म, अग्निकर्म, जलौकावचारण, कर्णब्यध, कर्णवन्ध, आम और पक्व व्रण, व्रणालेपन, व्रणवन्ध शट क्रियाकल, शल्यापनयन आदि का अतुलनीय वर्णन मिलता है। तदुपरान्त निदानस्थान में शल्यशास्त्र में कतिपय प्रमुख रोगों का निदानपंचकात्मक वर्णन एवं शरीर स्थान में दार्शनिक विषयों, कौमारभृत्य के मौलिक सिद्धांतो, मानव शरीरक्रिया और शरीररचना का वर्णन है। इसी स्थान में मर्म शरीर की अवस्थित सुश्रुत के शरीर विषयक ज्ञान का उत्कृष्टम स्वरुप है, आधुनिक चिकित्सक विज्ञान के लिए भी यह क़ुतुहल का विषय है। आधुना इस विषय पर पुनः अनुसंधान की आवस्यकता है, आयुर्वेदिक साहित्य में शरीररचना का जितना विषद विवेचन सुश्रुतसंहिता में मिलता है, उतना किसी अन्य ग्रन्थ में नहीं मिलता। इसी कारण आयुर्वेदवांगमय में "शरीरे सुश्रुत :श्रेष्ठ : " उक्ति प्रसिद्ध है। चिकित्सास्थान में शल्यतंत्रोक्त रोगों की चिकित्सा के साथ-साथ वाजीकरण, रसायन एवं पंचकर्म आदि चिकित्सक विधाओं का वर्णन तथा काल्पस्थान में अगदतंत्र का विस्तृत वर्णन है। उत्तरतंत्र में शालाक्यातंत्र, कौमार्यभृत्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, स्वस्थ्यवृत्य, तंत्रयुक्ति, रस और दोष विषयक मौलिक सिद्धांतो का वर्णन है। संक्षेप में सुश्रुतसंहिता में न केवल शल्यतंत्र अपितु आयुर्वेद के अनेक महत्वपूर्ण सिद्धांतो का विषद विश्लेषण किया गया है जिसके परिणामको स्वरुप सुश्रुतसंहिता बृहदत्रयी में समादूत स्थान प्राप्त है।
सुश्रुत मतानुसार आयुर्वेद
सुश्रुत के अनुसार काशीराज दियोदास के रूप में अवतरित भगवान धन्वंतरि के पास अन्य महर्षियों के साथ सुश्रुत जब आयुर्वेद के अध्ययन करने हेतु गये और उनसे आवेदन किया। उस समय भगवान धन्वंतरि ने उन लोगों को उपदेश करते हुए कहा कि सर्व प्रथम स्वयं ब्रम्हा ने सृष्टि उत्पादन के पूर्व ही अथर्वेद के उपवेद आयुर्वेद को एक सहस्त्र अध्याय -शत शहस्त्र श्लोको में प्रकाशित किया और पुनः मनुष्य को अल्पमेधावी समझकर इसे आठ अंगों में विभक्त कर दिया। इस प्रकार धन्वंतरि ने भी आयुर्वेद का प्रकाशन ब्राम्हदेव द्वारा ही प्रतिपादित किया हुआ माना है। पुनः भगवान धन्वंतरि ने कहा कि ब्रम्हा से दक्ष प्रजापति, उनसे अश्वनीकुमार द्वय तथा उनसे इंद्र से आयुर्वेद का अध्ययन किया।

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