श्रीमंत राजमाता विजयाराजे सिंधिया

 


"राजमाता के हलफनामे से खुला विवादित ढांचे के ध्वंस का रास्ता" (राजमाता श्रीमती विजया राजे सिंधिया जी की पुण्यतिथि २५ जनवरी पर सादर स्मरण)

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारिकाप्रसाद मिश्र के लगातार जुबानी हमले को वे सह नहीं पाईं। उनको लगा कि यह उस ग्वालियर घराने का अपमान है, जिसने भारत विभाजन के बाद लगभग 55 करोड़ रुपए देकर कांग्रेस सरकार को संकट से उबारा था। वे उस सभा से उठकर चली आईं और इसका परिणाम यह हुआ कि मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार ने बहुमत खो दिया। वे थीं राजमाता विजया राजे सिंधिया जी !! उन्हें मुख्यमंत्री पद का ऑफर दिया गया, लेकिन उन्होंने गोविंद सिंह को मुख्यमंत्री बनवाया। इसके बाद मध्यप्रदेश में जनसंघ फैलता ही गया। राजमाता सिंधिया जी को नानाजी देशमुख ने जनसंघ की सदस्यता दिलवाई थी।

आपात काल

उनके जीवन के सबसे बड़े संघर्ष और समर्पण का इम्तिहान आपातकाल में आया, जब श्री माधवराव सिंधिया माँ और बहनों को छोड़कर नेपाल चले गए और राजमाता को संदेश भिजवाया कि वे भी सुरक्षित रहने के लिए नेपाल चली आएं। राजमाता को पुत्र का यह फैसला और व्यवहार कायराना लगा। उन्होंने न केवल पुत्र को धिक्कारा, बल्कि नेपाल के रास्ते से वापस लौटकर इमरजेंसी में जेल में रहना स्वीकार किया। वे तिहाड़ जेल में जयपुर की राजमाता गायत्री देवी जी के बगल वाली कोठरी में बंद रहीं। यह वह स्थिति थी, जब उनकी प्राणों से प्यारी बेटियों को यह भी पता नहीं था कि उनकी अम्मा कहां हैं! उसी दौर में मेजर जसवंत सिंह जी (पूर्व केंद्रीय मंत्री) राजमाता को सहयोग करने के कारण निकट आए। 1989 में झालावाड़ से चुनाव लड़ने का आग्रह राजमाता से ही किया गया था। लेकिन वे चुनावी राजनीति से दूर हो चुकी थीं। इसके बाद तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष श्री भैरोंसिंह शेखावत के द्वारा श्रीमती वसुंधरा राजे को झालावाड़ से चुनाव लड़वाने का आग्रह किया गया। यह आग्रह श्रीमती राजे के अनमने पन के बावजूद राजमाता के हस्तक्षेप के कारण टाला नहीं जा सका। और, राजस्थान को यशस्वी माता की विजनरी पुत्री के रूप में प्रभावशाली नेतृत्व प्राप्त हुआ।

एक समय ऐसा भी 

१९८४ में इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात मा अटल बिहारी बाजपेई को राजमाता सिंधिया ने ग्वालियर से चुनाव लड़ने के लिए कहा था। और राजमाता सिंधिया ने अपने पुत्र माधवराव सिंधिया को ये बताया कि अटल जी ग्वालियर से चुनाव लड़ेगे आप दूसरी सीट पर लड़ जाना ये बात माधवराव जी ने स्वीकार कर लिया, लेकिन माधवराव कांग्रेस में थे। अटल जी के ठीक नामांकन के बाद राजीव गांधी ने माधवराव को ग्वालियर से ही चुनाव लड़ने के लिए बाध्य कर दिया। यह सुनकर राजमाता को बहुत कष्ट हुआ और अटल जी से कहा कि अब मैं माधवराव के खिलाफ चुनाव लड़ूंगी लेकिन अटल जी ने राजमाता सिंधिया से कहा नहीं ये अच्छा नहीं होगा कि मां और बेटे आमने सामने चुनाव लड़ें। राजमाता मान तो गई लेकिन उन्होंने एक वसीयत लिखी जिसमें उन्होंने लिखा कि मेरे मरने के बाद मेरी लाश को मेरा पुत्र माधवराव नहीं छू सकेगा। और उसी के साथ माधवराव जी से राजमाता सिंधिया से आजीवन सम्बन्ध खराब हो गया। राजमाता जी ने कभी अपनी विचारधारा और स्वाभिमान से समझौता नहीं किया।
आज तक टी वी चैनल पर प्रभु चावला से बात करते हुए, प्रभु चावला ने माधवराव सिंधिया से पूछा कि आपकी अंतिम इच्छा क्या है? माधवराव सिंधिया ने कहा कि यदि मेरा पुनर्जन्म हो तो मुझे मेरी यही माँ मिले. और मै कोई अन्य कार्य न करके केवल अपनी माँ की सेवा करुँगा जो मै इस जन्म में नहीं कर पाया. ऐसा पुत्र था राजमाता का, कहते हैं की परिवार का संस्कार कहीं जाता नहीं और माधवराव ने यह बात कहकर सविता भी कर दिया।

श्री राम जन्मभूमि आंदोलन 

एक समय वह आया, जब राजमाता सिंधिया जी ने अपने को "श्रीराम जन्मभूमि* आंदोलन को पूर्णतः समर्पित कर दिया। देश में उनका इतना महत्व था कि उनके हलफनामे के कारण ही बाबरी ढांचे के ध्वंस का अध्याय लिखा जा सका। निस्संदेह वे भारत और भारतीय जनता पार्टी की अब तक की श्रेष्ठतम महिला नेता रही हैं। उन्हें कभी भी आरोपित या कलंकित सिद्ध नहीं किया जा सका।

आजादी के बाद भारत की मातृशक्ति की सशक्त प्रतीक, हिंदुत्व की रक्षक, श्री राम जन्मभूमि आंदोलन की श्रेष्ठतम योद्धा, राष्ट्र धर्म की प्रतीक ऐसी राजमाता सिंधिया जी का कोटिशः अभिनंदन !!

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ