निषाद राज "राजा गुह्राराज" "राजा गुह" ---!

 


कौन है निषाद समाज -?

एक मान्यता है कि अयोध्या के महाराजा बेन थे यह घटना वैदिक काल की है त्रेता युग शुरू होने वाला था। कहते हैं राजा बेन अत्याचारी हो गए जनता परेशान होने लगी ऋषियों ने उन्हें बहुत समझाने का प्रयत्न किया लेकिन उन्होंने उनकी बात को अनसुनी कर दिया ऋषियों ने क्रोधवश कुशों से प्रहार किया और राजा मर गया। ऋषियों ने चिंतित होकर आपस में विचार किया कि राजा तो चाहिए, कहते हैं राजा के ऋषियों ने शरीर का मंथन किया राजा के दाहिने भाग से एक बालक का जन्म हुआ लेकिन वह ठिगने कद का था थोड़ा काला था फिर ऋषियों ने विचार किया की राजा सुन्दर गोरा चिट्टा होना चाहिए फिर शरीर का मंथन किया उससे बाये तरफ से एक गोरा चिट्टा बालक पैदा हुआ जिसका नाम पृथु रखा गया। अब ये कह सकते हैं क्या कोई ब्यक्ति के शरीर मंथन करने से बच्चा हो सकता है क्या -? (हो सकता है रानी के साथ नियोग विधि अपनाया गया हो पहले समाज में इसकी मान्यता थी ) कहते हैं कि जो प्रथम बालक था जिसे जल क्षत्रिय कहा गया उसे नदियों, झील और समुद्र पर शासन करने का अधिकार दिया गया। आज उन्हीं को हम निषाद, बिन्द, चाई, मल्लाह इत्यादि नामों से जानते हैं। त्रेता युग में आज के कोई नौ लाख वर्ष पहले भगवान श्रीराम के समकालीन हुए निषाद राज "राजा गुह" जो श्रृंग्वेरपुर के राजा थे।

निषादराज की शिक्षा वशिष्ठ आश्रम गुरुकुल में 

निषाद राज का जन्म श्रृंग्वेरपुर में हुआ था आज भी वहाँ पर गंगाजी के किनारे निषाद राज के सुबूत के रूप में किले के अवशेष जीवित हैं मैं स्वयं कई बार वहाँ गया हूँ, मैं प्रयागराज के गंगापार मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जिला प्रचारक था वहाँ पर आज भी वर्ष में निषाद राज के उपलक्ष्य में मेला लगता है हज़ारों लोग उस समय मेले में आते थे। आज भी आते हैं यह मेले के माध्यम से निषाद राज को याद किया जाता है। निषाद राज श्री राम के वचपन के मित्र थे दोनों वशिष्ठ आश्रम गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करते थे। दोनों राजा के पुत्र थे इसलिये दोनों की मित्रता वचपन से ही थी। वे दोनों बालसखा थे, विद्यार्थी जीवन के मित्र थे वनवास जाते समय जब मिले तो दोनों की यादें ताज़ा हो गयी और भाव विभोर हो उठे । भगवान श्री राम वन जाते समय पहली रात्रि तमसा नदी के किनारे बिताया और दूसरी रात्रि वे श्रृंग्वेरपुर में निषाद राज के राज्य में गंगाजी के किनारे बिताया। वहीँ निषादराज से राम से भेंट हुई। जब भगवान राम और रावण का युद्ध हुआ तो केवल भालू-बानर जातियाँ ही नहीं तो निषादराज की भी जनजाति सेना भी शामिल थी।

निषादराज गुह्राराज और उनकी जयंती 

कोल, भील, बिन्द, केवट, मलाह, मझवार, गोड़िया, मछवारा - निशादों के उपनाम व जाति है। राजा का नाम गुह्राराज था जनता उन्हें काशीराज के नाम से भी जानती थी। उन्होंने भगवान राम को वनवास के समय गंगाजी को पार कराया था। हलाकि गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस प्रसंग को अलग प्रकार से किया है जिसमें केवट ने गंगाजी को पार कराने के लिए उनके पैर धोने का आग्रह किया था और कहा कि हे प्रभो नाव चलाना हमारी रोजी -रोटी है हमने सुना है कि आपके पैर छू जाने से पत्थर शिला नारी हो गई तो भगवन पहले से मेरी एक पत्नी है। इसलिए मैं आपके पैर धोये बिना नदी पार नहीं कराऊंगा भगवान उसकी भक्ति देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं और पैर धोने की अनुमति देते हैं। निषादराज की जयंती भारतीय काल गणना अनुसार निषादराज की जयंती मुख्य रूप से चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है यह तिथी रामनउमी के ठीक पांच दिन पहले पड़ती है। इसके अतिरिक्त देश के विभिन्न भागों में स्थानीय निषाद समाज द्वारा जनवरी से अप्रैल के बीच अलग -अलग तिथियो पर भव्य कार्यक्रम शोभा यात्रा निकाली जाती है।

निषाद राज और राम की भेंट 

निषादराज को जब यह समाचार मिला कि श्रीराम अयोध्या नरेश के पुत्र गंगातट पर पधारे हैं तो निषाद राज गुह्राराज भाव विभोर हो खुशी से झूम उठे और चुन चुन कर कन्दमूल तथा तमाम प्रकार के फल फूल लेकर, अपने और साथियों को बुलाकर भगवान की सेवा में उपस्थित हुए। इसी बीच राम, सीता और लक्ष्मण ने गंगाजी में स्नान कर लिया था। निषादराज और उनके प्रियजनों ने बारी -बारी से राम, सीता और लक्षमण को दंडवत प्रणाम किया। राम ने निषादराज को अपने पास बिठाया प्रेम पूर्बक उनसे हाल चाल पूछा। राम जी से यह प्रेम पाकर उनकी यानि निषादराज की आँखे भर आयी। उसने कंद मूल इत्यादि फल की टोकरी भगवान के सामने रख दी और निवेदन किया कि यह मेरा राज्य है आपका ही है आप यहीं निवास करें और शासन करें। राम ने कहा कि मेरे पिताजी का आदेश है कि चौदह साल मुझे वनवासी जीवन बिताना है मैं किसी महल मे नहीं जा सकता। राम की बात सुनकर निषादराज सहित सभी प्रियजन दुखी और निराश हो गये। सभी नर -नारी तरह तरह की बातें करने लगे। कैसे निष्ठुर पिताजी है जो सुकुमार बच्चों को जंगल भेज दिया। जब शाम का समय आया तो निषादराज के प्रियजन प्रणाम कर अपने अपने घर चले गये। राम ने संध्या वंदन किया राजा ने सुरक्षा पहरेदारी की व्यवस्था कर दिया। प्रातः काल फिर राम ने निषादराज को वड़ का दूध उपलब्ध कराने को कहा निषादराज से वड का दूध प्राप्त कर श्रीराम और लक्ष्मण ने ऋषियों मुनियों जैसी अपनी जतायें बना लिया। अब श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई मुनी वेश में ऋषि सदृश्य शोभा बढ़ा रहे थे।

निषाद राज और भरत की भेंट 

महाराज भरत अब ननिहाल से लौटकर अयोध्या जी आ गये पिताजी का सारा क्रिया कर्म करने के पश्चात् अपने गुरु वशिष्ठ, मंत्री सुमंत और अपनी तीनों माताओं के साथ भगवान श्री राम सीता और लक्ष्मण को मनाने उन्हें वापस अयोध्या लाने के लिए रवाना हो गये। उन्होंने अपनी सेना सहित गंगाजी के किनारे डेरा डाला ही था कि निषादराज शशांकित हो उठे। अपनी सेना को सतर्क किया कहा इतनी विशाल सेना के साथ भरत क्यों आये हैं कहीं वे भगवान श्रीराम के साथ कुछ करना तो नहीं चाहते। अपने नविको को सम्बोधित करते हुए कहा कि बिना भरत के मन को समझे कोई भी नाव गंगा इन्हें पार नहीं कराएगी सभी को सतर्क रहना है। फिर उन्होंने कुछ अपने मंत्रियों के साथ भरत का मन समझने हेतु भरत की सेवा में उपस्थित हो गये। उन्होंने भरत से कहा यह वन प्रदेश आपके लिये घर में लगे हुए बगीचे के समान है, आपने अपने आगमन की सूचना न देकर हमें धोखे में रख दिया। हम आपके स्वागत की तैयारी न कर सके, हमारे पास जो कुछ है आपकी सेवा में उपस्थित है। यह निषादो का घर आपका ही है, आप यहाँ सुख पूर्वक निवास करें। यह फल फूल आपके लिए है निषादों ने स्वयं तोड़कर आपके लिए लाया है इन सबको ग्रहण करें।

भैया तुम मेरे बड़े भाई के सखा हो मेरी इतनी बड़ी सेना का सत्कार करना चाहते हो यह तुम्हारा मनोरथ बहुत ऊँचा है। तुम उसे पूर्ण समझो तुम्हारी श्रद्धा से ही हम लोग बहुत अहलादित हो गये हमारा सत्कार हो गया समझो। निषाद राज ने आगे कहा कि हे महाबली भरत आपके साथ बहुत से मल्लाह जाएंगे जो इस प्रदेश से पूर्ण परिचय हैं, इनके शिवा मैं भी आपके साथ चलूँगा। परन्तु एक बात बताइये अनायास ही महान पराक्रम करने वाले श्री रामचंद्र जी के प्रति आपके मन मैं कोई दूरभावना तो नहीं है। आपकी यह विशाल सेना मेरे मन में शंका उत्पन्न कर रही है। निषादराज! ऐसा समय कभी न आये, तुम्हारी बात सुनकर मुझे बड़ा कष्ट हुआ तुम्हें मुझपर संदेह नहीं करना चाहिए। रघुनाथ जी मेरे बड़े भाई हैं वे मेरे पिताजी के समान हैं अतः मैं उन्हें अयोध्या के लिए लौटाने के लिए आया हूँ। गुह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ तुम्हें मेरे विषय मैं कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिए। भरत की बात सुनकर निषादराज का मुख प्रसन्नता से खिल उठा। निषादराज ने राजकुमार भरत को बताया लक्ष्मण अपने भाई की रक्षा के लिए धनुष वाण धारण किये सोते हुए राम की रक्षा के लिए सान्निध्य रहे फिर भरत ने पूछा हे गुह, हमारे श्री राम सीता और लक्ष्मण उस दिन रात में कहाँ ठहरे थे? उन्होंने भोजन करके कैसे बिछौने पर सयन किया था? वे सब मुझे बताओ, यह प्रश्न सुनकर निषादराज बहुत प्रसन्न हुए श्री राम के आने पर उनके प्रति जैसा वर्ताव किया था वह सब भरत को बताते हुए कहा! सीता सहित राम ने उस रात उपवास किया लक्ष्मण जी जो जल लाये थे केवल उसे ही पिया बचा हुआ जल लक्ष्मण ने पिया। उसके पश्चात् लक्ष्मण ने स्वयं कुश लाकर एक सुन्दर सैया तैयार किया सुन्दर बिछौना बिछाया। सोने के पश्चात् लक्ष्मण ने राम के पैर दबाये जब भगवान सो गए लक्ष्मण वहाँ से दूर हट गए। शत्रुसंतापी लक्ष्मण अपनी पीठ पर वाणों से भरे दो तरकश बांधे, दोनों हाथों की अंगुलियों में दस्ताने पहने राम के चारो ओर घूमकर केवल पहरा देते हुए रात भर खड़े रहे। और मै भी उत्तम वाणों के साथ रात भर सदा सावधान रहा तेजस्वी श्रीराम की रक्षा करता रहा।

समरसता की अद्भुत मिशाल नित्य नूतन वैदिक सनातन धर्म 

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