हमारी धार्मिक परंपराएं ही राष्ट्रीयता का आधार

 


लाला लाजपत राय अपनी पुस्तक दयानन्द चरित  में लिखते हैं कि -  "जिस समय ईसाई इस देश में आए तो उन्होंने यहाँ सर्वत्र अंधकार को देखा। यहाँ का धर्म विपत्तिग्रस्त तथा भयानक दशा में था। उन्होंने सोचा कि यहाँ के लोग मिथ्या विश्वासों में फँसे हैं। यों उनमें विश्वास की दृढ़ता भी नहीं है, किन्तु अपनी सीमाबद्ध रूढ़ियों के दुष्चक्र से निकलना उनके लिए अतीव कठिन है। उन्होंने समझा कि जब तक इनमें शिक्षा का प्रचार न हो, नए धर्म को ग्रहण करना उनके लिए असंभव होगा।" (दयानन्द चरि,  पृष्ठ संख्या, 65)

यहाँ आप समझ सकते हैं कि ईसाई प्रचारक जब भारत में आए, तब उनके अनुसार हिन्दू मिथ्या विश्वासों में फँसे थे। उनके अनुसार मिथ्या विश्वास थे -  हिन्दुओं का मूर्तिपूजा करना, अवतारवाद को मानना, बहुदेववाद को मानना, पूर्वजों का श्राद्ध करना, विभिन्न धर्मग्रन्थों पर विश्वास रखना, तीर्थों में आस्था रखना आदि-आदि। यही उनके लिए अंधकार था। और ईसाई प्रचारक यह भी समझ रहे थे कि जब तक इनमें शिक्षा का प्रसार न हो, अर्थात् इन सबके प्रति इनमें अश्रद्धा उत्पन्न न की जाए, ये लोग नए धर्म, यानी ईसाई धर्म को ग्रहण नहीं करेंगे। आप समझिए, हिन्दू धर्म के मूर्तिपूजा, श्राद्ध, तीर्थमहिमा आदि सिद्धान्त केवल धार्मिक मान्यताएँ ही नहीं थे, अपितु ऐसे सुदृढ़ आधार थे, जिन्होंने हिन्दू समाज को अपने धर्म, परम्पराओं और पूर्वजों से भावनात्मक एवं सांस्कृतिक रूप से बाँधे रखा था। यह समस्त दृश्य जगत् मूर्त रूप में हमारे अनुभव का विषय बनता है। मनुष्य का मस्तिष्क भी सामान्यतः स्थूल प्रतीकों के माध्यम से सूक्ष्म एवं अमूर्त तत्त्वों का चिन्तन अधिक सहजता से कर पाता है। अतः मूर्त प्रतीक अमूर्त तत्त्व की अनुभूति और उसके प्रति श्रद्धा जाग्रत करने के सशक्त माध्यम बनते हैं। जैसे अपने दिवंगत पूर्वजों के चित्रों को देखकर उनकी स्मृतियाँ पुनः सजीव हो उठती हैं, वैसे ही भगवान् की मूर्ति के दर्शन, तीर्थों की यात्रा, श्राद्धादि अनुष्ठानों तथा नाना प्रकार के धार्मिक कर्मकाण्डों के माध्यम से हिन्दुओं के हृदय में अपने धर्म के प्रति श्रद्धा, आत्मीयता, सजगता एवं निष्ठा निरन्तर पुष्ट होती रहती थी। पुराणों की कथाएँ धर्म के आदर्शों को जनसामान्य तक पहुँचाती थीं, श्राद्धादि विधान पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और वंशपरम्परा का बोध कराते थे तथा तीर्थ एवं देवालय धार्मिक जीवन को सामाजिक और सांस्कृतिक आधार प्रदान करते थे। इस प्रकार ये समस्त व्यवस्थाएँ मिलकर धर्म को केवल बौद्धिक विश्वास का विषय न रहने देकर मनुष्य के दैनिक जीवन, पारिवारिक संस्कारों, भावनाओं और सामाजिक व्यवहार का अभिन्न अंग बना देती थीं। फलतः सामान्य जनमानस के लिए अपने धर्म से विमुख होना केवल कुछ मान्यताओं का परित्याग करना नहीं, अपितु अपनी पीढ़ियों से चली आ रही परम्पराओं, पूर्वजों की स्मृतियों और सांस्कृतिक पहचान से सम्बन्ध विच्छेद करने के समान था। यही कारण था कि सामान्यतः लोग अपने धर्म के परित्याग की कल्पना तक नहीं करते थे। लोभ, स्वार्थ आदि के कारण धर्मपरिवर्तन करने वालों की बात यहाँ नहीं हो रही है।

ईसाई प्रचारकों के सामने यह सबसे बड़ी समस्या थी। वे इन सिद्धान्तों को मिथ्या मानते थे, किन्तु वे यह समझ चुके थे कि इनके रहते हिन्दुओं को धर्म से विमुख करके ईसाई बनाना लगभग असंभव कार्य है। यहाँ आप यह भी समझ सकते हैं कि इन सबका जो विरोध करेगा वो सनातन वैदिक धर्म ( हिन्दू धर्म )  का हितेषी तो नहीं ही माना जा सकता हैं। वे ईसाई बुद्धिजीवी अनेक बार यह देख चुके थे कि इन सिद्धान्तों व विश्वासों के अवगुण सुनाकर भी वे हिन्दुओं के मन में इन प्रतीकों व परम्पराओं के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न नहीं कर पा रहे थे। तब ईसाइयों ने विचार किया कि सबसे पहले इनके धर्म को, इनके शास्त्रों को ठीक से समझा जाए, पढ़ा जाए। लाला लाजपत राय लिखते हैं -  "तब ईसाई प्रचारकों ने विचार किया कि इनके धर्म (हिन्दू धर्म) की अभिज्ञता हम प्राप्त करें और हिन्दुओं के धर्मविश्वासों का मिथ्यात्व इनको समझाएँ। इस नीयत से पादरियों ने संस्कृत विद्या को सीखने का प्रयास किया।" (पृष्ठ संख्या, 66) ईसाई प्रचारकों ने हिन्दू धर्म के इन सिद्धान्तों के प्रति हिन्दुओं के मन में अश्रद्धा उत्पन्न कराने के लिए संस्कृत सीखने व शास्त्रों को पढ़ने का प्रयास किया। अर्थात् वे खोजना चाहते थे कि इनके धर्म में ऐसा कुछ मिले, जिससे इनके मन में अश्रद्धा उत्पन्न कराई जा सके। तब पादरियों ने संस्कृत सीखना चाहा, किन्तु कोई ब्राह्मण इन पादरियों को संस्कृत सिखाने को तैयार न हुआ। किन्तु 1559 में एक व्यक्ति ने ईसाइयों को संस्कृत पढ़ाना प्रारम्भ कर दिया। लाला लाजपत राय लिखते हैं -  "तब 1686 में राबर्ड नामक पादरी ने ब्राह्मण का वेश धारण करके संस्कृत पढ़ना प्रारम्भ किया। उसने अपना जीवन इसी में लगा दिया। उसने ब्राह्मण का वेश बनाया, यज्ञोपवीत और चोटी रख ली, चन्दन का टीका लगाया और स्वयं को ब्राह्मण घोषित करके संस्कृत ज्ञान के बल पर हिन्दू धर्म की निर्बलता सिद्ध करने लगा। किन्तु इतना परिश्रम करने पर भी उसे वेद न प्राप्त हो सके।" इतने से आप समझ सकते हैं कि सैकड़ों वर्षों तक ईसाइयों ने धर्मान्तरण के अथक प्रयास किए, किन्तु कोई विशेष सफलता नहीं मिली थी। तब कुछ चालाक पादरियों ने संस्कृत सीखकर, हमारे शास्त्र पढ़कर हिन्दू धर्म के विरुद्ध लोगों को भड़काना चाहा, तब भी इच्छित सफलता उनको नहीं मिल रही थी।

यहाँ से ईसाइयों ने विचार किया कि हिन्दुओं की वेदों के प्रति बड़ी श्रद्धा है। वे इनको ईश्वरकृत मानते हैं। इन्होंने वेदों को पढ़ना-जानना प्रारम्भ किया। तब पादरी कामीट ने जो लिखा है। इसका वर्णन लाला लाजपत राय अपनी पुस्तक में करते हैं। पादरी स्कॉट लिखता है कि -  "मूर्तिपूजा के खण्डन में तो वेद ही सबसे बड़े शस्त्र हैं। हमने वेदों से ऐसे वचनों को निकाल लिया है। इनसे मूर्तिपूजा का विनाश निश्चित है।" (पादरी कामीट) "प्रत्येक हिन्दू अपने पितरों का श्राद्ध करना धर्मकृत्य समझता है, किन्तु वे यह नहीं जानते कि उनके पिता-पितामहों का तर्पण ब्रह्मयज्ञ से ही हो सकता है।" (प्रो. गोल्डस्टुकर) अब हम कोई निष्कर्ष न निकालकर पाठकों पर छोड़ते हैं। वे स्वयं अपने विवेक से विचार करें कि अंग्रेज़ों के समक्ष भारत के वैदिक आचार्यों व महापुरुषों में से कोई एक भी उदाहरण नहीं था, जिसने मूर्तिपूजा, अवतारवाद, श्राद्ध आदि विषयों का खण्डन किया हो। जिसका उदाहरण देकर वे हिंदुओं को भ्रमित कर पाते। ईसाई मत के प्रचारक यह भली-भाँति जानते थे कि इन सिद्धान्तों के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न करके ही हिन्दुओं को उनके धर्म से विमुख करके सफलता प्राप्त की जा सकती है। फिर भारत के इतिहास में स्वामी दयानन्द नामक एकमात्र ऐसे व्यक्ति सर्वप्रथम हुए, जिन्होंने वेदों के नाम पर मूर्तिपूजा, अवतारवाद, श्राद्ध आदि का बड़ा प्रबल विरोध किया। स्वामी दयानन्द किससे प्रभावित थे, पाठक स्वयं निर्णय लें। क्योंकि स्वामी दयानन्द से पूर्व वैदिक धर्म में तो कोई ऐसे विद्वान या आचार्य न रहे थे, जिन्होंने इन सबका खण्डन किया हो, इस प्रकार विरोध किया हो। क्या आप ऐसा मान सकते हैं कि स्वामी दयानन्द से पूर्व भारतवर्ष के इतिहास में कोई वेदों के विद्वान नहीं हुए थे?

स्वामी दयानन्द सनातन वैदिक धर्म के इन सिद्धान्तों को हर हाल में उखाड़ देना चाहते थे, इसलिए क्रम से वे प्रत्येक उस शास्त्र को भी अप्रमाण कहते गए, जिनमें ये सिद्धान्त हो। जैसे वह पुराणों को माना करते थे, किन्तु जब देखा कि पुराणों में ये सब सिद्धान्त हैं, तो उन्होंने पुराणों की निन्दा प्रारम्भ कर दी। आप देखें, क्या यह कार्य स्वामी दयानन्द से पूर्व किसी वैदिक आचार्य ने किया था? उत्तर है - नहीं। किन्तु अंग्रेज़ अवश्य ऐसा कर रहे थे, जैसे - प्रोफेसर गोल्डस्टुकर लिखते हैं कि - "जब कोई जाति अपने धर्माचार्यों के बहकाने से अथवा अविद्या के कारण पुराणों जैसी नवीन पुस्तकों को ईश्वरीय ज्ञान कहने लगे, तो उस जाति का घोर पतन ही होगा। जब से हिन्दुओं ने पुराणों को अपना धर्मस्रोत बताना प्रारम्भ किया है, तब से उन्होंने धर्म और समाज को नष्ट कर दिया है। _ _ कलकत्ता, बम्बई तथा बनारस से जो पत्र प्रकाशित होते हैं, उनसे पता चलता है कि पुराण और तन्त्र साहित्य कितना विषाक्त है। - ऐसा वे तभी कर सकेंगे, जब वे साहस के साथ रोग का निदान करेंगे और हिन्दुओं को इन दूषित ग्रन्थों से बचा पाएँगे।" (प्रोफेसर गोल्डस्टुकर) स्वामी दयानन्द ने पुराणों की बड़ी निन्दा की। किन्तु तब भी समस्या रही कि ब्राह्मण ग्रंथ आदि जो वेद के भाग थे उनमें यह सिद्धान्त मिला करते थे, तब स्वामी दयानन्द ने ब्राह्मण ग्रंथो को भी अप्रमाण कहकर वेद नहीं माना। किन्तु संहिताभाग में भी इन सिद्धान्तों के संकेत प्राप्त होते थे। तब सभी प्राचीन भाष्यकारों को गलत कहना प्रारम्भ किया तथा वेदसंहिताभाग की भी अपनी नई व्याख्या प्रस्तुत कर दी। लाला लाजपत राय लिखते हैं कि - "स्वामी दयानन्द ने सिद्ध कर दिया कि हिन्दुओं के ईश्वरीय ग्रन्थ वेदसंहिताएँ हैं, न कि पुराण, धर्मशास्त्र, उपनिषद् अथवा ब्राह्मण।" (पृष्ठ संख्या - 86)

ईसाई प्रचारक हिन्दुओं के आगे सिद्ध करना चाहते थे कि -  "मूर्तिपूजा मिथ्या है, अवतारवाद मिथ्या है, बहुदेववाद मिथ्या है, श्राद्ध मिथ्या है, हिन्दुओं के तीर्थ मिथ्या हैं और वेद में इन सबका कोई वर्णन नहीं है।" अर्थात् जो-जो सिद्धान्त ईसाइयों को ऐसे लग रहे थे, जिनके कारण हिन्दू अपने धर्म से जुड़े रहते थे, वे इन सभी को मिथ्या सिद्ध करना चाहते थे। किन्तु स्वयं अनेक प्रयास करने पर भी वे ऐसा सिद्ध नहीं कर पा रहे थे। क्या इसे आश्चर्यजनक संयोग मात्र माना जा सकता है जो-जो तथाकथित धर्मसुधार ईसाई प्रचारक चाहते थे, स्वामी दयानन्द केवल वही वही कर रहे थे? या ऐसा कहा जा सकता है कि स्वामी दयानन्द इनसे प्रभावित नहीं हुए थे, बल्कि खुदा ने ही इन पर यह ज्ञान नाज़िल कर दिया था कि इनको प्रमुखता से मूर्तिपूजा, अवतारवाद, श्राद्ध, बहुदेववाद , तीर्थ आदि का प्रबल खण्डन करना चाहिए तथा यह सिद्ध करना चाहिए कि शेष सब शास्त्र मिथ्या हैं, केवल वेद को ही माना जाए और यह माना जाए कि वेदों में ये सिद्धान्त नहीं हैं। इसके लिए वेदों की व्याख्या भी केवल दयानन्द की ही मानी जाए? यह सब केवल संक्षेप में लिख रहे हैं। अन्यथा ईसाई पादरियों व ईसाई बुद्धिजीवी प्रचारकों की पुस्तकों व लेखों के इतने अधिक प्रमाण हैं कि स्वामी दयानन्द जो-जो कार्य कर रहे थे, उनसे पूर्व ये ईसाई ही इन कार्यों को कर रहे थे, किन्तु उनको इच्छित सफलता नहीं मिल रही थी। स्वामी दयानन्द और अंग्रेज़ों के बीच के अनेक पत्र हैं। अंग्रेज़ों के अनेक पत्र हैं। आप पाएँगे कि अंग्रेज़ स्वामी दयानन्द को पूर्णतः सहयोग कर रहे थे। उनको सुरक्षा दी जाती थी, आर्थिक सहायता दी जाती थी। यह हिन्दू धर्माचार्यों की तो निंदा कर रहे है लेकिन  स्वामी दयानन्द की बड़ी प्रशंसा व महिमामण्डन किया करते थे। स्वामी दयानन्द के पक्ष में यह हवा बनाने में लगे रहते थे।

जैसे कि जब काशी शास्त्रार्थ हुआ था, तब "क्रिश्चियन इन्टेलिजेन्सर" नामक पत्र में दयानन्द व इनके पक्ष की बड़ी प्रशंसा की गई। इस प्रकार ईसाइयों के पत्र, जो मिशनरी कार्यों के लिए थे, उनसे पोषित पत्रों में दयानन्द स्वामी का महिमामण्डन करने का क्या तुक बनता है? आजकल अनेक लोग आर्यसमाज द्वारा फैलाए गए इस झूठ से भ्रमित हो गए हैं कि स्वामी दयानन्द अंग्रेज़ों से लड़ रहे थे, हिन्दुओं के पक्ष में ईसाइयों से लड़ रहे थे आदि-आदि। ऐसा कुछ नहीं था। अर्थात् हमारे जिन-जिन सिद्धान्तों की निन्दा ईसाई किया करते थे, हमारे जिन ग्रन्थों की निन्दा ईसाई किया करते थे, दयानन्द ने स्वयं ही इनका खण्डन किया। तब वे हिन्दुओं की ओर से कहाँ व किस प्रकार लड़ रहे थे? आजकल आर्यसमाजी कहते हैं कि सत्यार्थप्रकाश में स्वामी दयानन्द ने ईसाई मत का बड़ा भारी खण्डन किया है। उनको शायद यह पता नहीं होगा कि ये समुल्लास असली सत्यार्थप्रकाश में नहीं थे। स्वामी दयानन्द के मरने के लगभग एक वर्ष बाद ये ईसाई मत के खण्डन वाले समुल्लास सत्यार्थप्रकाश में आर्यसमाजियों द्वारा जोड़े गए। तथा भरपूर झूठ दयानन्द के विषय में इनके द्वारा फैलाए गए तथा यह स्थापित करने का प्रयास तब से अब तक जारी है कि -  "स्वामी दयानन्द से बड़ा ऋषि, महर्षि या महापुरुष भारत के इतिहास में नहीं हुआ है, ये ही सबसे महान हैं।" इसके लिए दुनियाभर की फ़र्ज़ी कहानियाँ व झूठ दयानन्दी फैलाते फिरते हैं। ईसाई प्रचारकों ने इसीलिए स्वामी दयानन्द को पूरे जीवन कोई कष्ट न होने दिया। स्वयं दयानन्द अपने भाषणों में नियमित तौर पर अंग्रेज़ों की प्रशंसा किया करते थे। उन्हौने यहाँ तक कहा हैं कि अंग्रेज़ों के कारण ही मैं सुरक्षित हूँ और खुलकर (अर्थात् जिस भाषा में चाहूँ) खण्डन कर पाता हूँ। अंग्रेज़ ईसाइयों के लिए अगर दयानन्द चुनौती होते, तो क्या वे इनकी इतनी सहायता करते? इतनी प्रशंसा करते? स्वयं विचार करें। जिन भगवान् की मूर्तियों को हिन्दुओं ने मुगलों के भीषण अत्याचार के युग में घर से बाहर नहीं निकाला था, ईसाई नाना प्रकार के षड्यन्त्र करके, छल करके भी जिन भगवान् की मूर्तियों को हिन्दुओं के घर से न निकलवा सके थे, वह कार्य दयानन्द स्वामी ने करके दिखाया था। वे जिस-जिस हिन्दू को बहका पाते, उसके घर से श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि की इन मूर्तियों को नदी में फिंकवा दिया करते थे।

यहाँ हम यह शत-प्रतिशत दावे से नहीं कह सकते कि स्वामी दयानन्द जानबूझकर ईसाइयों के एजेंट बनकर कार्य कर रहे थे, किन्तु इतना तो निर्विवादित तौर पर सैकड़ों प्रमाणों से सिद्ध है कि उनका कार्य कहीं से भी वैदिक धर्म के लिए नहीं था, हिन्दू समाज के हित में नहीं था। बल्कि सनातन वैदिक धर्म की हानि इनके द्वारा बहुत की गई व ईसाइयों को असीमित लाभ पहुँचाया गया। इस कारण अनेक लोग उस समय उनको 'अंग्रेज़ो का एजेंट' कहने लगे थे। अंग्रेज़ ईसाइयों ने कभी इनका विरोध नहीं किया, बल्कि सदैव सहयोग ही किया। दोनों एक-दूसरे की भरपूर प्रशंसा किया करते थे। यह तथ्य आर्यसमाज के साहित्य से ही हम 'अनार्योन्मूलनम्' पुस्तक में, संक्षेप में बता ही चुके हैं।

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