धर्म विशेष

"आर्य समाज" समय की आवश्यकता ------!

  आर्य समाज क्यों ---?

       भगवान कृष्ण गीता मे कहते हैं "यदा-यदाहि धर्मस्य ----- जब-जब धर्म की हानी होती है मै आता हूँ, धर्म संस्थापनार्थाय सांभावामि यूगे-यूगे---! धर्म की स्थापना हेतु ---- और वे आए बौद्ध काल मे आदि शंकर के रूप मे और वे आए ब्रिटिश काल मे ऋषि दयानन्द सरस्वती के रूप मे उन्होने देखा कि अवतारवाद की धारणा और समाज मे बिकृत पाखंड ने हिन्दू समाज को कायर बना दिया, स्वामी जी ने पूरे देश मे घूम-घूम कर अंग्रेजों के खिलाफ 1857 के क्रांति का बिगुल बजवा दिया वह क्रांति असफल हुई स्वामी जी को लगा यह कैसे हुआ उन्हे ध्यान मे आया कि इसमे ब्रंहासमाज जो चर्च के इशारे पर काम कर रहा है स्वामी जी सीधे कलकत्ता ब्रह्मासमाज के मुख्यालय पहुच गए, ब्रह्म समाज के अध्यक्ष 'केशवचंद सेन' से भेट के पश्चात एक सभा मे स्वामीजी स्वराज्य की बात की  उनका दृढ़ मत था बिना स्वराज्य के स्वधर्म बेमानी है, यह समाचार वायसराय के पास पहुचा उसने स्वामी जी के दर्शन की इक्षा प्रकट की गाड़ी भेजा पहली ही भेट मे उसके पुछने पर स्वामी जी ने स्वराज्य यानी अंग्रेजों के शासन को समाप्त करना सीधे 'वायस राय' से कहना यह स्वामी दयानन्द सरस्वती ही कह सकते थे।
सब प्रश्नो का उत्तर एक-----!
          18वीं और 19वीं सदी का समय ऐसा था कि हिंदू जाती अपना स्वाभिमान खो बैठी थी, आए दिन ईसाई और मुसलमान विधर्मियों के द्वारा सदा ही हिंदूओं की आस्थाओं पर आक्रमण होते रहते थे, जैसे गाँव के कमजोर ब्यक्ति की पत्नी पूरे गाँव की भाभी और ताकतवर ब्यक्ति की पत्नी गाँव भर की बहन हो जाती है, वैसे ही हिन्दू सनातन धर्म हो गया था इस्लाम और ईसाई मतावलंबियों ने एक से एक अश्लील पुस्तकें महापुरुषों और देवी देवताओं पर आए दिन लिखते रहते थे, हिंदूओं को नीचा दिखाना इन विधर्मियों का जैसे शौंक ही हो गया था, उस समय में इनको कोई आचार्य, माधवाचार्य, शंकराचार्य, धर्माचार्य अथवा कोई पीठाधीश्वर ने उत्तर देने का साहस नहीं किया, इन तथा-कथित धर्म के उदारवाद जिसको कायरता समझ विधर्मियों का उत्साह बढ़ता ही गया और हिंदू युवा भी विधर्मियों के द्वारा किए इन आक्षेपों के उत्तर इन धर्माचारियों से यथावत न पाकर धड़ल्ले से ईसाई, मुसलमान और नास्तिक होते जाते थे, ऐसी विकट परिस्थित में ईश्वर के प्यारे आर्यपुत्र देव दयानन्द सरस्वती ने अंगड़ाई भरी और सर्व प्रथम "सत्यार्थ प्रकाश" नामक उत्तम अमर ग्रंथ लिखकर 13वें और 14वें 'समुल्लास' में ईसाईयत और इस्लाम का खुल्ला खंडन देखकर तिलमिला उठे और तब से विधर्मियों को मूँह तोड़ उत्तर देने का सिलसिला 'आर्य समाज' के द्वारा चल पड़ा । 
आर्य समाज द्वारा मुह तोड़ जबाब------
            विधर्मियों के द्वारा ये निम्नलिखित पुस्तकें बहुत प्रचलित थीं :- • रंगीला कृष्ण • रहबरे दकन • रद्दे हिंदू  • कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी ऐसे अनेकों अश्लील और घृणात्मक पुस्तकें समय समय पर हिंदूओं को तोड़ने और नीचा दिखाने के लिए लिखी जाती रहीं, जिसका उत्तर आर्य समाजियों ने समय- समय पर देना शुरू किया, जैसे- योगेश्वर कृष्ण • हुज्जतुल इस्लाम • रद्दे इस्लाम • गीता गौरव  ऐसी अनेकों पुस्तकें प्रत्युत्तर में लिखीं और इन विधर्मियों का दिमाग ठीक करने के लिए इनके चरित्रहीन पैगम्बरों की पूरी पोल समय -समय पर आर्य समाजी खोलते रहे, एक ऐसी ही अश्लील पुस्तक मुसलमानों ने माता सीता जी के  पतिव्रता और पवित्रता की साक्षात मूरत के बारे में लिखी थी जिसका नाम था "सीता का छिनाला" । इस पुस्तक का प्रत्युत्तर देने के लिए कोई पंडा या पुरोहित या अपने आप को धर्म का ठेकेदार बोलने वाला आचार्य नहीं आया, तभी 7 भाषाओं के विद्वान आर्य समाज के धुरंधर सैनानी 'पंडित चमूपति जी' ने ही इसका उत्तर 'रंगीली रसूल' नामक पुस्तक लिखकर मुहम्मद की गंदगी और उसकी औरतखोरी की सारी पोल खोल दी, और ये ऐसा मूँहतोड़ उत्तर था कि विधर्मियों की रातों की नींद उड़ गई थी, ठीक इसी प्रकार से सैंकड़ो खंडनात्मक पुस्तकें लिखकर इन विधर्मियों का दिमाग ठिकाने पर केवल आर्य समाज ने ही लगाया हुआ है, राष्ट्र कबि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक 'संस्कृति के चार अध्याय' मे सत्य ही लिखा है की आर्य समाज हिन्दू समाज का क्षत्रित्व गुण है ।
         जिस प्रकार बौद्ध काल मे स्वामी शंकरचार्य आए उन्होने डूबते हुए हिन्दू सनातन धर्म को पुनः उसकी सार्थकता सिद्ध की उसी प्रकार स्वामी दयानन्द सरस्वती ने इस्लामिक व ब्रिटिश काल मे परिसकृत जीवंत हिन्दू दर्शन देने का काम किया आर्य समाज द्वारा तैयार किए हुए लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चांदपाल हो अथवा स्यमजी कृष्ण वर्मा, वीर सावरकर रहे हों या नेताजी सुभाष चंद बोष- हुतात्मा भगत सिंह सभी ने शंकरचार्य की राष्ट्रवादी धारा को आगे बढ़ाया, ध्यान देने योग्य बात है की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा केशव बलीराम ने भी इसी धारा इसी चिंतन और इन महापुरुषों के  चिंतन का परिमार्जित रूप ही हेड्गेवार का संघ है, जिसको यानी इस विचार केवल बढ़ाया ही नहीं तो आज सम्पूर्ण विश्व मे भारतीय महापुरुषों की वैचारिक विजय पताका फहरा रहा है, दूसरी तरफ स्वामी दयानन्द ने विधर्मी हुए हिन्दू समाज को वापस अपने हिन्दू धर्म आने का दरवाजा खोल दिया जिस कार्य को शंकरचार्य ने 3000 वर्ष पूर्व किया था उसे स्वामी जी ने ब्रिटिश काल मे आरंभ केआर नयी क्रांति पैदा कर दी, स्वामी श्रद्धानंद ने इसी कार्य को आगे बढ़ते हुए मेरठ से गाजियावाद तक के 111 गावों के बिधर्मी हुए लोगो की घर वापसी की इतना ही नहीं राजस्थान के 'मलकाना राजपूतों' की 'सवा लाख' की घर वापसी स्वामी जी को भरी पड़ी जिसमे उनकी जन चली गयी आज भी स्वामी श्रद्धानंद जी आदर्शों पर चलकर धर्म जागरण तथा आर्य समाज सहित बहुत सारे संगठन यह कार्य कर रहे हैं जिसका वास्तविक प्रेरणा श्रोत वास्तव मे आर्यसमाज की ही है ।     
 स्वामी दयानन्द सरस्वती और प्रो० मैक्समूलर:-
(1) स्वामी दयानन्द सरस्वती के जीवन चरित्र में मैक्समूलर के सम्बन्ध में उल्लेख पाया जाता है । जैसे कि – मैक्समूलर के वैदिक ज्ञान की चर्चा चलने पर स्वामी जी ने बताया कि "यह जर्मन् विद्वान् (मैक्समूलर) इस (वैदिक ज्ञान के) क्षेत्र में तो अभी बालक ही है, जब तक वेदों का कोई पारगामी विद्वान् उसका गुरु बन कर बोध नहीं करायेगा, तब तक वेदार्थ में वह पूर्ण नहीं हो सकता --? (सन्दर्भ ग्रन्थ : ‘नवजागरण का पुरोधा दयानन्द सरस्वती’, लेखक : डॉ० भवानीलाल भारतीय, प्रथम संस्करण, पृष्ठ 319)
(2) सत्यार्थ प्रकाश के 11वें समुल्लास में भी स्वामी जी ने मैक्समूलर के वेदार्थ सम्बन्धी ज्ञान के बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा है - "जो लोग कहते हैं कि - जर्मनी देश में संस्कृत विद्या का बहुत प्रचार है और जितना संस्कृत मोक्षमूलर साहब पढ़े हैं उतना कोई नहीं पढ़ा, यह बात कहने मात्र है क्योंकि "यस्मिन्देशे द्रुमो नास्ति तत्रैरण्डोऽपि द्रुमायते’' अर्थात् जिस देश में कोई वृक्ष नहीं होता उस देश में एरण्ड ही को बड़ा वृक्ष मान लेते हैं, वैसे ही यूरोप देश में संस्कृत विद्या का प्रचार न होने से जर्मन लोगों और मोक्षमूलर साहब ने थोड़ा-सा पढ़ा वही उस देश के लिये अधिक है। परन्तु आर्यावर्त्त देश की ओर देखें तो उनकी बहुत न्यून गणना है । क्योंकि मैंने जर्मनी देशनिवासी के एक प्रिन्सिपल के पत्र से जाना कि जर्मनी देश में संस्कृत चिट्ठी का अर्थ करने वाले भी बहुत कम हैं और मोक्षमूलर साहब के संस्कृत साहित्य और थोड़ी-बहुत वेद की व्याख्या देखकर मुझको विदित होता है कि मोक्षमूलर साहब ने इधर उधर आर्यावर्त्तीय लोगों की की हुई टीका देखकर कुछ -कुछ यथा तथा लिखा है। 
"विश्व बिख्यात वैदिक विद्वान 'डेविड फ्राली' (वामदेव शास्त्री) कहते हैं कि वेदों को समझने के लिए भारतीय मन की अवस्यकता है"।
                                              ------ ओम ------
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