धर्म विशेष

नेपाल----- मावोवादी और राजा दोनों क़े घृणित समझौते

        १९९९ क़ा वह वर्ष धीरे- धीरे लोकतंत्र क़ा
बिरोध, नेपाल क़ा आधार भूत ढाचा ढहाने क़ा कार्य, जगह- जगह पुलिस चौकी, स्कुल अथवा अन्य सरकारी तंत्र को नष्ट करना कुछ ऐसे भी कार्य करना जिससे जनता में मावोवादी क़े प्रति सहानुभूति हो बड़े ही सुनियोजित तरीके से चल रहा था पुलिस लड़ रही थी सेना देख रही थी राज़बादी, मावोबादी दोनों क़ा दृष्टि कोण समझ से परे था, गिरजा बाबू प्रधानमंत्री थे वे बार-बार सेना क़े उपयोग हेतु राजा से कहते लेकिन राजा ने अनुमति नहीं दी ज्ञातब्य हो की उस समय राजा वीरेन्द्र थे लेकिन सेना पर पूरी पकड़ ज्ञानेंद्र की थी, नेपाल पुलिस क़े पास कोई हथियार नहीं है गिरजा बाबू  ने उस समय सशत्र प्रहरी दल क़ा गठन किया .
       एक दिन मै अपने कार्यालय पर बैठा था चन्दन सिंह नाम क़ा कार्यकर्ता न एक पुलिस इंस्पेक्टर अपने मित्र को बुलाया पर में गोली लगी थी वह जमीन पर बैठ नहीं सकता था उस समय चर्चा में था की मावोवादी, राजा मिले हुए है उस पुलिस क़े ब्यक्ति ने बताया की आपको मावोवादी राजा क़े संबंधो क़े बारे में पता है मै कहा नहीं ,उसने एक कहा की शोल्टी होटल में ज्ञानेंद्र और बाबुराम भट्टराई दोनों एक जगह बैठे मंत्रणा करते देखे गए यह कोई और नहीं एस.पी. ने देखा उसने डी.जी.पी. को बताया डी.जी.पी.ने तुरंत शोल्टी होटल आकार दोनों को बात करते देखा ,सैल्यूट देकर चला गया, मैंने पूछा की क्या यह बात देश क़े सभी सी.डी.ओ. और एस.पी. को पता है उसने कहा की पता है पुलिस सरकार क़े पास सेना राजा क़े पास दोनों आमने -सामने थे .
         पूरे देश भर में यह चर्चा में थी आखिर प्रचंड कौन है अधिकांस लोगो को पता था की ज्ञानेंद्र ही प्रचंड तो नहीं है! सन दो हज़ार में राजा वीरेन्द्र की हत्या हो चुकी थी मावोबादी उसे भुनाने क़ा पूरा प्रयास कर रहा था, दिसा भारत क़े बिरोध में करना यह प्रयत्न, भारतीय बामपंथियो की भूमिका भी भारत बिरोधियो जैसे ही थी सीताराम एचुरी तो भारत बिरोधियो क़े नेता बन चुके थे भारत से मावोबादियो क़े नाम पर जो भी हथियार नेपाली सेना क़े पास जाता योजना बद्ध तरीके से वह मावोबादी क़े पास चला जाता .
          राजा ज्ञानेंद्र की छबि भाई क़े हत्यारे क़े रूप में प्रचारित हो चुकी थी जनता में वे घृणा क़े पात्र थे, मावोबादियो ने इसका भरपूर लाभ उठाया, राजा वीरेन्द्र तो नाम क़े राजा थे सारा कुछ ज्ञानेंद्र ही करते थे लेकिन उनकी हत्या क़े पश्चात तो ये सब कुछ हो चुके थे जनता में मैसेज जा चूका था की राजा में मावोबादी में कोइ न कोई समझौता जरुर है लेकिन यह प्रमाणित कैसे हो कुछ मामले में दोनों क़े सिद्धांत एक थे दरबार क़ा राष्ट्रबाद, मावोबादी क़ा राष्ट्रबाद दोनों भारत बिरोध पर आधारित था दोनों लोकतंत्र बिरोधी थे दोनों को जनता की समस्यायों से कोई लेना -देना नहीं था दोनों बैचारिक तानाशाही में विस्वास रखते थे, २००३ में सायद दिसंबर क महिना था एक फोन कार्यालय पर आता है कि सिलीगुड़ी या दार्जलिंग में कोई मुठभेड़ हुई है जिसमे प्रचंड, बाबुराम मारे गए इस प्रकार क़े कई फोन आने लगे मैंने पूछा कि यह समाचार कहा से आया यह इंटरनेट पर था एक घंटे बाद यह समाचार गायब था, मैंने दार्जिलिंग सिलीगुड़ी फोन करके पूछा कि कोई उधर मुठभेड़ हुई है क्या ? वहा कोई घटना नहीं हुई यानी सबकुछ मैनेज था, तब तक समाचार आग की तहर काठमांडू में फ़ैल चूका था कि दरबार में राजा ज्ञानेंद्र क़े साथ प्रचंड, बाबुराम, महरा और बादल की बैठक चल रही है दुसरे दिन 'स्पेस टाइम्स दैनिक' ने इस समाचार को फ्रंट पेज पर छापा ज्ञातब्य हो कि जमीम साह इस अख़बार क़ा मालिक ही नहीं कुख्यात डान दावुद क़ा खास ब्यक्ति था जो राजा क़े यहाँ बेरोक -टोक आता -जाता था ज्ञानेंद्र क़े उसके बहुत निकट क़े सम्बन्ध थे, बाद में एक छोटा सा खंडन भी दरबार ने दिया कि यहाँ कोई मीटिंग नहीं हुई .
        प्रचंड ने राजा को यह आश्वासन दे कर रखा था कि शासन आने पर हम आपको राजा मानकर राजतन्त्र स्वीकार करेगे यह ज्ञानेंद्र समझ नहीं पाए कि मौका पाने पर बामपंथी अपनी हर बात पर मुकर जाते है धोका और झूठ ही इनका आधार होता है ऐसा घृणित समझौता था जो जनता को आज भी समझ में नहीं आ रहा ये दोनों बैचारिक तानाशाही क़े अतरिक्त और कुछ नहीं चाहते इनका बिकाश, सुशासन से कोई सरोकार नहीं है दोनों चीन क़े पक्ष, ज्ञानेंद्र क़े समय में ही जब शेरबहादुर देउवा पी.एम्. थे खुमबहादुर खडका गृहमंत्री थे वे बीरगंज जा रहे थे सेना बैरिक में प्रचंड, बाबुराम थे उनकी गिरिफ्तरी क़ा आदेश भी दिया लेकिन एस.पी. ने ऊपर अधिकारी से पूछने क़े कारण डी.जी.पी. ने कहा [हेर्नुस यु राजा को जवाई हो ] यानी ये राजा क़ा दामाद है गिरफ़्तारी नहीं हुई सुरक्षित जाने दिया .    

2 टिप्‍पणियां

सुनील दत्त ने कहा…

बांमपंथी आतंकवादियों अच्छी खबर ली आपने

बेनामी ने कहा…

शायद आपकी ईच्छा शीघ्र पुरी होने वाली है। हो सकता है कि शीघ्र ही नेपाल के माओवादी दो घडो मे विभाजित हो जाए। हो सकता है कि एक घडा राजा से निकट हो जाए तथा एक वामपंथी धार पर चलता रहे। राजनिति मे संभावनाए अनंत रहती है, स्थितिया बदलती रहती है।

जहां तक पुरानी बातो का सवाल है। आपने ठीक कहा की नेपाल मे लोगो को यह आशंका थी कि माओवादी तथा राजा एक हैं। क्योकि माओवादी विद्रोह के कारण सिस्टम फेल हुआ तथा लोकतांत्रिक पार्टीया काम न कर पाई, फलस्वरुप राजा के शक्तिशाली बन कर सत्ता मे आने का रास्ता प्रशस्त हुआ था। राजा बिरेन्द्र की हत्या के तुरंत बाद सुप्त कांतीपुर अखबार मे बाबुराम भटटराई का लेख यह छपा जिसमे लिखा था की उनकी पार्टी तथा राजा बिरेन्द्र मे कार्यगत एकता थी। लेकिन राजा ज्ञानेन्द्र की उन्होने जम कर भर्त्सना हीं की थी। बाद मे भारत के सहयोग से लोकतांत्रिक पार्टीयो तथा माओवादीयो के बीच दिल्ली मे संझौता हुआ। ईस संझौते के कारण राजा के विरुद्ध संयुक्त जनाअन्दोलन हुआ तथा माओवादी सहित लोकतांत्रिक पार्टीया सत्ता पर स्थापित हुई।

आपने जो घटनाए बतायी है वह जगजाहिर तथा प्रमाणिक नही है। अतः उनपर विश्वास कैसे करे। वास्तव मे एक आम आदमी के लिए वास्तविकताओ को जान पाना बडा कठिन काम है। किस बात पर विश्वास करे किस पर ना करे यह निर्णय कर पाना कठिन है। ऐसे मे पृथक पृथक राजनितिक अभिष्ट वाले लोग अलग अलग किसीम से कहानिया कहते है - जिससे आदमी और ज्यादा भ्रमित हो जाता है।

वैसे आपने यह अच्छी बहस शुरु कर दी है। भारत मे हिन्दुशक्तियो के लिए यह अध्य्यन के लिए दस्तावेज का काम करेगी।