धर्म विशेष

दधीचि परंपरा की एक कड़ी थे श्रीकांत जोशी.

         
         राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शंकराचार्य व स्वामी दयानंद की तरह अपनी अलग प्रकार के सन्यास परंपरा का वाहक है हम सभी को पता है कि भारतीय परंपरा में अबिबाहित सन्यास परंपरा नहीं थी लेकिन देश-काल परिस्थित के अनुसार इस ब्यवस्था में भी परिवर्तन हुआ आदि शंकर ने अविबाहित सन्यासी निकालने कि आवश्यकता समझा तथा दयानंद सरस्वती ने भी इनका ही अवलोकन किया और हजारों सन्यासी भारत भूमि को धर्म भूमि, आर्य भूमि को वेद भूमि बनाने हेतु तैयार किये, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने वर्तमान बिकट (गुलामी) परिस्थिति में पूज्य डाक्टर केशव बलिराम ने एक अभिनव पद्धति का निर्माण किया जिसे हम प्रचारक परंपरा कहते हैं संघ में दो प्रकार कार्यकर्ता बनाने का प्रयास होता है एक गृहस्थ कार्यकर्ता जो घर पर रहना गृहस्थी बसाना दूसरा उच्च शिक्षा प्राप्त होने के पश्चात् सन्यास यानी प्रचारक ऐसे प्रचारक परंपरा के वाहक थे श्रीकांत जोशी जिनका जन्म २१ दिसंबर १९३६ को महाराष्ट्र के (कोकड़) देवरुख गाव में हुआ था खेलते-खेलते अल्प आयु ५ वर्ष में ही शाखा जाने लगे पता ही नहीं चला कि कब स्वयंसेवक बने शिक्षा पूर्ण स्नातक करने के पश्चात् १९६० में प्रचारक निकले और १९६३ में असम के तेजपुर में विभाग प्रचारक बने बाद में असम के प्रान्त प्रचारक हुए तत्कालीन सरसंघ चालक बालासाहब देवरस के सहायक के रूप में काम किये १९९७ में वे अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख बने उन्होंने वि.सं.के. प्रत्येक प्रान्त में विभिन्न भाषाओ में जागरण पत्रिकाओ को प्रारंभ किया जो आज यसस्वी होकर चल रहा है वे बड़े साहित्यकार थे हिंदी मराठी के बड़े लेखक थे उनकी ''पूर्वांचल घुसपैठ एक समस्या, एक निःशब्द आक्रमण उल्फा, तथा जम्मू कश्मीर-लद्दाख- जैसा मैंने देखा''  बहु चर्चित पुस्तके हैं.
         वे बिभिन्न समस्यों से भरपूर परिचित होकर समाधान के प्रयत्न करते थे उन्होंने नेपाल के कई बार प्रवास किये मावोबादी समस्या का अध्ययन कर समाधान दिस में रत रहे उन्होंने असम कि उग्रवादी समस्या का भी अध्ययन किया था वे जम्मूकश्मीर के प्रति चिंतित हो नेपाल कश्मीर और असम का सामान आतंक का सामान हल के प्रयास में रहते उनका मनाना था कि इन सभी का आपस में ताल-मेल है सभी भारत को खंडित करना चाहते है उनका कहना था कि कोई भी जो हथियार अथवा गन के बल पर सत्ता चाहते हैं वे लोकतंत्र में तो विस्वास करते नहीं उनकी देश के प्रति भी कोई निष्ठां नहीं होती इस नाते उनके साथ आतंकबादियों जैसा ही ब्यवहार करना चाहिए, उनको भगवान ने ८ जनवरी २०१३ को मुंबई में हमेशा के लिए विश्राम दे दिया उन्होंने ७६ वर्ष इस आर्य भूमि में क्रीडा करते-करते चले गए.
         मेरे प्रति जिन कुछ प्रचारकों का स्नेह अथवा मेरे ब्यक्तिगत जीवन में विकाश का जिनका योगदान है मा. श्रीकांत जी उनमे से अग्रगणी हैं और रहेगे उन्होंने हमारे जैसे सैकड़ो प्रचारकों के जीवन को प्रवाहमान किया वे सदैव याद किये जाते रहेगे उनको आधुनिक दधिची कहा जाय तो कम है. 

1 टिप्पणी

ZEAL ने कहा…

Dhanya hain aise Mahapurush.