धर्म विशेष

इस्लाम----------------!

       
  
  इस्लाम का दर्शन ---        
          कुछ लोग यह कहते नहीं थकते की सभी धर्म समान है (मजहब नहीं सिखाता आपस मे बैर करना) कोई भी धर्म झगड़ा नहीं सिखाता लेकिन उन पर दया तब आती है जब वे इस्लाम को धर्म और कुरान, हदीस को धर्म-ग्रंथ मानने लगते हैं या तो वे नादांन हैं अथवा अत्यधिक चालक इस विषय पर चर्चा जरूरी है क्या कुरान धार्मिक ग्रंथ है ? यदि धार्मिक ग्रंथ है तो क्या कोई भी धार्मिक पुस्तक हिंसा, हत्या और बलात्कार सिखाता है जबकि मुसलमान, कुरान और हदीस का उदाहरण देकर आज सम्पूर्ण विश्व को तबाह करने पर उतारू है, आज पूरा विश्व दो भागों में विभाजित है एक इस्लाम दूसरा काफिर, जहाँ काफिरों की हत्या जन्नत दिलाता है।
           एक मात्र अल्लाह पर विस्वास, अल्लाह किसी माता- पिता व भाई -बंधू नहीं अल्लाह और इमांन वालों के बीच रसूल मध्यस्तता करता है इनके मध्यम से पवित्र पुस्तक भेजी, इस्लाम में पैगम्बर भेजने की प्रथा ६३२ के पश्चात बंद हो गयी, अंतिम रशूल मुहम्मद को आदर्श माना जाता है उनका प्रत्येक कृत्य अनुकरणीय, अपनी अक्ल नहीं मुहम्मद की नक़ल से ब्यवहार करें, अब तक की सभी किताबें बिकृत (इस्लाम के अनुसार) होने के कारन अल्लाह ने पवित्र कुरआन भेजा । 
           कयामत का दिन-- कयामत का दिन जब आता है तो जन्नत यानी कामुक भोगवादी सुख, इस्लाम मे मनुष्य की स्वतंत्र बुद्धि नहीं अल्लाह की ईक्षा के अधीन रहती है यानि विवेक शून्य प्राणी। 
 हदीस -- मुहम्मद के जीवन का ब्यवहार कुरआन से अधिक महत्वपूर्ण है । 
 इस्लाम के पाँच स्तम्भ -- 1 कलमा, नमाज, जकात, रोज़ा, और हज । 
          इस्लाम द्वारा काल का बटवारा --- पिछला काल अंधकारमय अज्ञान मूलक, इस्लाम के पश्चात प्रकाशमय काल प्रारम्भ हुआ इस्लाम के अनुसार इस्लाम के पहले की संस्कृति का समूल नष्ट करना आवस्यक इस कारण आज विश्व की बहुत सारी संस्कृतियाँ इस्लाम अनुयायियों ने नष्ट कर दिया।
            इस्लाम द्वारा मनुष्य जाती मे बटवारा --- पहला अल्लाह के पक्षधर इमान वाले (मुस्लिम, मोमिन), दूसरा शैतान के पक्षधर गैर ईमान वाले, दोनों मे निरंतर शत्रुता, विचार आचार से अंतर बनाए रखना, ईमान और गैर ईमान वालों के लिए नीति मानक अलग-अलग है। गैर ईमान वालों के दो प्रकार एक किताबी जिसमे ईसाई, यहूदी आते हैं। दूसरा गैर किताबी जिसमे मूर्तिपूजक अथवा बहुदेव वादी जो इस्लाम मे सर्वाधिक निंदनीय माना जाता है। इस्लाम पृथबी का भी बटवारा करता है एक इस्लाम का राज्य (दारुल इस्लाम), दूसरा युद्ध राज्य यानि लड़ाई का राज्य वह स्थान जहाँ हिन्दू व अन्य धर्मावलम्बी रहते हैं (दारअल-हर्ब )इस्लाम के अनुसार पृथबी अल्लाह, पैगंबर और मुस्लिमों की है, गैर ईमान वालों को धरती पर रहने का कोई अधिकार नहीं, ''दारअल -हर्ब'' का दारुल इस्लाम मे रूपांतर धर्मांतरण करना प्रत्येक मुसलमान का पवित्र कर्तब्य है।
            जिहाद --जिहाद फी सिविल्लाह अल्लाह के मार्ग मे जिहाद, जिहाद का मतलब इस्लाम के विस्तार हेतु प्रयास, गैर ईमान वालों के बिरुद्ध छेड़ा गया निरंतर युद्ध, गैर ईमान वालों की हत्या, लूट, हिंसा, शीलहरण, मंदिरों का विध्वंश, धर्मांतरण आदि कुकृत्य यह सब इस्लाम की दृष्टि मे पुण्य का काम है, ''जिहाद कुरआन का आधार''--''तो जो कुछ गनीमत (लूट का माल) तुमने हासिल किया है उसे हालाल (उचित) और पाक (पवित्र) समझकर खावों (कुरआन 8-69-70), निश्चय ही भूमि पर चलने वाले सबसे जीव अल्लाह की दृष्टि मे वे लोग हैं जिंहोने कुफ़्र किया फिर वे फिर वे ईमान नहीं लाते यानी इस्लाम नहीं स्वीकारते'' (कुरआन 8-55), ''जो काफिर है जालिम वही है'' (कुरआन 2-254), ऐ ईमान वालों उन काफिरों से लड़ो जो तुम्हारे आस-पास हैं और चाहिए कि तुमसे सक्ती पाएँ,'' (कुरआन 9-123) ।
              इस्लाम का त्याग मृत्यु दण्ड --इस्लाम का त्याग करने वाला अल्लाह का अपमान करता है, अल्लाह के ईक्षा की अवहेलना करता है इस्लाम और उम्माह का द्रोही होता है, इसलिये इस्लामी धर्म-शास्त्र के अनुसार मृत्युदण्ड, उसकी हत्या करने वाला पुण्यवान और जन्नत पाने वाला होता है।
             इस्लाम के सिद्धान्त -- इस्लाम सर्व ब्यापी और परिपूर्ण जीवन पद्धति है, इसमे जोड़-तोड़ व बदलाव संभव नहीं है, एक मात्र अल्लाह और रसूल पर अश्रद्धा सबसे बड़ा अपराध है, पृथ्बी पर फैले अन्याय, अत्याचार, अनाचार और दुष्टता का मूल मुहम्मद मे श्रद्धा हीनता मे है श्रद्धाहीन को जड़ से उखाड़ फेकना मानव जाती पर उपकार है। इस कारण इस्लाम के साथ सीधी सादी हिन्दू जाती कैसे रह सकती है जहां इस्लाम का आधार भूत सिद्धान्त ही काफिरों की हत्या का आदेश देता हो! इस कारण कुरान अथवा हदीस के रहते हिन्दू मुस्लिम साथ नहीं रह सकते क्योंकि मखतब मदरसों मे यही पढ़ाया जा रहा है जिसका परिणाम हिन्दू समाज के त्योहारों मे विवाद खड़ा करना मंदिरों व मूर्तियों को तोड़ना लव जेहाद यानी हिन्दू लड़कियों शील भांग करना उनके लिए शबाब का काम है इस पर हिन्दू समाज को विचार करना ही होगा नहीं तो भारत भूमि भारत नहीं रहेगा कुछ और नाम होगा फिर पछताने से कुछ नहीं होने वाला।                 
          दुर्भाग्य कैसा है--------!
          मुसलमान अपने बच्चे को पैदा होते ही उसे मखतब मदरसे मे भेजता है चाहे वह आईएएस हो अथवा अन्य किसी बड़े स्थान पर भले उसके बच्चा मदरसे मे न जाता हो लेकिन किसी न किसी मुल्ला को घर पर बुलाकर अपने बच्चे को इस्लामिक शिक्षा दिलाता है यानी उसकी प्राथमिकता अपने बच्चे को मुसलमान बनाना, ऐसे ही ईसाई अपने बच्चे को ईसाई बनाता है, लेकिन दुर्भाग्य कैसा है कि हिन्दू अपने बच्चे को हिन्दू सनातन धर्म की शिक्षा न देकर उसे आईएएस, आईपीएस, पीपीएस, अध्यापक, डाक्टर, वकील ब्यापारी बनाता है, जिसमे धर्म नाम की कोई चीज नहीं रहती है और वह धीरे-धीरे वामपंथी, सेकुलर और अराष्ट्रीयता की तरफ बढ़ता है, जिसे हिन्दुत्व मे तरह- तरह की कमियाँ दिखाई देती हैं जो अनजाने मे मानवता और राष्ट्रियता का विरोध शुरू करता है यही भारत का दुर्भाग्य बनता जा रहा है।  

3 टिप्‍पणियां

बेनामी ने कहा…

इस्लाम सुधर ही नहीं सकता, यदि उसमे कुछ अच्छे लोग हैं तो उनकी इस्लाम में कोई मर्यादा नहीं वे इस्लाम में फिट नहीं हो पा रहे हैं, आतंकवाद ही उनका मजहब बन गया है . .

Vithal Vyas ने कहा…

super this i want some more about islam sir ji

सूबेदार जी पटना ने कहा…

इस्लाम और अच्छा ये संभव नहीं ये ऋष्टिकरण है भारत का अस्तित्व केवल हिन्दुत्व में है