आध्यात्मिक राष्ट्रवाद के प्रतीक महर्षि अरविंद घोष


बुधवार, 20 नवंबर 2019

यदा-यदाहि धर्मस्य

भगवान ने ''ऋग्वेद'' में कहा है कि हे आर्यो यह भूमि तुम्हारे लिए है यह भूमि तुम्हें दी गयी है "अहम भूमि मा ददामि आर्याय"। हमारे ऋषियों मुनियों ने ईश्वर आदेशानुसार मानव कल्याण ही नहीं जीव जंतु पशु पक्षियों तथा प्रकृति के संरक्षण हेतु सभी विषयों पर शोध किया क्या क्या करना? इस प्रकार का एक बृहद चिंतन करने का प्रयत्न किया चूंकि यह सब ईश्वरीय कार्य है इसी कारण सारा हिन्दू समाज उस महापुरुष में ईश्वर को देखता है, भारतीय चिंतन कुछ इस प्रकार का है कि प्रत्येक मनुष्य ईश्वरत्व को प्राप्त कर सकता है यही भारतीय संस्कृति की महानता है, भगवान श्री कृष्ण गीता में अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि जब जब धर्म की हानि होती है मैं आता हूँ और वे आये भी कभी ''शंकराचार्य'' के रूप में, कभी ''सम्राट विक्रमादित्य'' के रूप में तो कभी ''महर्षि दयानंद सरस्वती'' के रूप और इसी ब्रिटिश काल में एक बार वे फिर आये '''महर्षि अरबिंद घोष'' के रूप में हम इन्हीं ऋषि अरबिंद की चर्चा करना चाहते हैं अरबिंद का जन्म- 15 अगस्त1872को कोलकाता में  पिता-डॉ कृष्णघन -माता स्वर्णलता देवी के कोख से हुआ बंगाल प्रान्त में हुआ।


अरबिंद घोष की शिक्षा

उनके माता- पिता ब्रिटिश जैसे ही थे वे अपने बच्चे को अंग्रेज बनाना चाहते थे इसलिए अरबिंद घोष की शिक्षा दीक्षा सब मिशनरी स्कूल में, प्रारंभिक शिक्षा 5 वर्ष की आयु में 'लॉरेंट कान्वेंट' दार्जिलिंग में भर्ती कराया दो साल बाद 1879 में घोष को बड़े भाई के साथ उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया 18 वर्ष की आयु में उन्होंने 'कैम्ब्रिज' में प्रवेश लिया, परिवार में उनसे कोई बांग्ला नहीं बोलता था हिन्दू धर्म के किसी गतिविधियों में भाग लेने के लिए सख्त मनाही थी उन्हें बचपन में ही माता पिता से दूर इंग्लैंड में पढ़ने के लिए भेज दिया गया वे 'भारतीय वांग्मय' को जानते ही नहीं थे उनके परिवार के लोग इन्हें ICS बनाना चाहते थे, अरविंद पढ़ने में बड़े मेधावी छात्र थे प्रत्येक कक्षा वे प्रथम श्रेणी या सर्बोच्च स्थान प्राप्त किया करते थे, 1890 में भारतीय सिविल सर्विस की लिखित परीक्षा उत्तीर्ण कर ली लेकिन वे ICS बनकर ब्रिटिश सरकार की सेवा नहीं करना चाहते थे वे ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ थे केवल भारत को स्वतंत्र ही नहीं करना चाहते थे बल्कि भारतीय संस्कृति के अनुसार "अहम भूमि मा ददामि आर्याय" के लिए कार्य करना चाहते थे वे जानते थे यदि मैं इस परीक्षा को उत्तीर्ण करता हूँ तो 'काला अंग्रेज' बनकर भारतीयों पर शासन करना होगा यानी लंबे समय तक "मा भारती" को परकियों की गुलामी झेलनी पड़ेगी फिर वे आजादी की लड़ाई में शामिल होना मुश्किल होगा इन्हीं सारे कारणों को लेकर उन्होने तय किया कि उन्हें ICS नहीं बनाना है और उस समय इस परीक्षा के लिए घुड़सवारी अनिवार्य थीं उन्होंने जानबूझकर घुड़सवारी में फेल हो गए और 1893 में इंग्लैंड से वापस "माँ भारती" के वास्तविक पुत्र की भूमिका में आकर देश आज़ादी के लिए क्रांतिकारी आंदोलन में जुट गए।


क्रांतिकारी अरबिंद घोष

घोष भारत माता की गुलामी को लेकर बहुत ब्यथित रहने लगे यह बात ठीक है कि पारिवारिक पृष्ठभूमि न तो आध्यात्मिक थी न देशभक्ति की ही लेकिन यह देश भक्ति उन्हें ईश्वर प्रदत्त थी, उस समय तक ''लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय, बिपिनचंद पाल'' का कांग्रेस में प्रवेश हो चुका था ''ऋषि दयानंद सरस्वती'' के नेतृत्व में 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हो चुका था देश के लाखों क्रांतिकारियों की फाँसी लगातार हो रही थी ऐसे में कौन सा मन है जो शान्ति रहता वे चुप न रह सके वे शान्ति न रह सके 1902 में अहमदाबाद कांग्रेस के अधिवेशन में तिलक जी से भेंट हुई वे तिलक जी के अद्भुत क्रांतिकारी जीवन से बहुत अधिक प्रभावित हुए और दिनबदिन क्रांतिकारी आंदोलन को आगे बढ़ाने में लग गए, 1906 में नौकरी से स्थिपा देने के पश्चात ब्रिटिश सामानों व न्यायालयों के बहिष्कार करने का निर्णय लिया, प्रसिद्ध अलीपुर कांड में उनके जीवन में अद्भुत परिवर्तन आया उन्हें 1908 में एक वर्ष का सेंट्रल जेल में एकांत वास विचाराधीन कैदी के रूप में रखा गया, उसी समय उन्होंने गीता पर भाष्य लिखा और जेल में ही उन्हें भगवान के दर्शन हुआ।


शिक्षा का लक्ष्य 

'महर्षि अरविन्द' शिक्षा के बारे में स्पष्ट धरना रखते थे वे भारतीय वैदिक गुरुकुल के पक्षधर थे उन्हें ध्यान था कि १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम में भारत का गाव गाव खड़ा हो गया था केवल उत्तर प्रदेश और बिहार में बीस लाख क्रन्तिकारी मारे गए थे क्योकि सभी गावों में गुरुकुल थे भारत की साक्षरता ९० प्रतिशत से अधिक थी महार्ष उस ओर बढ़ रहे थे, अरविन्द ने मस्तिष्क की अवधारण स्पष्ट करते हुए कहा कि मस्तिष्क के विचार स्टार पर चित्त, मन, बुद्धि तथा अंतर्ज्ञान होते है  जिनका क्रमशः विकाश होता है वर्तमान शिक्षा पद्धति से अरविन्द का असंतोष  इन्ही सब कारणों से था, नैतिक शिक्षा के लिए महर्षि गुरुकुल परंपरा के पक्षधर थे जिसमें गुरु, शिष्य का मित्र, पता प्रदर्शक तथा प्राचीन महापुरुषों के उदहारण द्वारा विद्यार्थियों को के नैतिक शिक्षा के विकाश हेतु प्रेरित कर सकें ।

आध्यात्मिक राष्ट्रवाद

1893 में जब वे इंग्लैंड से भारत लौटे तो बडौदा के राजकीय विद्यालय में उप प्रधानाचार्य पद पर उनकी नियुक्ति हुई उन्हें 750 रू प्रति माह वेतन मिलता था, बडौदा महराज कि सेना का क्रन्तिकारी प्रशिक्षण भी देते थे, 1893 से लेकर 1906 तक उन्होने भारतीय वांग्मय का अध्ययन करने में लगाया बड़ौदा महराज ने उन्हें सम्मानित किया वे उन्हें बहुत चाहने लगे, अरबिंद घोष ने वंदेमातरम नाम की पत्रिका का प्रकाशन अंग्रेजी में शुरू किया, इतने से ही उनका मन नहीं भरा वे तो "वयं राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहिता" के लिए तैयार हो रहे थे उनका मानना था कि भारत पुरातन राष्ट्र है और आध्यात्मिक राष्ट्र है भारत के प्रत्येक ब्यक्ति को जगाना है तो धर्म के आधार पर ही जगाया जा सकता है उन्होंने जेल में प्राणायाम व ध्यान का अभ्यास किया गीता भाष्य किया, उन्होंने ब्रिटिश शासन का त्याग कर कोलकाता से पॉन्डचेरी चले गए जहाँ फ्रांसीसियों का शासन था उन्होंने अखंड भारत का चित्र बनाकर भारतमाता की साधना शुरू कर दी यानी वेद, उपनिषद, ब्राह्मण ग्रंथों के अध्ययन आवश्यकता अनुसार देश काल परिस्थितियों के आधार पर भाष्य करना ऐसी लौ जलाना जो अनंत काल तक जलती रहे आज भी केवल पांडीचेरी में ही लौ नहीं जल रही बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों विदेशों में यह आध्यात्मिक राष्ट्रवाद अलख जगा रहा है, उन्होंने सावित्री नाम का ग्रंथ लिखा जो महाभारत पर आधारित है महाभारत यानी क्या है ? वास्तविकता यह है कि भारतीय वांग्मय में चाहे भागवत पुराण हो, महाभारत हो, वेदांत अथवा ब्राम्हण ग्रंथ सभी के अंदर सम्पूर्ण भारत वर्ष की "चिति" महापुरुषों, नदियों, पर्वतों व वनस्पतियों का वर्णन है सभी भारतीय धार्मिक अनुष्ठान द्वारा भारत की कथा सुनकर आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की गंगा में गोता लगाते हैं यही है अरविंद का "आध्यात्मिक राष्ट्रवाद", वे "भारतमाता" को जीती जागती "दशप्रहर धारणीदुर्गा" मानते थे उन्हें खंडित भारत स्वीकार नहीं था वे देश के विभाजन को स्वीकार नहीं कर पाए और 5 दिसंबर 1950 को अपने इस भौतिक शरीर को त्याग दिया।


बिना श्रीमा के मिशन अधुरा 

''महर्षि अरविद'' की एक अनन्य शिष्या जो आयरिश कन्या थी जिन्हें ''श्रीमा'' के नामसे सभी जानते हैं योगी से प्रभावित थी महर्षि के न रहने के बावजूद भी इस मिशन को आगे बढ़ने में अहम् योगदान रहा 'महर्षि अरविन्द' की १५०वि वर्षगाठ मनाई जा रही थी तत्कालीन प्रधनमंत्री ''श्रीमती इन्द्रा गांधी'' ने श्रीमा से कहा कि यदि वे अखंड भारत का नक्षा हटा ले तो उन्हें बड़ी धनराशी शताब्दी मनाने के लिए दी जाएगी श्रीमा ने यह कहते हुए मना कर दिया कि अखंड भारत महर्षि का पूजा मंदिर है जिसे न तो खंडित किया जा सकता है न ही हटाया जा सकता है आज भी ''पांडचेरी'' के 'आश्रम' में ''महर्षि अरविन्द'' द्वारा ''अखंड भारत'' का बना हुआ है जिसकी पूजा आज भी हो रही वह 'अखंड भारत' आज इस बात का इंतजार कर रहा है कि कब महर्षि की पूजा साकार होगी ।
श्रीमा----
श्रीअरबिंद ने वाह्य कार्य का दायित्व मुझे दे दिया था क्योंकि वे अतिमानसिक चेतना की अभिव्यक्ति को तीव्र करने के उद्देश्य से एकाग्र होने के लिएएकांत में जाना चाहते थे तथा उन्होंने वहां उपस्थित कुछ लोगों को यह घोषित कर दिया था कि वे उन्हें सहायता तथा मार्गदर्शन करने का कार्य मुझे सौप रहे हैं और यह कि मैं उनके संपर्क में रहूंगी, स्वभावतः तथा यह कि वे मेरे माध्यम से कार्य करेंगे।
श्रीअरविंद---
पहले कोई आश्रम नहीं था, केवल कुछ लोग श्रीअरविंद के निकट रहने तथा योग के अभ्यास के लिए आये। श्रीमा के जापान से आने के केवल कुछ दिन बाद ही इसने आश्रम का आकार ग्रहण किया, उन साधकों की इक्षा के कारण अधिक जो अपने सम्पूर्ण आंतरिक और बाह्य जीवन का भार श्रीमा को सौंप देना चाहते थे अपेक्षाकृत इसके कि श्रीमा या श्रीअरविंद का कोई अभिप्राय या उनकी योजना हो।

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