विजयी पोरस और हारा हुआ सिकंदर (ईसा पूर्व 315-21)

सम्राट_पौरस_-_सिकंदर_युद्ध 

मकदूनिया में स्त्रियों को कतार बद्ध खड़ा कर दिया गया सौंदर्य - कमयिता के इस प्रदर्शन में जो सबसे खूबसूरत होगी उसे यूनान के शासक सिकंदर को दिया जायेगा बाकी सैनिकों को बाँट दिया जायेगा। पर्शिया कि इस हार ने एशिया के द्वार खोल दिया भागते पर्शियन शासकों का पीछा करते हुये सिकंदर हिंदुकुश तक पहुँच गया चरवाहों, गुप्तचरों ने सूचना दी इसके पार एक महान सभ्यता है। धन धान्य से भरपूर  सन्यासियों, आचार्यों, गुरूकुलों, योद्धाओं, किसानों से विभूषित सभ्यता जो अभी तक अविजित है। सिकंदर ने जिसके पास अरबी, फ़रिशर्मिंन घोड़ों से सुसज्जित सेना थी ने भारत पर आक्रमण का आदेश दिया, झेलम के तट पर उसने पड़ाव डाल दिया आधीनता का आदेश दिया ।

सम्राट पोरस का काल ईसा पूर्व340 से 317 माना जाता है, यह पुरूवास वंश का या कुछ इतिहासकार इसे पुरु वंश का भी मानते हैं। प्राचीन संस्कृति ग्रंथ मुद्राराक्षस में इसे पर्वतेश्वर लिखा है और यही पोरस है, सिकंदर के पास पचास हजार पैदल, सात हजार घुड़सवार सैनिक थे और पोरसके पास बीस हजार पैदल4हजार घुड़सवार, चार हजार रथ और हज़ारों हाथी की सेना थी।

महाराज पोरस की राज सभा 

गुप्तचरों ने सूचना दी आधे विश्व को परास्त कर देने वाला यूनान का सम्राट अलक्क्षेन्द्र भारत विजय हेतु सीमा पर पड़ाव डाल दिया । महामंत्री का प्रस्ताव था ; राजन तक्षशिला के आम्भीक ने आधीनता स्वीकार कर ली है यह विश्व विजेता है , भारत के सभी महाजनपदों से वार्ता करके ही कोई उचित निर्णय ले । महाराज पोरस जो सात फिट लंबे थे जिनकी भुजाओं में इतना बल था कि सौ बलशाली योद्धा एक साथ युद्ध करने का साहस नहीं कर सकते थे ! सम्राट ने महामंत्री को फटकार लगाई हम भारत के सीमांत क्षेत्र के शासक है यदि हम ही पराजय स्वीकार कर लिये तो भारत कैसे सुरक्षित रहेगा। अपने पुत्र को सिकंदर की शक्ति पता करने भेजेते है । साहसी पुत्र ने सिकंदर पर हमला कर दिया  23 वर्ष कि अवस्था में वीर बालक युद्ध भूमि में मारा गया। इस समाचार से महाराज पोरस विचलित नहीं हुये। उन्होंने सेनापति को झेलम तट पर पड़ाव का आदेश दिया यूनानी सैनिक इतनी छोटी सेना देखकर हैरान थे । 21 दिन की प्रतीक्षा के बाद सिंकदर ने पोरस की सेना पर हमला कर दिया अनुपात में कम क्षत्रिय हारने का नाम नहीं ले रहे थे ।

पोरस युद्ध मैदान में 

सेनापति महाराज पोरस को सूचना देता है ! सिकंदर तेज घोड़ों और बारूद के सामने क्षत्रिय योद्धा वीरगति को पा रहे है, शिवभक्त पोरस महादेव कि आराधना कर रहे थे पोरस ने दोपहर तक सिकंदर को रोक रखने का आदेश दिया ! दोपहर तक पोरस की आधी से अधिक सेना खत्म हो चूंकि थी यूनानी सैनिक जीत के जश्न में डूबने वाले ही थे ! तभी पूर्व से भगवा पताका से आसमान लाल हो गया, हर हर महादेव के शंखनाद से पृथ्वी कांप उठी झेलम का पानी उफान मारने लगा जैसे अपने राजा का चरण छूने को व्याकुल हो ! 10 हजार हाथियों से घिरे महाराज पोरस ऐसे लग रहे थे हाथी के उपर कोई सिंह युद्ध करने को आ रहा है बची सेना अपने राजा को देखकर पागल हो गई । सिकंदर अपने अभियान में बहुत से बड़े योद्धा को पराजित किया था लेकिन ऐसा दृश्य उसने व उसके सैनिकों ने कभी नहीं देखा था!

 क्या कोई व्यक्ति इतना भी विशाल और गर्वित हो सकता है ?

पोरस के एक संकेत पर हाथियों पर सुसज्जित योद्धा टूट पड़े यूनानी सैनिक मूली तरह काट दिये जा रहे थे हाथियों ने सैनिकों को फाड़ दिया । लेकिन महाराज पोरस कि निगाह कुछ और खोज रही थी उस दुष्ट को जिसने भारत से गद्दारी की थी आम्भीक को जैसे ही वह सामने से निकला पोरस ने बरछी फेंक कर मारा लेकिन आम्भीक सिकंदर के सेनापति की आड़ में छुप गया सेनापति का शरीर छलनी हो गया । पोरस ने अपने भाले से एक यूनानी के घोड़े पर वार किया उस घोड़े के चार खंड हो गये, सिकंदर समझ गया जब तक पोरस युद्ध भूमि है भारतीय सेना को हराया नहीं जा सकता । अभी भी यूनानी सैनिकों की संख्या पोरस के सैनिकों से अधिक थी लेकिन जिस तरह पोरस भीष्म कि तरह काट रहे है चारो तरफ भय का वातावरण है। सिकंदर ने सुनिश्चित किया अब पोरस को ही मारना होगा अपने विश्वसनीय घोड़े और 20 योद्धाओं के साथ सिकंदर पोरस की तरफ बढ़ा। अपने राजा की सुरक्षा में भारतीय सैनिकों ने मोर्चा संभाल लिया 20 में से 10 यूनानी योद्धा मार दिये गये लेकिन सिकंदर - पोरस की ओर बढ़ता ही जा रहा था ।

अब सिकंदर और पोरस आमने सामने थे! उपर महादेव अपने भक्त की वीरता देख रहे थे हाथी के हौदे से एक बिजली चमकी जैसे लगा शिव का त्रिशूल हो ! महाराज पोरस अपने भाले का संधान कर चुकें थे, भाला सिकंदर की ओर बढ़ा चला आ रहा था, घोड़े ने स्वामी भक्ति दिखाई वह भाले के सामने आ गया , चीरता भाला घोड़े के टुकड़े टुकड़े कर दिया, घायल - मूर्छित सिकंदर जमीन पर गिर पड़ा। उसने पहली बार खुले में आसमान देखा था घायल सिकंदर को लेकर उसके योद्धा शिविर की तरफ भागे। इधर झेलम का उफान थम सा गया! अपने राजा के चरणों को छूकर झेलम थम गई वापस सामान्य वेग से बहने लगी आखिर क्यों न उन्हें गर्व हो आज उनके सम्राट ने विश्व विजेता को पराजित किया है । ( स्रोत -प्लुकार्ड , पर्शियन इतिहासकार )

पोरस या पोरोस, पौरों का राजा था। इनका क्षेत्र हाइडस्पेश (झेलम) और एसीसेंस (चिनाब) के बीच था जो कि अब पंजाब का क्षेत्र है। पोरस ने हाइडस्पेश की लड़ाई में अलेक्जेंडर ग्रेट के साथ लड़ाई की। पोरस का साम्राज्य विशालकाय था। महाराजा पोरस सिन्ध-पंजाब सहित एक बहुत बड़े भू-भाग के स्वामी थे। पोरस का साम्राज्य जेहलम (झेलम) और चिनाब नदियों के बीच स्थित था। ‘पोरस अपनी बहादुरी के लिए विख्यात था। उसने उन सभी के समर्थन से अपने साम्राज्य का निर्माण किया था जिन्होंने खुखरायनों पर उसके नेतृत्व को स्वीकार कर लिया था। जब सिकंदर हिन्दुस्तान आया और जेहलम (झेलम) के समीप पोरस के साथ उसका संघर्ष हुआ, तब पोरस को खुखरायनों का भरपूर समर्थन मिला था। इस तरह पोरस, उनका शक्तिशाली नेता बन गया। -आईपी आनंद थापर (ए क्रूसेडर्स सेंचुरी : इन परस्यूट ऑफ एथिकल वेल्यूज/केडब्ल्यू प्रकाशन से प्रकाशित)

सिन्धु और झेलम : 

सिन्धु और झेलम को पार किए बगैर पोरस के राज्य में पैर रखना मुश्किल था। राजा पोरस अपने क्षेत्र की प्राकृतिक स्थिति, भूगोल और झेलम नदी की प्रकृति से अच्छी तरह जानकर थे। महाराजा पोरस सिन्ध-पंजाब सहित एक बहुत बड़े भू-भाग के स्वामी थे। पुरु ने इस बात का पता लगाने की कोशिश नहीं की कि यवन सेना की शक्ति का रहस्य क्या है? यवन सेना का मुख्य बल उसके द्रुतगामी अश्वारोही तथा घोड़ों पर सवार फुर्तीले तीरंदाज थे। इतिहासकार मानते हैं‍ कि पुरु को अपनी वीरता और हस्तिसेना पर विश्वास था लेकिन उसने अलेक्जेंडर द ग्रेट को झेलम नदी पार करने से नहीं रोका और यही उसकी भूल थी। लेकिन इतिहासकार यह नहीं जानते कि झेलम नदी के इस पार आने के बाद 'अलेक्जेंडर' बुरी तरह फंस गया था, क्योंकि नदी पार करने के बाद नदी में बाढ़ आ गई थी। जब अलेक्जेंडर द ग्रेट ने आक्रमण किया तो उसका गांधार-तक्षशिला के राजा आम्भी ने स्वागत किया और आम्भी ने सिकंदर की गुप्त रूप से सहायता की। आम्भी राजा पोरस को अपना दुश्मन समझता था। सिकंदर ने पोरस के पास एक संदेश भिजवाया जिसमें उसने पोरस से सिकंदर के समक्ष समर्पण करने की बात लिखी थी, लेकिन पोरस ने तब अलेक्जेंडर द ग्रेट की अधीनता स्वीकार नहीं की।

जासूसों और धूर्तता के बल पर 'अलेक्जेंडर' के सरदार युद्ध जीतने के प्रति पूर्णतः विश्वस्त थे। राजा पुरु के शत्रु लालची आम्भी की सेना लेकर अलेक्जेंडर ने झेलम पार की। राजा पुरु जिसको स्वयं यवनी '7 फुट' से ऊपर का बताते हैं, अपनी शक्तिशाली गजसेना के साथ यवनी सेना पर टूट पड़े। पोरस की हस्ती सेना ने यूनानियों का जिस भयंकर रूप से संहार किया था उससे सिकंदर और उसके सैनिक आतंकित हो उठे थे। भारतीयों के पास विदेशी को मार भगाने की हर नागरिक के हठ, शक्तिशाली गजसेना के अलावा कुछ अनदेखे हथियार भी थे जैसे सातफुटा भाला जिससे एक ही सैनिक कई-कई शत्रु सैनिकों और घोड़े सहित घुड़सवार सैनिकों भी मार गिरा सकता था। इस युद्ध में पहले दिन ही सिकंदर की सेना को जमकर टक्कर मिली। सिकंदर की सेना के कई वीर सैनिक हताहत हुए। यवनी सरदारों के भयाक्रांत होने के बावजूद सिकंदर अपने हठ पर अड़ा रहा और अपनी विशिष्ट अंगरक्षक एवं अंत: प्रतिरक्षा टुकड़ी को लेकर वो बीच युद्ध क्षेत्र में घुस गया। कोई भी भारतीय सेनापति हाथियों पर होने के कारण उन तक कोई खतरा नहीं हो सकता था, राजा की तो बात बहुत दूर है। राजा पुरु के भाई अमर ने सिकंदर के घोड़े बुकिफाइलस (संस्कृत-भवकपाली) को अपने भाले से मार डाला और सिकंदर को जमीन पर गिरा दिया। ऐसा यूनानी सेना ने अपने सारे युद्धकाल में कभी ऐसा होते हुए नहीं देखा था। सिकंदर जमीन पर गिरा तो सामने राजा पुरु तलवार लिए खड़ा था। सिकंदर बस पलभर का मेहमान था कि तभी राजा पुरु ठिठक गया। यह डर नहीं था, शायद यह आर्य राजा का क्षात्र धर्म था, बहरहाल तभी सिकंदर के अंगरक्षक उसे तेजी से वहां से भगा ले गए।

सिकंदर क्यों वापस लौटा--?

कई भारतीय इतिहासकार दावा करते हैं कि सिकंदर और पोरस युद्ध में सिकंदर की बुरी तरह पराजय हुई जिसके कारण उसे वापस जाना पड़ा। मुद्राराक्षस में घनानंद के विरुद्ध पोरस ने चंद्रगुप्त मौर्य का साथ दिया था यह कोई और राजा न होकर पोरस ही था जिसका कार्य काल ईसा पूर्व340 से ईसा पूर्व 315 माना जाता है। इतिहासकार कार्तिकेय लिखता है कि सिकंदर झेलम नदी के दूसरी ओर पड़ाव डाले हुए था। सिकंदर की सेना का एक भाग झेलम नदी के एक द्वीप पर जा पहुची, सम्राट पुरु के सैनिक उस द्वीप पर पहुंच गए और उन्होंने यूनानी सैनिकों के अग्रिम दल पर हमला कर बहुत सारे यूनानी सैनिकों को मार दिया बचे खुचे भागे अथवा डूब गए। एरियन लिखता है कि भारतीय युवराज ने अकेले सिकंदर के घेरे में घुस कर सिकंदर को घायल कर दिया और उसके घोड़े को मार गिराया। फिर कार्तिकेय लिखता है कि पशुओं ने घोर आतंक पैदा कर दिया उनके भीषण चीत्कार से सिकंदर के घोड़े भाग खड़े हुए। डियोडार लिखता है कि पोरस के हाथियों में बहुत बल था अपने पैरों तले बहुत से युनानी सैनिकों को कुचल डाला। 

भाई अमर--!

राजा की बात तो दूर पुरु के भाई अमर ने सिकंदर के घोड़े को अपने भाले से मार डाला और सिकंदर को जमीन पर गिरा दिया। ऐसा दृश्य युनानी सैनिकों ने अपने युद्ध काल में  कभी नहीं देखा था सिकंदर जब जमीन पर गिरा तो पोरसतलवार लेकर वहीं खड़ा था सिकंदर पल भर का मेहमान था। तभी राजा पोरस ठिठक गया यह डर नहीं था बल्कि आर्य राजा का क्षात्रधर्म था। तभी सिकंदर के अंग रक्षक उसे तेजी से लेकर भागे, इस युद्ध से सिकंदर की सेना का मनोबल टूट गया इसलिए सिकंदर ने वापस जाने का फैसला किया।

इथोपिया महाकाब्य 

इथोपिया महाकब्यों में बैज लिखता है कि झेलम युद्ध में सिकंदर की अश्वसेना का अधिकांश भाग मारा गया। सिकंदर ने अनुभव किया कि यदि मैं लड़ाई आगे जारी रखूंगा तो पूर्ण रूप से अपना नाश कर लूंगा। अतः उसने पुरु से युद्ध बंद करने का निवेदन किया। भारतीय परंपरा के अनुसार सम्राट पुरु ने सिकंदर का वध नहीं किया। तत्पश्चात सन्धि पर हस्ताक्षर किए गए।।
इन सभी इतिहासकारों व तर्को से यह सिद्ध होता है कि सम्राट पोरस की विजय हुई थी, कुछ भारतीय बामपंथी व पश्चिमी इतिहासकारों ने यह मिथक गढ़ा की सिकंदर विजयी हुआ वास्तविकता यह है कि कोई भी विजयी राजा वापस क्यों जाएगा। विश्व विजय करने के लिए आने वाले को उसके देश ने अपनी खीझ मिटाने के लिए यह मिथक गढ़ा की सिकंदर की सेना थक गई थी उसने लड़ने से मना कर दिया था लेकिन वास्तविकता कुछ और ही निकाल कर आ रही है।।
प्रसिद्ध इतिहासकार भगवतदत्त शर्मा लिखते हैं कि वास्तविकता यह है कि पोरस सिकंदर के युद्ध में किसी की पराजय नहीं हुई वे लिखते हैं कि यूरोपियन इतिहासकार प्लूटार्क लिखता है कि सिकंदर को आत्म-श्लाघा का रोग था, इसी कारण सिकंदर बहुधा अपनी झूठी प्रसंशा करवाता था। जब दोनों सेनाये थक कर अपनी अपनी शिविरों में चली गईं। सिकंदर ने अनुनय विनय करके पोरस से मित्रता संधि कर लिया। कहाँ सिकंदर और कहाँ भारतीय सीमा का छोटा सा राजा पोरस से उसे नीचा देखना पड़ा। आगे पग पग पर अवरोध, गंगाजी के पास दो राजा सिकंदर के मुकाबले के लिए खड़े थे जब सिकंदर की सेना ने यह समाचार सुना तो उसके होश उड़ गए और सिकन्दर ने वापस जाने का फैसला कर लिया।।
और भारतीय ब्राह्मण
सिकन्दर के गुरू की आज्ञा थी कि भारत से कोई विद्वान ब्राह्मण अपने साथ लेकर आये, सिकंदर सुना था कि ब्राह्मण शब्द को ही ईश्वर मानते हैं वस्तुतः ऐसे ब्रम्हावादी थे। ब्राह्मणों ने कहा कि हमारे बीच एक संत दंडी स्वामी हैं उसका घर जंगल में है, वह परम शांत है, जंगल के जल और कंदमूल पर उसका निर्वाहन है।सेनाध्यक्ष स्वामी के पास पहुंचा और स्वामी से कहा---! "हे ब्राह्मणों के आचार्य, तुम्हें राजा सिकन्दर जो धु:देव पुत्र है और जो सब मनुष्यों का अधिपति है तुमको बुलाया है यदि तुम उसकी बात मान लोगे तो बहुत सारी भेंट देगा, यदि तुम इनकार करते हो तो तुम्हारा सिर कटवा लेगा।" पर स्वामी ने अपना पत्र शैया से सर भी नहीं हिलाया उसने घृणा पूर्वक देखा उत्तर दिया! "ईश्वर राजाओं का अधिराज, कभी पाप का भागी नहीं होता वह प्रकाश शान्ति जल जीवन मानव और आत्माओं का जन्म दाता है। सिकंदर उसको धमका सकता है जो धन चाहता है अथवा मृत्यु से भय खाता है। मैं इन दोनों को त्याज्य मानता हूँ जाकर सिकंदर से कह दो दंडी स्वामी उससे कुछ नहीं चाहता, यदि उसे कुछ चाहिए तो उसे मेरे पास आना होगा।" यह आर्य ब्राह्मण का देदीप्यमान अनुपम उदाहरण है। जब दुभाषिए ने यह बात उसे समझाया तो सिकन्दर को स्वामी से मिलने की उत्कट इक्षा हुई। क्योंकि जिसने बहुत से जातियों को पराजित किया हो उसकी एक बृद्ध नग्न ब्राह्मण के सामने पराजय थी। दंडी स्वामी से टक्कर लेने में सिकन्दर से बहुत बड़ा साबित सिद्ध हुआ।
( यह लेख बहुत सारे स्वदेशी - विदेशी इतिहासकारों के लेख व शोध पर आधारित है ) 

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