सनातन धर्म के रक्षक आचार्य कुमारिल भट्ट


लक्ष्य आधारित जीवन 

कुमारिल भट्ट केवल एक मनुष्य नहीं, केवल चिंतक नहीं, केवल हिंदू धर्म रक्षक ही नहीं, वे केवल मीमांसादर्शन के महान दार्शनिक आचार्य ही नहीं बल्कि वे सम्पूर्ण हिंदू समाज अथवा सनातन धर्म को संगठित करने एक सूत्र में पिरोने वैदिक काल के वैदिक धर्म के वैभव को पुनर्स्थापित करने वाले आचार्य थे। वे भारतीय राष्ट्रीयता की आत्मा थे, उन्होंने आदि शंकराचार्य का मार्गदर्शन ही नहीं किया बल्कि वे ऋषि ऋचिक, अगस्त, याज्ञवल्क्य के उत्तराधिकारी भी हैं। वे शास्त्रार्थ के जनक भी हैं यदि यह कहा जाय कि जो राजा विदेह जनक के दरबार में शास्त्रार्थ हुआ जिसे हम उपनिषद कहते हैं जो विश्व का सर्वोत्तम ज्ञान है आचार्य कुमारिल उसके भी उत्तराधिकारी हैं। उन्होंने भारतीय संस्कृति सनातन धर्म और भारतीय राष्ट्रीयता की पुनर्स्थापना हेतु नास्तिक बौद्ध, जैनियों को वैचारिक धरातल पर पराजित कर पुनः वैदिक धर्म का परचम लहराया उन्हीं के विचारों को आगे बढ़ाने का कार्य आदि शंकराचार्य ने किया। कहते हैं कि आदि शंकराचार्य कुमारिल को गुरु स्थान पर रखते थे। इसलिए कुमारिल के अंदर जो आत्मा थी वह भारतीय संस्कृति ही थी और कुछ भी नहीं।

कुमारिल भट्ट का जन्म स्थान

आचार्य कुमारिल के जन्म स्थान के बारे में विभिन्न विद्वानों का विभिन्न मत है, एक मत के अनुसार आचार्य कुमारिल दक्षिण भारत के रहने वाले थे तिब्बती विद्वान तारानाथ, पी वी काणे, ए सी बर्नेल आदि विद्वानों का मत है कि वे दक्षिण भारत के रहने वाले थे। आनंदगिरि और सालिकराम मिश्र आदि विद्वान उन्हें उत्तर भारत का मानते हैं लेकिन इतनी बात सत्य है कि उनका गुरुकुल मध्यप्रदेश के मंडला में था जहाँ मंडन मिश्र की शिक्षा दीक्षा हुई थी। कुछ का मत है कि आचार्य कुमारिल का जन्म आन्ध्र-उत्कल के संगम यानी सीमा महानदी के किनारे पर जयमंगल नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता कृष्णायजुर्वेदीय शाखा से संबंधित थे। उनके पिता का नाम यज्ञेश्वर और माता चंद्रगुणा थीं। डॉ पांडुरंग काणे आचार्य कुमारिल को दक्षिण भारत का निवासी मानते हैं क्योंकि उन्होंने तंत्रवार्तिक में दक्षिण भारत की भाषा का प्रयोग कई स्थानों पर किया है। आनंदगिरि का मत है कि आचार्य कुमारिल भट्ट उत्तर भारत के निवासी थे, उन्होंने अपने ग्रंथ शंकरदिग्विजय (पृ180) में लिखा है कि भट्टाचार्य यानी कुमारिल भट्ट ने उत्तर देश से आकर दुष्ट मतावलम्बी जैनों तथा बौद्धों को अच्छी तरह पराजित किया। उदग्देश से अभिप्राय कश्मीर तथा पंजाब समझा जाता है अतः इस उल्लेख से पता चलता है कि आचार्य कुमारिल भट्ट उत्तर भारत के रहने वाले थे।

"मिमांसादर्शन के सर्व श्रेष्ठ लेखक और प्रतिपादक शालिकनाथ का मत है कि कुमारिल भट्ट उत्तर भारत के निवासी थे। उन्होंने आचार्य कुमारिल भट्ट के नाम का उल्लेख वार्तिकार मिश्र के रूप में किया है शालिकनाथ का मत है कि मिस्र की उपाधि उत्तरी भारत के ब्राह्मण धारण करते हैं इससे पता चलता है कि आचार्य कुमारिल उत्तर भारत के रहने वाले होगें।" मिथिला की जनश्रुति है कि आचार्य कुमारिल भट्ट मैथिल ब्राह्मण थे। माधवाचार्य और आनंदगिरि ने कुमारिल के शिष्य मंडन मिश्र को मिथिला का निवासी बताया है जिसके आधार पर भी कुमारिल भट्ट का उत्तर भारत के रहने वाले सिद्ध होता है। शंकरदिग्विजय में उद्धरित उदक देश का अर्थ बिहार राज्य में स्थित मिथिला से हो सकता है अतः आचार्य कुमारिल भट्ट वर्तमान के बिहार प्रान्त के निवासी हो सकते हैं।

कुमारिल भट्ट का समय

जब भी हम आचार्य कुमारिल भट्ट की चर्चा करते हैं तो बिना आदि जगद्गुरु शंकराचार्य के पूरी नहीं होती वे एक दूसरे के पूरक दिखाई देते हैं तो दोनों का सम कालीन होना स्वाभाविक है इसमें कोई भी मतभेद नहीं हो सकता। क्योंकि आचार्य कुमारिल भट्ट और शंकराचार्य का साक्षात्कार मिलन हुआ था यह प्रसिद्ध है। शंकरदिग्विजय में अनेक स्थानों पर आचार्य कुमारिल भट्ट और आदि शंकराचार्य के संबंध में प्रकाश डाला गया है। आचार्य शंकर का काल भारतीय इतिहास में निर्विवाद है शंकर मठों में जो गुरू परम्परायें आज तक सुरक्षित है उनके अनुसार शंकराचार्य का जन्म वि.सं. से 452 वर्ष पूर्व है। इसलिए यह सिद्ध होता है कि आचार्य शंकर और आचार्य कुमारिल का काल एक ही है। बौद्ध दार्शनिक धर्मकीर्ति, धर्मपाल का कार्य काल 500 ईसापूर्व माना जाता है अतः आचार्य कुमारिल भट्ट की भी स्थिति यही हो सकता है।

गृहस्थ जीवन

आचार्य कुमारिल भट्ट के गृहस्थ जीवन के बारे में विस्तृत जानकारी नहीं मिल पाती है तिब्बती साहित्यों में वर्णन है कि कुमारिल के पास बहुत संपत्ति थी। वे धन धान्य से संपन्न गृहस्थ थे तत्कालीन राजा ने उन्हें बहुत सी संपत्ति दी थी इनके पास पर्याप्त धान के खेत थे पर्याप्त सेवक थे जो कृषि में सहायक होते थे। आचार्य कुमारिल सन्यासी नहीं थे पारिवारिक जीवन ब्यतीत करते थे। इनके जयमिश्र नामक पुत्र भी था जैन और बौधों को शास्त्रार्थ में पराजित करने वैदिक धर्म की स्थापना करने इत्यादि विषय के अलावा बहुत कुछ इनके पारिवारिक जीवन से संबंधित नहीं मिलता।

अध्ययन  व भाषा विज्ञानी

आचार्य कुमारिल भट्ट संस्कृत भाषा के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषा जानते थे संस्कृत भाषा पर तो उनका पूर्ण अधिकार था, उन्होंने तंत्रवार्तिक में लिखा--

 ''किमुत यानि प्रसिद्धापभ्रष्ट देशभाषाभ्योपि आपभ्रष्टतरा भक्खवे इत्येवमादिनी, द्वीतियाबहुबचनस्थाने ह्रोकारान्त प्रकृतं।''

उक्त बातों से पता चलता है कि आचार्य कुमारिल भट्ट भाषाओं के सम्बंध में कितना वैज्ञानिक वर्गीकरण जानते थे। आचार्य तमिल भाषा भी जानते थे उन्होंने तंत्रवार्तिक में पांच शब्दों को उद्धृत किया है जो तमिल भाषा से सम्बंधित है। उक्त भाषाओं के अतिरिक्त उन्हें पारसी, बर्बर, यवन, रोमक भाषाओं का भी नामोल्लेख किया है। आचार्य कुमारिल भट्ट बहुत मेधावी थे हमें लगता है कि वे अपने समय के अद्वितीय विद्वान थे, उन्होंने तंत्रवार्तिक में नैताशो, तुर्फ़री, जेमनी, पर्फ़रिका और जरभरी आदि भाषाओं के अनेक शब्दों का प्रयोग किया है। जिनके आधार पर हम उनके शब्द शक्ति की महत्ता का अनुमान लगा सकते हैं, वे द्रविड़ और आन्ध्र भाषाओं का भी उपयोग किया है अतः आचार्य कुमारिल भट्ट विविध भाषाओं के ज्ञाता थे।

वेदों के प्रति समर्पित

वेदों के प्रति कुमारिल की अटूट श्रद्धा थी वे वेद को अपौरुषेय मानते थे लेकिन उनके काल में बौद्ध दार्शनिकों ने विना वेद पढ़े जाने, वेदों का खंडन करते थे। वैदिक धर्म के स्थान पर समाज में बौद्ध धर्म और जैन धर्म का केवल प्रचार ही नहीं किया जा रहा था बल्कि वैदिक धर्म तथा वैदिक दर्शन के ऊपर जोरों से आक्रमण किया जा रहा था। कुमारिल भट्ट बौद्ध दार्शनिकों के प्रहार से वेदों की रक्षा के उपाय व चिंतन में लग गए। वे यह भली प्रकार जानते थे कि बौद्ध धर्म सम्पूर्ण भारतीय समाज को कापुरुषता का पाठ पढ़ा रहा है और समाज के अंदर भेद भाव पैदा कर रहा है, यहाँ तक कि वह धीरे धीरे भारतीय समाज विरोधी, देश विरोधी होता जा रहा है। धम्म के नाम पर, समता के नाम पर समाज के अंदर जबर्दस्त खाई पैदा होती जा रही है, धीर धीरे परकीय समाज के सहयोगी और अपने देश के विरोधी होते जा रहे हैं। कुमारिल चिंतित न होकर चिंतन में लग गए, उनका दृढ़ विस्वास था कि वेद अपौरुषेय है और ईश्वर प्रदत्त है विश्व के अंदर जो भी ज्ञान है सब कुछ वेदों का है जो वेद में नहीं है वह ब्रम्हांड में है ही नहीं।

भाट्ट मत

आचार्य शबर स्वामी के बाद मीमांसा दर्शन की विचारधारा तीन भागों में पल्लवित, पुष्पित एवं विकसित हुई। आचार्य कुमारिल भट्ट की शिष्य प्रशिष्य आदि परस्पर जो ग्रंथ लिखे गए उसे भाट्ट मत कहा जाता है। मीमांसा दर्शन का दूसरा मत प्रभाकर मत अथवा गुरूमत कहा जाता है, दोनों के अतिरिक्त "मुर्रेस्तृतीयपंथा:" के अनुसार वर्तमान समय में भाट्ट एवं गुरु मत ही प्रसिद्ध है। मीमांसादर्शन के क्षेत्र में ये अप्रतिम है, कुमारिल भट्ट की भट्ट या भट्टाचार्य की उपाधि थी।

वयं राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहितान

कुमारिल भट्ट राष्ट्रवाद के जनक थे वे वेदों में राष्ट्रवाद की ब्याख्या करते थे पुरोहितों के कर्म की ब्याख्या करते थे उनका मानना था कि बौद्ध और जैन दर्शन में राष्ट्रवाद को उपेक्षित किया गया है। और वे इस बात का भी प्रबल खंडन करते थे कि वैदिक धर्म ही ब्राह्मण धर्म है, बौद्धों ने समाज में विकृति फैलाने के लिए यह प्रचार करने का काम किया और सनातन धर्म को ब्राह्मण धर्म बताया। कुमारिल भट्ट ने कहा गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा-- "चातुर्वर्ण्य मयासृष्टा गुण कर्म विभागशः" वेदों में "पुरुषार्थ चतुष्ठ" का वर्णन है "ऋग्वेद" के 'दशम मंडल' में "पुरूष शूक्त" में ईश्वर ने विस्तार से वर्णन किया है। उनका मानना था कि ब्रह्मण समाज का मुख है, यानि जो विद्वान है वेदों को जनता है समाज का उचित मार्ग दर्शन कर सकता है, समाज हित में चिंतन करता है वही ब्रह्मण है, ब्रह्मण वर्ण ब्यवस्था का एक अंग है न कि कोई धर्म! इसलिए कुमारिल केवल वेदों की रक्षा नहीं बल्कि राष्ट्र रक्षा व देश रक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित थे।

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