स्वातंत्र्य वीर सावरकर

 


          भारत में युग पुरुष कभी - कभी पैदा होते हैं उसमे से एक थे विनायक दामोदर सावरकर। सावरकर देश की धड़कन हैं, सावरकर देश की तड़पन हैं सावरकर क्रांतिकारियों की नर्सरी हैं सावरकर पुनर्जन्म की बात सिद्ध करने वाले सनातन धर्म के आध्यात्मिक चिंतक हैं। श्री विनायक दामोदर सावरकर भारतीय सफलता संग्राम के एक तेजस्वी तथा अग्रगणी नक्षत्र थे। वीर सावरकर शब्द साहस वीरता देशभक्ति का पर्यायवाची बन गया है वीर सावरकर अनुसरण करते ही अनुपम त्याग एडम में साहस महान वीरता एक उत्कृष्ट देश भक्ति से उत्प्रोत इतिहास के स्वर्णिम हमारे सामने साकार होकर खुल पड़ते हैं।

लेखक, कवि,  क्रांतिपुन्ज  सावरकर

वीर सावरकर न केवल स्वाधीनता- संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे अपितु वह एक महान क्रन्तिकारी,चिंतक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता भी थे। वह एक ऐसे इतिहासकार भी थे जिन्होंने हिंदू राष्ट्र की के इतिहास को प्रमाणित ढंग से लिपिबद्ध किया तो 1857 स्वतंत्र समर का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिखकर ब्रिटिश शासन को हिला दिया। इस महान कांतिपुंज का जन्म महाराष्ट्र के नासिक जिले के ग्राम भगूर में चितपवन ब्राह्मण श्री दामोदर सावरकर के घर 28मई 1883 को हुआ था । गांव के स्कूल में ही पांचवी तक पढ़ने के बाद विनायक आगे पढ़ने के लिए नासिक चले गए।
            लोकमान्य तिलक  द्वारा संचालित 'केसरी पत्र' की उन दिनों भारी धूम थी, केशरी मे प्रकाशित लिखो को पढ़कर विनायक के हृदय मे देशभक्ति की भावनाएं हिलोरे लेने लगीं। लेखों संपादकीय व कविताओं को पढ़कर उन्होंने जाना कि भारत कि दासता के चंगुल में रखकर अंग्रेज किस प्रकार भारत का शोषण कर रहे है। वीर सावरकर ने कबिताये तथा लेख लिखने शुरू कर दिए उनकी रचनाएँ मराठी पत्रों में नियमित रूप से प्रकाशित होने लगीं। काल के संपादक श्री पराँजपे ने अपने पत्र में सावरकर कि कुछ रचनाएँ प्रकाशित की जिन्होंने तहलका मचा दिया। सन 1905 में सावरकर  B.A के छात्र थे, उन्होंने एक लेख में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आवाहन किया। इसके बाद उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर विदेशी वस्तुओं की होली जलाई लोकमान्य तिलक इस कार्य के लिए आशीर्वाद देने के लिए उपस्थित हुए।

सावरकर की योजना

सावरकर की योजना थी कि किसी प्रकार विदेश जाकर बम आदि बनाने की ट्रेनिंग ली जाए सस्त्र-अस्त्र प्राप्त किए जाएं, तभी श्री श्याम जी कृष्ण वर्मा ने वीर सावरकर को छात्रवृत्ति की घोषणा कर दी। 9 जून 1906 को सावरकर इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए। वह लंदन में इंडिया हाउस में ठहरे, उन्होंने वहां पहुंचते ही अपनी विचारधारा के भारतीय युवकों को संगठित करना शुरू कर दिया,उन्होंने फ्री इंडिया सोसाइटी की स्थापना किया। सावरकर इंडिया हाउस में रहते हुए लेख व कविताएं लिखते रहे, वह गुप्त रूप से बम बनाने की विधि का अध्ययन व प्रयोग करते रहे, उन्होंने इटली के महान देशभक्त मैजिनी का जीवन चरित्र लिखा। उसका मराठी अनुवाद भारत में छपा तो एक बार तहलका मच ही गया था।

1857 प्रथम स्वातंत्र समर

1907 में  सावरकर ने अंग्रेजों के गढ़ लंदन में 1857 की अर्धसती मनाने का व्यापक कार्यक्रम बनाया, 10 मई 1907 को इंडिया हाउस में 1857 के क्रांति की स्वर्ण जयंती का आयोजन किया गया, भवन को तोरण गेटों से सजाया गया मंच पर मंगल पांडे, महारानी लक्ष्मीबाई, कुंवर वीर सिंह, तात्या टोपे, नाना साहब पेशवा आदि भारतीय हुतात्माओं के चित्र लगाए गए। भारतीय नौजवान अपने सीने में बाहों में शहीदों के चित्र के बिल्ले लगाए हुए थे, उन पर अंकित था 1857 के वीर अमर रहे, इस समारोह में कई सौ भारतीयों ने भाग लेकर  1857 के स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। राष्ट्रीय गान के बाद वीर सावरकर का ओजस्वी भाषण हुआ, जिसमें उन्होंने सप्रमाण सिद्ध किया  की 1857 में 'गदर' नहीं अपित भारत की  स्वाधीनता का प्रथम महासंग्राम हुआ था। सावरकर ने 1907 में  1857 का  "प्रथम स्वतंत्रता संग्राम" ग्रंथ लिखना शुरू किया, इंडिया हाउस के पुस्तकालय में बैठकर वह विभिन्न दस्तावेजों वह ग्रंथ का अध्ययन करने लगे। उन्होंने लगभग डेढ़ हजार ग्रंथों का अध्ययन किया उसके बाद ग्रंथ लिखना शुरू किया।
        ग्रंथ की पाण्डुलिपि किसी प्रकार से गुप्त रूप से भारत पहुंचा दी गई, महाराष्ट्र में इसे प्रकाशित करने की योजना बनाई गई स्वराज पत्र के संपादक ने इसे प्रकाशित करने का निर्णय लिया; किन्तु पुलिस ने प्रेस पर छापा मार कर योजना में बाधा डाल दी ग्रंथ की पांडुलिपि गुप्त रूप से पेरिस भेज दी गई। वहां इसे प्रकाशित करने का प्रयास किया गया परंतु ब्रिटिश गुप्तचर वहां भी पहुंच गए और ग्रंथ को प्रकाशित न होने दिया, ग्रंथ के प्रकाशित होने से पूर्व ही उसे पर प्रतिबंध लगा दिया गया, अंततः 1909 में पेरिस में उसे प्रकाशित किया गया।

राजद्रोही घोषित   

ब्रिटिश सरकार इन तीनों सावरकर बंधुओ को राजद्रोह व खतरनाक घोषित कर चुकी थी, सावरकर इंग्लैंड से पेरिस चले गए। पेरिस में उन्हें अपने साथी याद आते वह सोचते कि वह उनके संकट में रहते उनके यहां सुरक्षित रहना उचित नहीं है, अंततः वह इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए। 13 मार्च 1910 को लंदन के रेलवे स्टेशन पर पहुंचते ही सावरकर को बंदी बना लिया गया बृकस्टल जेल में बंद कर दिया गया। उन पर लंदन की अदालत में मुकदमा शुरू हुआ, नया आदेश नहीं 22 में को निर्णय दिया की क्योंकि सावरकर पर भारत में कई मुकदमे हैं अतः उन्हें भारत में ले जाकरवही मुकदमा चलाया जाए,अंततः 29 जून को सावरकर को भारत भेजने का आदेश जारी कर दिया गया।

और समुद्र पार फ़्रांस पहुंचे

1 जुलाई 1909 को 'मोरिया' जालयांन से सावरकर को कड़े पहरे में भारत रवाना कर दिया गया, ब्रिटिश सरकार को भनक लग गई थी कि सावरकर को रास्ते में छुड़ाने का प्रयत्न किया जा सकता है। अतः सुरक्षा प्रबंध बहुत कड़े कर दिए गए, 8 जुलाई को जलयान  मार्शल बंदरगाह के निकट पहुंचने वाला ही था के सावरकर सो जाने के बहाने शौचालय में जा घुसे, फुर्ती के साथ उछलकर वह पोर्ट हाल तक पहुंचे  और समुद्र में कूद गए। अधिकारियों को जैसे ही उनके समुद्र में कूद जाने की भनक लगी कि अंग्रेज अफसर के छक्के छूटने लगे। उन्होंने समुद्र की लहरों को चीरकर तैरते हुए सावरकर पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी। सावरकर सागर की छाती को चीरते हुए फ्रांस की सीमा पर जा पहुंचे, कुछ ही देर में वह तट पर पहुंचने में सफल हो गए किंतु उन्हें पुनः बंदी बना लिया गया.

न्यायलय पर अविश्वास

15 सितंबर 1910 को सावरकर पर मुकदमा शुरू कर दिया गया, सावरकर ने स्पष्ट कहा कि भारत के न्यायालय से उन्हें  न्याय की किंचित भी आशा नहीं है। अतः वह अपना बयान देना व्यर्थ समझते हैं। 23 दिसंबर को अदालत ने उन्हें ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध षडयंत्र रचने, बम बनाने तथा रिवाल्वर आदि शस्त्र भारत भेजने आदि आरोपों में आजम कारावास की सजा सुना दी, उनकी तमाम संपत्ति भी जप्त कर ली गई। 23 जनवरी 1911 को उनके विरुद्ध दूसरे मामले की सुनवाई शुरू हुई, 30 जनवरी को पुनः आजन्म कारावास की सजा सुना दी गई। इस प्रकार सावरकर को दो आजन्म कारावास का दंड की सजा सुना दी गई, सावरकर को जब अंग्रेज न्यायाधीश ने दो आजम करावासों का दंड सुनाया तो उन्होंने हंसते हुए कहा, "मुझे प्रसन्नता है कि ईसाई सरकार ने मुझे दो जीवन का कारावास दंड देकर पुनर्जन्म के हिंदू सिद्धांत को मान लिया है।"
कुछ माह बाद  महाराजा नामक जलयान से सावरकर को अंडमान भेज दिया गया, अंडमान में उन्हें अमानवीय यातनाएं दी जाती थी। कोल्हू में बैल की जगह जोतकर तेल पेरवाया जाता था, मूंज कूटवाई जाती थी। राजनीतिक वंदियों पर वहां किस प्रकार अमानवीय व्यवहार किए जाते थे, इसका रोमांचकारी वर्णन सावरकर जी ने अपनी पुस्तक "मेरा आजीवन कारावास" में किया है।

अंडमान जेल में धर्म परिवर्तन

सावरकर जी ने  अंडमान में कारावास के दौरान अनुभव किया कि मुसलमान बर्डन हिंदू बंदियों को यातनाएं देकर उनका धर्म परिवर्तन करने का कुचक्र रच रहे हैं। उन्होंने इस अन्यायपूर्ण धर्म परिवर्तन का डटकर विरोध किया तथा बलात मुस्लिम बनाए गए हिंदुओं की घर वापसी करने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने अंडमान की काल कोठरी में कविताएं लिखीं थीं। कमला, गोमांतक, वीरहोच्छवास जैसी रचनाएं उन्होंने जेल से हुई अनुभूति के ही वातावरण में लिखीथीं। उन्होंने मृत्यु को संबोधित करते हुए जो कविता लिखी वह देशभक्ति से पूर्ण थी। सावरकर ने अंडमान कारागार में होने वाले अमानवीय अत्याचारों की सूचना किसी प्रकार भारत के समाचार पत्रों में प्रकाशित करने में सफलता प्राप्त कर ली। इससे पूरे देश में इन अत्याचारों के विरोध में प्रबल आवाज उठी अंत में 10 साल बाद 1921 में सावरकर जी को मुंबई लाकर नजर बंद रखने का निर्णय किया गया, उन्हें महाराष्ट्र के रत्नागिरी स्थान में नजरबंदी में रखने के आदेश दिए।  "हिंदुत्व, हिंदू पद पादशाही, ऊ श्राप संन्यस्थ खड्ग" आदि ग्रंथ उन्होंने रत्नागिरी में ही लिखी।

अंतिम विदाई

10 में 1937 को सावरकर जी की नजरबंदी रद्द की गई, नजरबंदी से मुक्त होते ही सावरकर का भव्य स्वागत किया गया, अनेक नेताओं ने उन्हें कांग्रेस में शामिल करने का प्रयास किया, किंतु उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि "कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर मेरे तीव्र मतभेद हैं मैं हिंदू महासभा का नेतृत्व करूंगा।" 30 दिसंबर 1937 को अहमदाबाद में आयोजित अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अधिवेशन में सावरकर की सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने हिंदुत्व की सर्वश्रेष्ठ सर्वमान्य परिभाषा की, हिंदू महासभा के मंच से सावरकर जी ने राजनीति का हिंदुकरण और हिंदू का सैनिकीकरण का नारा दिया। उन्होंने हिंदू युवकों को अधिक से अधिक सेवा में भर्ती करने का आवाहन किया, उन्होंने तर्क दिया, "भारतीय सेना के हिंदू सैनिकों पर ही देश की रक्षा का भार आएगा अधिकतम सैन्य विज्ञान की शिक्षा दी जानी जरूरी है। 26 फरवरी 1966 को भारतीय इतिहास के इस अलौकिक महापुरुष ने इस संसार से विदा ले ली। अपनी अंतिम वसीयत में भी उन्होंने हिंदू संगठन वहां सैनिक की कारण के महत्व शुद्ध की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। भारत को पुनः अखंड बनाए जाने की आकांक्षा राखी।


''ऐसे वीर महापुरुष का व्यक्तित्व और कृतित्व आज भी हमारे लिए पथ प्रदर्शक का काम करने में सक्षम है।''

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